झारखंड में गरमी और बिजली संकट एक ही सिक्के के दो पहलू बन चुके हैं. इस साल भी यही हाल है. इस संकट को टालने का कोई पुख्ता इंतजाम न पहले हुआ था, न इस साल है. हालांकि बिजली संकट देशव्यापी समस्या है.
भारत में 22,000 मेगावाट बिजली इसलिए नहीं बन पा रही है, क्योंकि नयी बिजली परियोजनाओं को कोयला नहीं मिल पा रहा है. मांग के अनुपात में बिजली उत्पादन पूरे देश के सामने एक चुनौती बनी हुई है. इससे इतर झारखंड के विभिन्न जिलों में उत्पन्न होनेवाले मौसमी बिजली संकट के पीछे ठोस कार्ययोजना की कमी, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी व्यवस्था की अदूरदर्शिता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का घोर अभाव दिखता है.
पिछले 48 घंटों के दौरान राज्य के बड़े हिस्से में जो बिजली संकट पैदा हुआ है, उसके पीछे बड़ा कारण एनटीपीसी की फरक्का-ललमटिया लाइन के दो टावर गिरना है. इससे संताल परगना के जिले अंधकार में हैं. टावरों की मरम्मत होने तक संकट बना रहेगा. तेनुघाट की यूनिट सं दो से पिछले दो दिनों से उत्पादन ठप रहा. मंगलवार को शाम पांच बजे से इसे चालू किया गया, जिससे 50 मेगावाट उत्पादन हो रहा था. पतरातू की चालू तीन यूनिटों में से दो में उत्पादन ठप है. केवल यूनिट 10 से 75 मेगावाट उत्पादन हो रहा है.
राज्य को बिजली आपूर्ति करनेवाले संयंत्रों की इन तकनीकी गड़बड़ियों को छोड़ दें, तो हर रोज उत्पन्न होनेवाले संकट के पीछे कई ऐसे कारण हैं, जिन्हें बेहतर प्रबंधन से दूर किया जा सकता है. आवासीय नाम से बिजली कनेक्शन लेकर व्यावसायिक इस्तेमाल करने से लेकर बिजली की चोरी रोकने की दिशा में विभाग की उदासीनता और इसके पीछे का कारण जगजाहिर है. कटिया लगा कर बिजली लेनेवाले लोगों को मीटर लगाने के लिए प्रेरित करना मुश्किल काम नहीं है. इससे लोड कम होगा, राजस्व बढ़ेगा. देश के कई जिलों व राज्यों में ऐसा हुआ है.
इसके अलावा तार टूटने, कंडक्टर जलने, जंपर उड़ने, ट्रांसफॉर्मर जलने के कारण घंटों बिजली संकट बना रहता है. यह सही है कि गरमी में मॉल एवं घरों में एसी और कूलर चलने के कारण लोड बढ़ जाता है. फिर तो इसके रखरखाव की व्यवस्था भी वैसी ही सशक्त होनी चाहिए. 50 फीसदी बिजली संकट प्रबंधन को दुरुस्त कर किया जा सकता है.
