डार्विनवाद को चुनौती

सुरेश कांत वरिष्ठ व्यंग्यकार डार्विन सोच भी नहीं सकता होगा कि उसे असली चुनौती भारतीयों से मिलेगी और वह भी इस आधार पर कि बंदर से आदमी बनते हुए क्या तुमने खुद देखा था, जो तुमने सिद्धांत दे डाला कि आदमी बंदर से विकसित हुआ है? तुम्हें कोई और जानवर नहीं मिला इस काम के […]

सुरेश कांत

वरिष्ठ व्यंग्यकार

डार्विन सोच भी नहीं सकता होगा कि उसे असली चुनौती भारतीयों से मिलेगी और वह भी इस आधार पर कि बंदर से आदमी बनते हुए क्या तुमने खुद देखा था, जो तुमने सिद्धांत दे डाला कि आदमी बंदर से विकसित हुआ है? तुम्हें कोई और जानवर नहीं मिला इस काम के लिए? मसलन, गाय से विकसित हुआ बताते. या कम-से-कम क्षेत्रीयता का ही खयाल रख लेते, जैसे हम हिंदुस्तानी रखते हैं. उत्तर में बीफ खाने को लेकर मारकाट मचा देने के बावजूद दक्षिण में बीफ खानेवालों से कोई परहेज नहीं रखते. या एक जगह अलगाववादियों का विरोध करते-करते दूसरी जगह उनके समर्थकों के साथ सरकार बना लेते हैं.

ऐसे ही तुम भी पश्चिम में आदमी के बंदरों से विकसित होने का सिद्धांत देते और पूर्व में गाय से विकसित होने का, तो हम भी सोचते कि हां भाई, इनके यहां हो सकता है, आदमी बंदरों से ही विकसित हुआ हो, देखने में लगते भी ये बंदरों जैसे ही हैं. पर हम भला कैसे बंदरों से विकसित हुए माने जा सकते हैं, जब गाय हमारी माता है? और सबसे बड़ी बात, क्या इसके लिए बंदरों से सहमति ले ली थी? हम तो फिल्मों के प्रदर्शन तक में अदालत की नहीं, लोगों की भावनाओं का ध्यान रखते हैं, भले ही कुछ ही लोगों की भावनाओं का रखते हों, सभी की नहीं.

नहीं, हम हिंदुस्तानी बिना देखे किसी बात पर यकीन नहीं करते. भगवान है, यह हमने तभी माना, जब देख लिया खुद जाकर मंदिर में कि हां, विराजमान है. यह अलग बात है कि जो विराजा दिखा, उसी को भगवान मान लिया. विराजमान कहा ही विराजे हुए को मानने के कारण. भगवान अलग है और खुदा अलग, यह भी हमने खुद अपनी आंखों से देखा है.

मंदिर में भगवान दिखता है, मस्जिद में खुदा, हालांकि कुछ ज्यादा काबिल लोगों को किसी-किसी मस्जिद में भी भगवान ही दिख जाता है. जब और जहां ऐसा होता है, तब और वहां मस्जिद ढहाकर मंदिर बनाने का आंदोलन चलाना भी स्वाभाविक ठहरा.

चुनाव में भले ही सभी नेता हमें ‘बना’ जाते हों, पर हम तभी बनते हैं, जब देख लेते हैं कि बन रहे हैं.

मसलन, किसी ने कहा कि मेरा सीना छप्पन इंच का है, तो हमने भली-भांति देख लिया कि नहीं है, तभी माना कि है. देख लेने के बाद ही माना, भले ही दिखा न हो, पर माना देखने के बाद ही. बहुत महंगाई है, मुझे लाओ, मैं नहीं रहने दूंगा महंगाई- उसने कहा. आज देख लो, बहुत महंगाई कहीं नहीं है, सब जगह बहुत से ज्यादा ही महंगाई है.

फिर भला हम बिना देखे कैसे मान लें कि मनुष्य बंदर से विकसित हुआ? दिखता तो इसका उलटा है. देख तो यह रहे हैं कि मनुष्य ही बंदर में विकसित हो रहा है. बंदर में ही क्या, गधे में विकसित होता भी खूब देख रहे हैं. हाल ही में एक नेता को ‘गॉड’ के बजाय ‘डॉग’ की शपथ लेकर मंत्री बनते देखने के बाद तो शक होना लाजमी है डार्विन के सिद्धांत पर. बाई गॉड, क्या पता डॉग से ही विकसित हुआ हो आदमी!

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