सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (6 अगस्त) को बोफोर्स मामले में फैसला सुनाते हुए उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें 2005 के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी. दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फैसले में हिंदुजा बंधुओं और स्वीडन की हथियार बनाने वाली कंपनी एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी थी. अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद इस मामले को फिर से खोलने की संभावना लगभग खत्म हो गई है.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अधिवक्ता अजय के. अग्रवाल की ओर से दायर अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया. इसके साथ ही दशकों पुराने बोफोर्स मामले को फिर से शुरू करने की एक और कोशिश भी खत्म हो गई.
मामले को अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता : सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान वकील अजय के. अग्रवाल ने अदालत से चार सप्ताह का समय मांगा, ताकि याचिका से श्रीचंद पी. हिंदुजा और गोपीचंद पी. हिंदुजा के नाम हटाए जा सकें, क्योंकि दोनों का निधन हो चुका है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया और साफ कहा कि इस मामले को अब और लंबा नहीं खींचा जा सकता.
ये भी पढ़ें: सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार ने कानून में संसोधन किया, लेकिन मनी बिल पर क्यों हो रहा विवाद
सुनवाई के दौरान जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सवाल उठाया कि जब 2005 में दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले की कार्यवाही पहले ही रद्द कर चुका है. उस फैसले को चुनौती देने वाली सीबीआई की अपील भी खारिज हो चुकी है, तो अब इस मामले में फैसला करने के लिए आखिर बचा ही क्या है? अदालत ने इस टिप्पणी के साथ याचिका पर आगे सुनवाई की जरूरत नहीं मानी.
बोफोर्स मामला क्या है?
बोफोर्स मामला साल 1986 में शुरू हुआ, जब भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स से करीब 1,437 करोड़ रुपये में 400 हॉवित्जर तोपें खरीदने का समझौता किया. इसके एक साल बाद 1987 में स्वीडिश रेडियो ने दावा किया कि इस सौदे में कुछ भारतीय नेताओं और रक्षा अधिकारियों को रिश्वत (कमीशन) दी गई थी. इस खुलासे के बाद देश में बड़ा राजनीतिक बवाल मच गया और यह मामला भारत के सबसे चर्चित भ्रष्टाचार मामलों में शामिल हो गया.
