भावनाओं का सूत्र खोता परिवार

भारतीय समाज में परिवार को सबसे छोटी सामाजिक इकाई माना गया है और सभी सामाजिक संस्थाओं का आधार भी परिवार ही है . 15 मई को पूरे विश्व में ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ मनाया जाता है. पहले भारत जैसे देश में ऐसे उत्सवों की कोई जगह नहीं थी क्योंकि सारा परिवार एक ही छत के नीचे […]

भारतीय समाज में परिवार को सबसे छोटी सामाजिक इकाई माना गया है और सभी सामाजिक संस्थाओं का आधार भी परिवार ही है . 15 मई को पूरे विश्व में ‘अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस’ मनाया जाता है. पहले भारत जैसे देश में ऐसे उत्सवों की कोई जगह नहीं थी क्योंकि सारा परिवार एक ही छत के नीचे रहता था, लेकिन अब स्थिति में बहुत बदलाव आ चुका है.

अब तो दिवस मनाने के लिए भी परिवार एकत्र नहीं होता. रिश्तों की गरिमा को बनाये रखने के लिए भावनात्मक जुड़ाव अहम है. रोजगार, निजी महत्वाकांक्षा और पैसों की भाग-दौड़ ने भारतीय परिवार की अवधारणा को बदल दिया है. भारतीय परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, भाई-बहन, ताऊ-ताई, चाचा-चाची, मौसा-मौसी आदि भी शामिल रहे हैं, पर अब यह नहीं दिखता. अब लोग एकल परिवार को ज्यादा महत्व देने लगे हैं, जो हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

मनोज आजिज, जमशेदपुर

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >