सोनम वांगचुक ने कहा– मेरी रिहाई कोई मायने नहीं रखती, अगर लद्दाख नहीं जीतता

Sonam Wangchuk :  लद्दाख के लिए छठी अनुसूची के तहत विशेष दर्जे की मांग के लिए किए गए आंदोलन के दौरान लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित करने के आरोप में एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी हुई थी. वे पूरे 170 दिनों तक जेल में रहने के बाद 14 मार्च को एनएसए हटाए जाने के बाद रिहा हुए हैं.

Sonam Wangchuk : लद्दाख के क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने रिहाई के बाद कहा कि मैं  आज बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं. मैं अपनी आवाज वापस पाने, अपने छोटे पंख फैलाने और खुद को नयी दिशा देने की ओर अग्रसर हूं. 

सोनम वांगचुक ने कहा कि मेरे साथ और मेरी पत्नी के साथ जिस तरह का व्यवहार हुआ उसकी डरावनी कहानी बताने को मैं तैयार था. कैसे अचानक मेरे घर से मुझे, आप जानते हैं, कपड़े लपेटकर इस जेल में डाल दिया गया, बिना अपने परिवार या अपने वकीलों को कई दिनों तक फोन भी नहीं करने दिया गया. हालांकि जेल में सबकुछ अनुशासित था.

सरकार ने बातचीत के लिए हाथ बढ़ाया 

170 दिनों तक जेल में रहने के बाद सोनम वांगचुक ने मीडिया के सामने कहा कि मैं थोड़ा लालची इंसान हूं. मेरे लिए एक जीत काफी नहीं है. मैं हमेशा एक विन–विन यानी जीत की तलाश में रहता हूं. सोनम ने कहा कि मेरी जीत का कोई मतलब नहीं है अगर जिन वजहों को वो रिप्रेजेंट करते हैं, वे नहीं जीतते हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने भरोसा बनाने और मतलब की बातचीत को आसान बनाने के लिए हाल ही में हाथ बढ़ाया है. यह बहुत अच्छी बात है क्योंकि इस तरह लद्दाख भी जीतेगा और हमारी वजह भी जीतेगी. उन्होंने कहा कि एनएसए का दुरुपयोग ना हो इसपर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए.

राष्ट्रीय सुरक्षा कानून हटाने पर हुई सोनम वांगचुक की रिहाई

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 14 मार्च को सोनम वांगचुक पर लगाया गया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून हटा लिया, जिसके बाद उनकी रिहाई संभव हो सकी. सोनम वांगचुक पूरे 170 दिनों तक जोधपुर जेल में रहे. उनपर आरोप यह था कि उन्होंने आंदोलन के दौरान स्थानीय लोगों को हिंसा के लिए प्रेरित किया.

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By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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