जर्मनी के बॉन शहर में चल रहे जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में भारत और चीन की अगुवाई में विकासशील देशों के समूह ने महत्वपूर्ण जीत हासिल की है. अब आयोजन में इस बात पर चर्चा हो सकेगी कि 2020 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए विकसित देशों ने अपने वादों पर कितना अमल किया है. अमेरिका और यूरोपीय संघ के नेतृत्ववाले विकसित राष्ट्रों ने सप्ताह भर की तनावपूर्ण वार्ता के बाद ही इस एजेंडे पर सहमति दी है.
बॉन में 2009 में भी इस विषय पर बैठक हुई थी. उस समय भी विकसित राष्ट्रों के अड़ियल रवैये पर विकासशील देशों ने एेतराज जताया था. तब अमेरिका क्योटो प्रोटोकॉल और बाली एक्शन प्लान से सहमत नहीं था, तो इस बार वह पेरिस समझौते से अलग हो चुका है.
ऐसे वैश्विक सम्मेलनों में प्रभावशाली देश बातचीत के मुख्य मुद्दे तय करने की प्रक्रिया पर दबाव बनाते हैं. बीते सितंबर जब बॉन सम्मेलन का एजेंडा तैयार किया गया, तो उसमें 2020 से पहले की योजनाओं पर चर्चा का बेहद जरूरी हिस्सा ही गायब था. इन योजनाओं के तहत विकसित देशों को 2020 से पहले अपने उत्सर्जन में कमी करने और विकासशील देशों को हरित तकनीक खरीदने के लिए धन का इंतजाम करने जैसे ठोस कदम उठाने हैं.
पेरिस समझौता 2020 से लागू हो जायेगा और यदि पहले से तैयारी नहीं की गयी, तो समझौते के निर्देश को अमली जामा पहनाना मुश्किल हो जायेगा और मौजूदा सदी में वैश्विक तापमान को उद्योग-पूर्व के स्तर से महज दो डिग्री सेल्सियस ऊपर रखने के इरादे पूरे न हो सकेंगे. यह जगजाहिर है कि चीन, भारत, ब्राजील जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं के लिए ऊर्जा की उपलब्धता आवश्यक है. दुनिया की अधिकाधिक आबादी की बेहतरी के लिए यह करना जरूरी है. ऐसे में विकसित देश पर्यावरण में असंतुलन और तापमान बढ़ने का ठीकरा विकासशील देशों के माथे फोड़ते हैं, जबकि सच यह है कि पश्चिमी देश अन्य देशों के अनुपात में अधिक कार्बन उत्सर्जन करते हैं.
वर्ष 2015 में अंतरराष्ट्रीय सिविल सोसाइटी समूहों ने एक रिपोर्ट में बताया था कि 2020 से पहले के उपायों के लिहाज से भारत और चीन ने अपनी जवाबदेही से कहीं अधिक बेहतर प्रदर्शन किया, जबकि विकसित देश इसमें विफल रहे. अनेक रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि विकासशील देशों को हर साल 100 बिलियन डॉलर देने के वादे भी ठीक से पूरे नहीं किये जा सकते हैं.
ध्यान रहे, यह जीत बड़ी जीत नहीं है. एजेंडे में शामिल अस्थायी मुद्दों पर तभी चर्चा होगी, जब सभी 197 देश इससे सहमत होंगे. पर, एकजुटता के साथ विकासशील देश अपने और धरती के हितों के लिए लामबंद हैं, यह संतोष की बात जरूर है. संभावना यह भी है कि पेरिस जलवायु समझौते से जुड़े काम पूरा करने के लिए अगले साल एक बैठक और हो सकती है. अभी तो यह देखना है कि बॉन सम्मेलन में विकसित देशों का रवैया कितना सकारात्मक है.
