वसंत का शुभागमन

कविता विकास लेखिका साहित्य, संगीत और स्वर की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती कालवृत्त के सबसे सुंदर वसंत रूप में जब पद्मासन पर विराज हो धरती पर पहुंचती हैं, तब वासंतिक छटा अपने सर्वोत्तम शृंगार में होती है. सरस्वती श्वेतांबरा हैं, श्वेत मोक्ष और सात्त्विकता का प्रतीक हैं. वसंत स्वाभाविक है और प्रकृति अनंत. वसंत केवल प्रकृति […]

कविता विकास

लेखिका

साहित्य, संगीत और स्वर की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती कालवृत्त के सबसे सुंदर वसंत रूप में जब पद्मासन पर विराज हो धरती पर पहुंचती हैं, तब वासंतिक छटा अपने सर्वोत्तम शृंगार में होती है.

सरस्वती श्वेतांबरा हैं, श्वेत मोक्ष और सात्त्विकता का प्रतीक हैं. वसंत स्वाभाविक है और प्रकृति अनंत. वसंत केवल प्रकृति का उत्सव नहीं, समस्त ब्रह्मांड का उत्सव है. स्वर ईश्वर है और ईश्वर आनंद है. आनंद का कोई एक स्रोत नहीं है. यह एक रहस्यमय शब्द है. इसे न शब्दों में बांध सकते हैं, न सीमाओं में. महंत इस आनंद की अनुभूति पद्मिनी के खिलने में करता है, तो कवि आम्र मंजरियों के रिसाव में. खिलना, फूलना, उड़ना, चहकना और हंसना उल्लास है.

यही उल्लास वसंत है. प्रकृति में जो राग है, वही मन का राग बन जाता है. चारों तरफ प्यार छलकने लगता है. प्रज्ञा की देवी सरस्वती विचारणा, भावना और संवेदना की प्रतिमूर्ति है. सरस्वती ही वेद की उत्पत्ति का कारण है. ज्ञानी उनको पूजते हैं और उनकी कृपा से प्रकांड पंडित होकर कालजयी हो जाते हैं.

सरस्वती का आह्वान धर्म से परे सांस्कृतिक मूल्यों को सहेजती हुई परंपरा का द्योतक है. वरद साहित्य और संस्कृति की वरदायिनी वागीश्वरी सरस्वती वसंत की शोभा में चार चांद लगा देती है.

आम्र मंजरियों का पहला चढ़ावा श्वेत पद्म पर विराजमान सरस्वती को अर्पित होता है, ताकि देश की संतति परंपरा आम्र वृक्षों की शाखाओं की तरह अपने यश का चतुर्दिक विकास कर सके. वीणावादिनी के पुस्तक और वीणा धारण करने का अर्थ भी यही है कि ज्ञान का क्षेत्र संकुचित न रहे.

साहित्य और संगीत, दोनों ही सृजनात्मकता बढ़ाते हैं और मधुरम जीवन का पर्याय बनते हैं.

इसी मधुरता का विस्तार है वसंत ऋतु. अन्य पर्वों का आगमन केवल मानव समुदाय को आनंदित करता है, जबकि वसंत का आगमन वन-प्रांतर, नदी-पोखर, जीव-जंतु, मकरंद-पराग सभी को प्रफुल्लित करता है. निराला ने मां सरस्वती की वंदना करते हुए उन्हें वसंत की संवारी हुई माला से अलंकृत किया है, ‘वरद हुई शारदा जी हमारी, पहनी वसंत की माला संवारी.’

प्रकृति जिस समय अपने चरमोत्कर्ष पर होती है, उसी समय जीवन का उदात्त काल होता है. वसंत वनस्पति के संवत्सर ताप का अत्यंत मनमोहक पुरश्चरण है. सुरभित पुष्पों के बहुरंगी प्रसाधन से युक्त प्रकृति हमारी अंतश्चेतना का साक्षात्कार ऐसी अनुभूतियों से कराती है, जो अलौकिक है.

प्राणों की अनिर्वचनीय रसदशा की उदात्तता सौंपनेवाली सृष्टि के अजस्र औदार्य का प्रतिफलन है वसंत और वसंत से आह्लादित मन को अज्ञान के अंधकार से निकाल ज्ञान की सर्वोच्च सत्ता को सौंपने का साधन है मां भारती की अर्चना. इसलिए वासंतिक उल्लास और शारदे की महिमा को अलग नहीं किया जा सकता. ये हमारी सांस्कृतिक मूल्यों के प्रतीक हैं, हमारी समस्त चेतना को सुकर्म की ओर प्रवाहित करनेवाले सूत्रधार. विद्यालयों में सरस्वती वंदना से दिन की शुरुआत करने के पीछे यही मंशा है.

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