उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर का नाम पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े कानूनी मामलों के कारण राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है.साल 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी मामले में सर्वे का आदेश देने के बाद उन्हें देशभर में पहचान मिली. अब 2026 में मुजफ्फरनगर में लगातार मृत्युदंड की सजाएं सुनाने और उनकी अदालत से 97 मुकदमों की फाइलें वापस लिए जाने की खबरों के बाद वह फिर सुर्खियों में हैं.
2009 में न्यायिक सेवा में प्रवेश
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक रवि कुमार दिवाकर मूल रूप से लखनऊ के रहने वाले हैं. उन्होंने 1999 में इंटरमीडिएट, 2002 में बीकॉम, 2005 में एलएलबी और 2007 में एलएलएम की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद 2009 में उन्होंने उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के रूप में प्रवेश किया. उनकी शुरुआती तैनाती आजमगढ़ में हुई। इसके बाद उन्होंने सुलतानपुर और बदायूं में भी न्यायिक जिम्मेदारियां संभालीं.
वाराणसी पहुंचने के बाद बढ़ी पहचान
साल 2019 में रवि कुमार दिवाकर वाराणसी पहुंचे, जहां उन्होंने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (ACJM), स्पेशल CJM और सिविल जज (सीनियर डिवीजन) के तौर पर काम किया. इसी दौरान ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी विवाद उनके न्यायिक करियर का सबसे चर्चित मामला बना.
ज्ञानवापी सर्वे के आदेश से देशभर में चर्चा
मई 2022 में वाराणसी की अदालत में रहते हुए उन्होंने ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे को जारी रखने का आदेश दिया था. सर्वे के दौरान परिसर के एक हिस्से में कथित शिवलिंग मिलने का दावा सामने आया था. इसके बाद उस स्थान को सील करने का आदेश भी चर्चा में रहा. मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए दिवाकर ने अपनी और परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंता भी जताई थी.
आदेश के बाद हुआ तबादला
ज्ञानवापी मामले के बाद जून 2022 में उनका वाराणसी से बरेली तबादला कर दिया गया. इसी दौरान उन्हें धमकी भरी चिट्ठी मिलने की खबरें भी सामने आई थीं. बाद में उन्हें पदोन्नति मिली और वह अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (ADJ) बने। बरेली में फास्ट ट्रैक कोर्ट से जुड़ी जिम्मेदारियां भी उन्होंने संभालीं.
विदेशी नंबरों से कॉल का भी मामला
अप्रैल 2024 में रिपोर्टों में दावा किया गया कि उन्हें विदेशी नंबरों से फोन कॉल आ रहे थे. उस समय वह बरेली में न्यायिक पद पर तैनात थे और उन्होंने इस संबंध में पुलिस अधिकारियों से शिकायत की थी. सुरक्षा को लेकर उनकी चिंता समय-समय पर सामने आती रही है.
चित्रकूट से मुजफ्फरनगर तक सफर
नवंबर 2025 में रवि कुमार दिवाकर ने मुजफ्फरनगर में कार्यभार संभाला. इससे पहले वह चित्रकूट में तैनात थे. मुजफ्फरनगर पहुंचने के बाद उनके फैसलों ने एक बार फिर व्यापक चर्चा पैदा कर दी.
5 महीने में 22 दोषियों को मौत की सजा
साल 2026 में मुजफ्फरनगर में उनके न्यायालय से सुनाए गए फैसले चर्चा का सबसे बड़ा कारण बने. रिपोर्ट के अनुसार करीब 5 महीनों में 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया. ये मामले अलग-अलग हत्याओं से जुड़े थे और कई अपराध कई वर्ष पुराने थे। बड़ी संख्या में मौत की सजाओं के कारण 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' सिद्धांत को लेकर भी बहस शुरू हुई.
सुरक्षा गनर बदलने पर उठे सवाल
अगस्त 2026 में उन्होंने अपने सुरक्षा गनर को बदले जाने के संबंध में उत्तर प्रदेश के DGP को पत्र लिखा. इसके बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हुई. पुलिस की ओर से बताया गया कि मूल गनर छुट्टी पर था और उसकी जगह वैकल्पिक सुरक्षा कर्मी लगाया गया था.
अब 97 मुकदमों के रिकॉल से चर्चा
ताजा घटनाक्रम में मुजफ्फरनगर में उनकी अदालत से 97 लंबित मुकदमों की फाइलें रिकॉल किए जाने की खबर सामने आई है. इनमें हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े मामले शामिल बताए जा रहे हैं. यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब दिवाकर की अदालत द्वारा कम समय में बड़ी संख्या में मृत्युदंड सुनाए जाने को लेकर पहले ही चर्चा चल रही थी.
ज्ञानवापी से मृत्युदंड तक बना चर्चा का सफर
जज रवि कुमार दिवाकर का न्यायिक करियर 2009 में शुरू हुआ। 2022 में ज्ञानवापी सर्वे के आदेश ने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई। इसके बाद तबादलों, पदोन्नति और सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रमों के बीच 2026 में मुजफ्फरनगर में उनके फैसले फिर सुर्खियों में हैं. अब 97 मुकदमों की फाइलें वापस लिए जाने का घटनाक्रम उनके न्यायिक सफर का नया और महत्वपूर्ण अध्याय बन गया है.
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