सोचने-समझने का काफी वक्त हाथ से निकल चुका है और जरूरत फौरी तौर पर उपाय करने की है- बैंकों को डूबे कर्ज से उबारने के बारे में संसदीय समिति ने सरकार को जो सलाह दी है, उसका निचोड़ यही है. समिति ने चिंता जतायी है कि बैंकों में निगरानी का तंत्र मौजूद होने के बावजूद गैर-निष्पादक परिसंपत्तियों (एनपीए) से संबंधित फर्जीवाड़े के मामले सामने आये हैं.
सो, सरकार को दो मोर्चों पर काम करना होगा. एक तो मजबूत निगरानी, दूसरा यह देखा जाना चाहिए कि वित्त मंत्रालय या रिजर्व बैंक ‘बैड लोन’ से निबटने को लेकर बैंकों को कोई निर्देश जारी करता है, तो उसका पालन सही ढंग से हो. एक हिदायत यह भी है कि कर्ज न चुकानेवालों के नाम सार्वजनिक किये जाने चाहिए. समिति की सलाह को हालिया प्रयासों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए. इस साल सितंबर तक सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़कर 7.34 लाख करोड़ पहुंच चुका है. अगर इस राशि में निजी बैंकों के एनपीए को जोड़ दें, तो डूबते कर्ज की कुल राशि लगभग साढ़े आठ लाख करोड़ पहुंच जाती है. बैंकों से कर्ज लेकर अदा न करनेवाले ज्यादातर लोग काॅरपोरेट क्षेत्र के हैं.
अदालती दखल के बावजूद रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय ने नियमों का हवाला देकर तर्क दिया है कि ऐसे लोगों के नाम जगजाहिर करना बैंकिंग-तंत्र के हित में नहीं है. हालांकि, बीते तीन सालों में बैंकों को उबारने के नियामक प्रयास किये गये हैं और इस क्रम में सरकारी बैंकों की आलोचना की गयी है कि कर्ज देने का उनका निर्णय बहुधा संगत नहीं होता, जोखिम का आकलन ठीक से नहीं होता और बैंकों के वित्तीय संचालन का तंत्र बहुत लचर है.
संसदीय समिति की सलाह सार्वजनिक क्षेत्रों के बैंकों के वित्तीय संचालन तंत्र को ज्यादा कारगर बनाने की लीक पर ही है. साथ ही, यह भी देखना होगा कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अक्तूबर में घोषणा की थी कि सरकार अगले दो सालों में सरकारी बैंकों में विभिन्न उपायों से 2.11 लाख करोड़ रुपये निवेश करेगी. इससे सरकारी बैंकों को काफी मदद मिलेगी. बैंकों को बैड लोन से उबारने के लिए 2015 में भी सरकारी बैकों में निवेश की घोषणा हुई थी. तब इंद्रधनुष बैंकिंग स्कीम के अंतर्गत सरकार ने 70,000 करोड़ रुपये के निवेश का फैसला किया था और इसकी 80 फीसदी रकम सरकारी बैंकों में डाली जा चुकी है.
बैड लोन की समस्या से उबरने के लिहाज से चूंकि सरकारी बैंकों को यह रकम कम लगी, सो सरकार ने निवेश की राशि बढ़ा दी. बैंकों की माली हालत सुधारने के उपाय निश्चित ही स्वागत योग्य हैं, लेकिन संसदीय समिति की सलाह पर अमल करते हुए बैंकों के वित्तीय प्रबंधन को कारगर बनाने की जरूरत भी समान रूप से अहम है, ताकि समय रहते बैंकों के एनपीए को और ज्यादा बढ़ने से रोका जा सके. इसके साथ ही डूबी हुई या डूबने की कगार पर जो रकम है, उसकी वसूली के लिए भी ठोस और तार्किक पहल करने की जरूरत है.
