।। कमलेश सिंह।।
(इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल के प्रबंध संपादक)
शुक्र है कि पत्रकार लोग सर्जन नहीं हैं. नहीं तो ये आदमी के मस्तिष्क में घुस के तंत्रियां गिन लेते और नतीजा निकाल देते कि पब्लिक का मिजाज क्या है, जो इसके मन में है वो राज क्या है. सर्जन नहीं हैं, पर सृजन तो कर सकते हैं. आंकड़े उपलब्ध हुए तो विेषण भी कर डालते हैं. चुनाव अभी पूरा नहीं हुआ और चुनावी विेषणों से हम आजिज आ गये हैं. महबूबा की लंबी उलझी जुल्फों से भी लंबा-लंबा लेख सुलझाने का वादा कर और ज्यादा उलझाते हैं. उधर जुल्फों में कंघी हो रही है, खम निकलता है. इधर रुक-रुक के खिंच-खिंच के हमारा दम निकलता है. परिणाम तो 16 मई को आयेगा पर हुजूर लगे हुए हैं यह सुलझाने में कि कौन जात का वोट किस पात में गिरा. और मुसलमान होना तो इस मुल्क में गुनाह हो गया है. हम सेक्यूलर ताकतों की तरह डरा नहीं रहे. सांप्रदायिक ताकतों की तरह भी नहीं. हम तो यह सोच के घबरा रहे हैं कि पंडित लोग चुनाव पूरा होने तक सबको पगला देंगे यह बता कर कि मुसलमानों का वोट किसको मिलेगा. इस बात पर सहमति है कि बीजेपी को नहीं मिलेगा. इस पर भी कि एकमुश्त मिलेगा.
खैर, विेषक बिरादरी के विश्लेषण ने हमको ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि अल्पसंख्यक कौन है. अल्पसंख्यक यानी जिसकी संख्या कम हो. संख्या में सबसे कम एक है. शून्य से एक ज्यादा और दो से एक कम. अल्पतमसंख्यक. भारत के भीतर राज्य हैं, राज्यों के भीतर जिले, जिले में प्रखंड, प्रखंडों में पंचायत, पंचायत में गांव, गांव में परिवार, परिवार में सदस्य. वह सदस्य अगर 18 या ज्यादा की उम्र का हो, तो एक वोट. हिंदू में अगड़ा, पिछड़ा, अगड़े-पिछड़े में जाति, जाति में गोत्र, गोत्र में खानदान, खानदान में परिवार, परिवार में सदस्य. मुसलमानों में भी अगड़ा-पिछड़ा, जात-पात, सैयद-अंसारी, शिया-सुन्नी, अहमदी-कादियानी, और फिर परिवार और परिवार में सदस्य. एक आदमी ही मजबूत और कमजोर होता है. आदमी से छोटा अल्पसंख्यक कोई नहीं. पर नेताओं के लिए हम एक नहीं हैं, एक समूह हैं, एक जाति हैं, ब्राrाण हैं, बनिया हैं, शिया हैं, सुन्नी हैं, आदिवासी और दिकू हैं. भीड़ को बरगलाना आसान है. इसीलिए हमसे अकेले में बात नहीं करते. रैली में बुलाते हैं. भीड़ का दिमाग नहीं होता. सब भेड़ हो जाते हैं. एक ने बोला राहुल गांधी जिंदाबाद, तो सब कह उठते हैं. सोचने का मौका नहीं मिलता. हर-हर मोदी. घर-घर मोदी. भीड़ से जो करवाना है, करवा लो.
बोल बम की यात्र अगर कोई अकेले करता है, तो वह अपने अंदर की यात्र करता है. मौन, बाबा के प्रेम में लीन, कभी प्रकृति में विलीन. अकेला बम नारे नहीं लगाता. भीड़ में जवाब देने लगता है. जोर से बोलो- बोल बम. जो जमीनी बाबा हैं, उनके समागम पर नजर डालिये. भक्त झूमते हैं, हंसते हैं, आंसू बहाते हैं. बाबा जय हो बोलते हैं, तो पंडाल में जय हो गूंज उठता है. कई ढोंगी बाबा भी हजारों भक्त जुटा लेते हैं. उनसे अकेले में मिलनेवाले उनका ढोंग जानते हैं. कभी-कभार पुलिस जान जाती है, तो बाबा जेलयात्र तक कर आते हैं. रोना-पीटना, हाल पर आ जाना. वाह-वाह करना. आह-आह करना. भावनाएं संक्रामक हो जाती हैं भीड़ में. घटिया से घटिया शायर मंच लूट लेता है, क्योंकि तालियों में तालियां मिलती हैं. एक ने बजाई, दो ने बजाई, सब ने बजाई. वैसे ही हूट हो जाते हैं. एक ने टमाटर फेंका, दो ने, फिर सब ने. गालियों से गालियां मिलती हैं. मंगल को मंदिर में, जुम्मे को मसजिद में, इतवार को चर्च में. जब भक्ति का माहौल होता है तो भक्त. आशक्ति का माहौल में आशक्त. निगरुण में विरक्त.
राजनीतिक प्राणी भी मनुष्य की इस भावना को समझते हैं. एक कहता है अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण हुआ, तो हां में सर हिला दिया. दूसरा बोलता है कि उनको इंसाफ नहीं मिला, तो वहां भी भीड़ इकरार में. जाति की तरह देखते हैं, तो जाति के लिए योजनाएं बनाते हैं. आपको नहीं मिलता, क्योंकि आपके लिए बना नहीं. आपकी जाति को दिया ना. मुसलिम तुष्टिकरण हुआ, तो किस मुसलिम को मिला. कोई एक पूछ ले तो वे समझाते हैं कि हमने किया. आपको नहीं मिल पाया पर बाकी को मिला. सब सोचते हैं कि हम सबको मिला है. किसको मिला है पता नहीं.
शायद इसीलिए संसद में ध्वनिमत प्रस्ताव होता है. जो जितना शोर मचाये, वही पास हो जाये. और शायद इसीलिए चुनाव में हम अकेले वोट करते हैं. आप और वोटिंग मशीन. एक कोने में गुफ्तगू करते हैं. वह मशीन आपसे पूछती है, बता तेरी रजा क्या है. और हम जवाब में बटन दबाते हैं. अपना इरादा बताते हैं. क्योंकि लोकतंत्र में समूह को नहीं, संख्या को नहीं, बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक को नहीं, हर आदमी को अपना फैसला लेना पड़ता है. क्योंकि हर आदमी अल्पसंख्यक है.
