भाजपा और मोदी का एक जैसा सफर

भारतीय जनता पार्टी मौजूदा भारतीय राजनीति में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और हो सकता है कि वह सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन कर उभरे. 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें जीतनेवाली भाजपा रामजन्मभूमि आंदोलन के जरिये कई राज्यों में सत्ता में आने में सफल रही. 1989 के लोस चुनाव में भाजपा जहां […]

भारतीय जनता पार्टी मौजूदा भारतीय राजनीति में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है और हो सकता है कि वह सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बन कर उभरे. 1984 के लोकसभा चुनाव में महज दो सीटें जीतनेवाली भाजपा रामजन्मभूमि आंदोलन के जरिये कई राज्यों में सत्ता में आने में सफल रही. 1989 के लोस चुनाव में भाजपा जहां 85 सीटें जीतने में सफल रही, वहीं 1991 के चुनाव में यह संख्या बढ़कर 120 हो गयी.

1992 में बाबरी मसजिद विध्वंस के बाद भाजपा को राजनीतिक रूप से काफी फायदा हुआ. 1996 से उसके लिए सत्ता के दरवाजे खुले. 2004 में हुए लोस चुनाव के नतीजे भाजपा के पक्ष में नहीं रहे और तभी से वह सत्ता से दूर है. वहीं यदि हम गुजरात के मुख्यमंत्री तथा भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बात करें, तो उन्होंने अपनी शुरुआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से की.

1985 में वह भाजपा में शामिल हुए तथा 1995 में वह राष्ट्रीय सचिव बने. 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभाला. उन्हीं के कार्यकाल में 2002 में गुजरात दंगे हुए, जिसके कारण उनकी काफी आलोचना भी हुई. यह भी आरोप लगा कि दंगों में मारे गये मुसलमानों के लिए मोदी ही जिम्मेदार हैं. इन दंगों के बाद संघ तथा हिंदू संगठनों के बीच मोदी काफी लोकप्रिय हो गये थे.

तभी से उन्हें भविष्य में प्रधानमंत्री के रूप में देखा जाने लगा. यदि हम कहें कि भाजपा और मोदी दोनों का राजनीतिक सफर एक जैसा रहा तो यह गलत नहीं होगा. बड़ा सवाल यह है कि यदि गुजरात में दंगे नहीं होते तो क्या मोदी आज प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होते और यदि बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा रामजन्मभूमि आंदोलन नहीं होते तो क्या भाजपा उस समय कई राजनीतिक पार्टियों से आगे निकल कर आज देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी होती?

आकाश गुप्ता

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By Prabhat Khabar Digital Desk

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