महिला आरक्षण बिल मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक, जानें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की बड़ी बातें..

महिला आरक्षण बिल के प्रावधानों के अनुसार लोकसभा की 543 सीट में से 181 अब महिलाओं के लिए आरक्षित होगी. कानून मंत्री ने बताया कि आरक्षण का प्रावधान 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा. उसके बाद इसकी अवधि बढ़ाने पर फैसला संसद को करना होगा.

नई संसद में पहुंचने के साथ ही मोदी सरकार के कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने महिला आरक्षण बिल ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लोकसभा में पेश किया. इस बिल को कैबिनेट ने सोमवार को अपनी मंजूरी दे दी थी. यह बिल 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए नरेंद्र मोदी सरकार का ‘मास्टरस्ट्रोक’ है. इस बिल के जरिये पीएम मोदी ने देश की आधी आबादी को साधने की कोशिश की है. इस बिल को लोकसभा में पेश करते हुए कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि इस बिल के कानून बनते ही लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीट आरक्षित हो जाएंगे.

181 सीट महिलाओं के लिए आरक्षित होगी

इस बिल के प्रावधानों के अनुसार लोकसभा की 543 सीट में से 181 अब महिलाओं के लिए आरक्षित होगी. कानून मंत्री ने बताया कि आरक्षण का प्रावधान 15 वर्षों के लिए लागू रहेगा. उसके बाद इसकी अवधि बढ़ाने पर फैसला संसद को करना होगा. यह संविधान का 128वां संशोधन विधेयक है. ‘नारी शक्ति वंदनअधिनियम’ के तहत एससी-एसटी वर्ग की महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था नहीं होगी. लेकिन जो सीटें एससी-एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं उनमें से 33 प्रतिशत अब महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. वहीं ओबीसी महिलाओं के लिए बिल में अलग से आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है. उन्हें अनारक्षित सीटों पर ही चुनाव लड़ना होगा.

पहले भी कई बार पेश हो चुका था महिला आरक्षण बिल

महिला आरक्षण विधेयक को पेश किए जाने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनकी सरकार लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं में महिला आरक्षण के प्रावधान वाले ‘नारीशक्ति वंदन विधेयक’ को कानून बनाने के लिए संकल्पबद्ध है. उन्होंने नये संसद भवन में कार्यवाही के पहले दिन लोकसभा में अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि महिला आरक्षण विधेयक पहले भी कई बार संसद में पेश किया जा चुका है, लेकिन महिलाओं को अधिकार देने, उनकी शक्ति का उपयोग करने के इस काम के लिए…….ईश्वर ने ऐसे कई पवित्र कार्यों के लिए मुझे चुना है.

सबसे पहले 1996 में देवगौड़ा की सरकार ने पेश किया था महिला आरक्षण बिल

महिला आरक्षण बिल की यात्रा 27 साल पुरानी है और तब से महिलाएं अपनी इस मांग को पूरा करवाने के लिए जूझ रही हैं. सबसे पहले सितंबर 1996 में एचडी देवगौड़ा की सरकार ने संसद में पेश किया था. उसके बाद आने वाली हर सरकार ने इस पेश को संसद में पेश किया और पास करवाने की कोशिश की, लेकिन यह बिल पास नहीं हो सका. 2010 में यह विधेयक राज्यसभा से पारित भी हुआ था, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी की वजह से यह बिल लोकसभा से पारित नहीं हो सका. 1996 में यह एक आश्चर्यजनक कदम था, जनता दल के कई नेता और सत्तारूढ़ गठबंधन के अन्य घटक इसके पक्ष में नहीं थे. अगले दिन विधेयक को सीपीआई की गीता मुखर्जी की अध्यक्षता वाली एक संयुक्त समिति को भेजा गया.

राजीव गांधी ने सबसे पहले महिलाओं को आरक्षण देने की कही थी बात

राजीव गांधी ने सबसे पहले 1987 में एक कमेटी गठित कर चुनावों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सुझाव मांगे थे. मारर्गेट अल्वा इस कमेटी की अध्यक्ष थी और उन्होंने आरक्षण की सिफारिश की थी. उसके बाद राजीव गांधी ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में महिलाओं को आरक्षण देने संबंधी विधेयक संसद में पेश किया था, जिसे पारित नहीं करवाया जा सका. बाद में नरसिम्हा राव की सरकार ने पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण देने का कानून बनाया.

अटल जी की सरकार में बिल फाड़ा गया

अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1998 में महिला आरक्षण बिल लोकसभा में पेश किया गया, लेकिन संख्या बल की कमी की वजह से यह बिल पास नहीं हो सका था. उस वक्त राजद के सांसद ने बिल को कानून मंत्री के हाथ से छीनकर फाड़ दिया था. इस बिल में पिछड़ा वर्ग की महिलाओं और मुस्लिम महिलाओं के लिए भी आरक्षण की मांग की गयी थी. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कई बार महिला आरक्षण विधेयक पेश किया गया, लेकिन उसे पार कराने के लिए आंकड़े नहीं जुटा पाए और वह सपना अधूरा रह गया.

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Published by: Rajneesh anand

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राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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