असम के बोडोलैंड क्षेत्रीय स्वायत्त जिलों- बाक्सा और कोकराझाड़- में जारी सांप्रदायिक हिंसा में कम-से-कम 32 लोग मारे जा चुके हैं, जिनमें महिलाएं और बच्चे भी हैं. प्रभावित क्षेत्रों से पीड़ित ग्रामीणों का पलायन जारी है और हिंसा की खबरें अब भी आ रही हैं. इन घटनाओं से 2012 में बोडो और प्रवासी मुसलिम समुदायों के बीच हुई भयानक हिंसा की पुनरावृत्ति की आशंका बढ़ गयी है.
तब 100 से अधिक लोगों की जानें गयी थीं और करीब दो लाख लोग प्रभावित हुए थे. इससे पहले 1993-94 में प्रथम बोडो समझौते की पृष्ठभूमि में हुए दंगों में भी बड़ी संख्या में लोग मारे गये थे और हजारों अपना घर-बार छोड़ने के लिए मजबूर हुए थे. वैसे हिंसा के इस सिलसिले की शुरुआत 1950 के दशक के शुरू में कोकराझाड़, बाक्सा, चिरांग और उदलगुरी जिलों में प्रवासी मुसलिमों और बोडो आदिवासियों के बीच झड़पों से मानी जाती है. बोडो समुदाय का आरोप है कि अवैध घुसपैठ ने उनके लिए असुरक्षा का माहौल बना दिया है.
2003 में बोडो अतिवादियों के साथ हुए समझौते के बाद इन जिलों को मिला कर एक स्वायत्त क्षेत्र का गठन किया गया था, जिसका प्रशासन बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद के हाथ में है. इस परिषद पर बोडो पीपुल्स फ्रंट का कब्जा है, जिसके नेता हग्राम मोहिलरी हैं. समझौते से पूर्व मोहिलरी उग्रवादी संगठन बोडो लिबरेशन टाइगर्स के मुखिया थे. यह फ्रंट असम की कांग्रेस सरकार में भी शामिल है. असम सरकार के एक प्रमुख मंत्री सिद्दिक अहमद ने आरोप लगाया है कि बोडो पीपुल्स फ्रंट ही इस हमले के लिए जिम्मेवार है, क्योंकि फ्रंट की नेता प्रमिला रानी ब्रह्मा ने कुछ दिन पहले बयान दिया था कि प्रवासी मुसलिमों ने कोकराझाड़ फ्रंट के प्रत्याशी चंदन ब्रह्मा को वोट नहीं दिया है.
चंदन राज्य सरकार में मंत्री हैं. दुर्भाग्य की बात यह है कि हिंसा रोकने और संघर्ष का दीर्घकालिक समाधान निकालने के बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं. नरेंद्र मोदी असम में चुनाव प्रचार के दौरान अलग बोडो राज्य की मांग को हवा दे चुके हैं और कथित घुसपैठियों को वापस भेजने की बात भी कह रहे हैं. कांग्रेस सरकार कोई कड़े कदम उठा कर बोडो अतिवादियों को नाराज नहीं करना चाहती है. राजनीतिक रस्साकशी में फंसे आम लोग मारे जाते रहने के लिए अभिशप्त हैं!
