अरावली बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, बनाई विशेषज्ञ समिति; तय होगी पर्वत की परिभाषा और खनन-संरक्षण के नियम

Supreme Court Aravalli Hills Conservation Committee: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पर्वतमाला की पर्यावरणीय सुरक्षा और खनन गतिविधियों के नियमन के लिए पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति का गठन किया है. समिति 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सौंपेगी और अरावली की वैज्ञानिक परिभाषा तथा सीमांकन पर सुझाव देगी.

Supreme Court Aravalli Hills Conservation Committee: भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण पहल की है. अदालत ने पांच सदस्यीय उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जो अरावली पर्वतमाला और उससे जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों की वैज्ञानिक परिभाषा और सीमांकन तय करने पर काम करेगी. इसका उद्देश्य भविष्य में खनन गतिविधियों को नियंत्रित करना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना है.

31 अगस्त तक रिपोर्ट सौंपेगी समिति

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने समिति को 31 अगस्त तक विस्तृत संरक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है. अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास जैसे संवेदनशील विषयों पर बिना विशेषज्ञों की वैज्ञानिक राय के कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सकता. इसलिए अरावली से जुड़े मौजूदा ढांचे और नियमों की दोबारा समीक्षा आवश्यक है.

कंचन देवी की अध्यक्षता में गठित हुई समिति

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) की महानिदेशक कंचन देवी को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है. समिति में वन सर्वेक्षण विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष अशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण मंत्रालय के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौड़ और दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व प्रमुख प्रोफेसर अशोक कुमार भटनागर को सदस्य के रूप में शामिल किया गया है.

इसके अलावा इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स के प्रोफेसर जगदीश कृष्णास्वामी और केंद्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा के प्रोफेसर लक्ष्मीकांत शर्मा को विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में जोड़ा गया है. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय का निदेशक स्तर का एक अधिकारी समिति के सदस्य सचिव की भूमिका निभाएगा.

मौजूदा परिभाषा पर जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में अरावली क्षेत्र की जो परिभाषा लागू है, उसके अनुसार केवल दो या अधिक पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के दायरे वाले क्षेत्र को ही अरावली माना जाता है. अदालत का मानना है कि इतनी सीमित परिभाषा के कारण कई पर्यावरणीय रूप से जुड़े क्षेत्र अरावली के दायरे से बाहर हो सकते हैं. इससे ऐसे इलाकों में खनन और अन्य गतिविधियों का रास्ता खुल सकता है, जिनका पर्यावरण पर गंभीर असर पड़ सकता है.

राजस्थान की हजारों पहाड़ियों पर भी उठे सवाल

पीठ ने यह भी कहा कि समिति को उन चिंताओं की जांच करनी चाहिए जिनके अनुसार राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही निर्धारित 100 मीटर ऊंचाई के मानक को पूरा करती हैं. अगर यही मानक लागू रहता है तो बड़ी संख्या में पहाड़ी क्षेत्र पर्यावरणीय सुरक्षा के दायरे से बाहर रह सकते हैं. अदालत यह चाहती है कि समिति इस विषय पर वैज्ञानिक और वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करे.

पर्यावरणीय नुकसान की आशंका का अध्ययन करेगी समिति

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अरावली क्षेत्र जैव विविधता और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद संवेदनशील है. इसलिए समिति को यह भी जांचना होगा कि प्रस्तावित बदलावों से कहीं ऐसे पर्यावरणीय प्रभाव तो नहीं पड़ेंगे, जिन्हें बाद में ठीक करना मुश्किल या असंभव हो जाए. अदालत ने स्पष्ट किया कि भविष्य में कोई भी निर्णय केवल वैज्ञानिक तथ्यों, पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के सिद्धांतों के आधार पर ही लिया जाना चाहिए.

सभी पक्षों से मांगे जाएंगे सुझाव

मामले से जुड़े हितधारकों की संख्या को देखते हुए अदालत ने समिति को सार्वजनिक सूचना जारी करने का निर्देश दिया है. समिति दिल्ली, राजस्थान और हरियाणा की सरकारों, पर्यावरण संगठनों, खनन पट्टा धारकों, किसानों, खदान श्रमिकों और स्थानीय समुदायों सहित सभी संबंधित पक्षों से सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित करेगी.

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स्वत: संज्ञान मामले में आया आदेश

यह आदेश सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली पर्वतमाला की परिभाषा और सीमांकन से जुड़े स्वत: संज्ञान (सुओ मोटू) मामले की सुनवाई के दौरान दिया गया. अदालत पहले ही अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियों पर रोक लगा चुकी है. अब विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर आगे की दिशा तय की जाएगी. मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को निर्धारित की गई है.

उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय ढाल है अरावली

अरावली पर्वतमाला को उत्तर-पश्चिम भारत की पर्यावरणीय जीवनरेखा माना जाता है. यह पश्चिमी रेगिस्तानी इलाकों और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच प्राकृतिक अवरोधक का काम करती है. विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली न केवल भूजल संरक्षण और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि क्षेत्रीय जलवायु संतुलन बनाए रखने में भी इसकी बड़ी भूमिका है. यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसके संरक्षण को राष्ट्रीय महत्व का विषय मानते हुए विशेषज्ञ समिति के गठन का फैसला किया है.

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