एक नया रक्षा समीकरण पश्चिम एशिया में उभर रहा है. तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब का रक्षा समझौता सिर्फ तीन देशों की सैन्य साझेदारी नहीं है.
इसके पीछे अमेरिका के घटते सैन्य फुटप्रिंट, ईरान-इजराइल तनाव, सऊदी की सुरक्षा चिंता और पाकिस्तान की अपनी खोई हुई रणनीतिक प्रासंगिकता वापस पाने की कोशिश जैसे कई पहलू जुड़े हैं.
भारत के नजरिए से सबसे अहम सवाल यह है कि इस गठजोड़ से पाकिस्तान को क्या हासिल हो सकता है और नई क्षेत्रीय राजनीति में भारत को किस तरह अपनी जगह मजबूत करनी होगी.
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1. पाकिस्तान के लिए ‘मध्य-पूर्व वापसी’ का मौका
पाकिस्तान लंबे समय से अपनी सैन्य क्षमता को पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था में प्रासंगिक बनाने की कोशिश करता रहा है. 1950 और 1960 के दशक में वह पश्चिमी सुरक्षा संगठनों से जुड़ा था और मध्य-पूर्व में सैन्य भूमिका तलाशता था. अब अमेरिका के संभावित घटते सैन्य फुटप्रिंट ने पाकिस्तान को एक नया अवसर दिया है.
तुर्की और पाकिस्तान की सैन्य क्षमताओं को सऊदी अरब की आर्थिक ताकत के साथ जोड़ने की संभावना इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है.
Experts इसे सिर्फ सामूहिक सुरक्षा समझौता नहीं, बल्कि डिफेंस इंडस्ट्रियल कोऑपरेशन के संभावित मंच के रूप में देखते है, जहां पाकिस्तान का सैन्य अनुभव और तुर्की की रक्षा उत्पादन क्षमता मिल सकती है.
भारत के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पाकिस्तान अपनी सैन्य उपयोगिता को केवल दक्षिण एशिया तक सीमित रखने के बजाय पश्चिम एशिया तक विस्तार दे सकता है.
2. ‘मुस्लिम NATO’ की चर्चा, लेकिन अंदरूनी कमजोरियां बड़ी
समझौते में किसी एक सदस्य पर हमला होने की स्थिति में सामूहिक प्रतिक्रिया की अवधारणा को NATO के Article 5 से जोड़कर देखा जा रहा है. लेकिन तीनों देशों के खतरे एक जैसे नहीं हैं.
पाकिस्तान का पारंपरिक सुरक्षा फोकस भारत है. तुर्की की अपनी चिंताएं ग्रीस और साइप्रस से जुड़ी हैं, जबकि सऊदी अरब के लिए ईरान और इजराइल से पैदा होने वाली सुरक्षा चुनौतियां ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
यानी एक साझा दुश्मन के बजाय साझा सुरक्षा जरूरत इस गठबंधन की बुनियाद है. यही इसकी ताकत भी है और कमजोरी भी.
भारत के लिए इसका अर्थ है कि पाकिस्तान को ऐसा मंच मिल सकता है जहां वह भारत-केंद्रित सुरक्षा विमर्श को व्यापक मुस्लिम सुरक्षा विमर्श से जोड़ने की कोशिश करे. हालांकि यह अभी तय नहीं है कि किसी भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में सऊदी अरब या तुर्की किस स्तर तक पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे.
3. पाकिस्तान की असली ताकत: परमाणु क्षमता और सैन्य अनुभव
इस नए समीकरण में पाकिस्तान की सबसे बड़ी रणनीतिक पूंजी उसकी परमाणु क्षमता और सैन्य अनुभव है. बातचीत में यह तर्क सामने आता है कि सऊदी अरब लंबे समय से परमाणु क्षमता को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं के कारण विकल्प तलाशता रहा है.
वहीं तुर्की के पास मजबूत पारंपरिक सैन्य क्षमता और रक्षा उत्पादन का अनुभव है. पाकिस्तान के पास परमाणु हथियारों के साथ-साथ पश्चिमी और पूर्वी दोनों प्रकार की सैन्य प्रणालियों के इस्तेमाल का अनुभव है.
इस लिहाज से संभावित समीकरण कुछ ऐसा बनता है:
सऊदी का पैसा + तुर्की की रक्षा तकनीक + पाकिस्तान का सैन्य अनुभव = नया क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा.
भारत के लिए चिंता का विषय यह है कि पाकिस्तान को एक बार फिर ‘strategic security provider’ के रूप में पेश करने की जमीन मिल सकती है.
4. अमेरिका पीछे हटे तो पाकिस्तान के लिए जगह, लेकिन भारत के लिए भी अवसर
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि अमेरिका का पश्चिम एशिया में अपना सैन्य फुटप्रिंट कम करने का प्रयास है. यह ‘influence छोड़ना’ नहीं, बल्कि military cost और direct involvement कम करना है.
यदि अमेरिका कुछ जिम्मेदारियां क्षेत्रीय शक्तियों को सौंपता है, तो सुरक्षा का खाली स्थान पैदा होगा. पाकिस्तान और तुर्की इसी स्पेस को भरने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन भारत के लिए तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है.
भारत के सऊदी अरब और UAE के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक संबंध हैं. इसलिए पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी रक्षा समझौते का अर्थ यह नहीं कि सऊदी अरब भारत विरोधी खेमे में चला गया. बल्कि नई पश्चिम एशियाई राजनीति multi-alignment पर आधारित हो सकती है- जहां एक देश अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग साझेदारों के साथ काम करे.
यही कारण है कि भारत को पाकिस्तान के नए सैन्य समीकरण का जवाब किसी नए सैन्य गुट में शामिल होकर नहीं, बल्कि सऊदी, UAE, इजराइल, अमेरिका और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को और गहरा करके देना होगा.
5. भारत के लिए सबसे बड़ा सबक: पाकिस्तान को ‘एकमात्र मुस्लिम आवाज’ बनने से रोकना
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक असर शायद सैन्य नहीं, बल्कि कूटनीतिक है.
पाकिस्तान लंबे समय से खुद को मुस्लिम दुनिया की एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता रहा है. परमाणु हथियारों की मौजूदगी उसे इस दावे के लिए अतिरिक्त वजन देती है. तुर्की के साथ सैन्य साझेदारी और सऊदी अरब के साथ रक्षा समझौता इस नैरेटिव को और मजबूती दे सकता है.
लेकिन पश्चिम एशिया की राजनीति अब पहले जैसी नहीं है. सऊदी अरब अपने हितों के आधार पर ईरान, अमेरिका, चीन, भारत और यहां तक कि इजराइल के साथ अलग-अलग स्तर पर संवाद करता है. UAE भी अपनी स्वतंत्र रणनीतिक भूमिका विकसित कर रहा है.
इसलिए भारत के सामने चुनौती पाकिस्तान के इस गठबंधन को ‘तोड़ना’ नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि पाकिस्तान इस नए सुरक्षा ढांचे को भारत-विरोधी मंच में बदलने में सफल न हो.
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