Smash the Patriarchy 2: जब गाली बनी Gen Z की स्लैंग, तो लड़कियों के लिए क्यों बदल जाता है पैमाना?

भारतीय समाज में लड़कियों के सिर पर इज्जत की इतनी भारी टोकरी रख दी जाती है कि उनके जन्म के साथ ही उनकी जुबान, चाल-ढाल और व्यवहार पर पहरा बैठा दिया जाता है. उनसे कहा जाता है कि वे परिवार की इज्जत हैं, इसलिए उन्हें क्या पहनना है, कैसे बोलना है, कहां जाना है और किस तरह व्यवहार करना है, इसका हिसाब भी उन्हें ही रखना होगा. एक संस्कारी लड़की को आज भी संस्कारवान परिवार की पहचान माना जाता है.

ऐसे में जब Gen Z लड़कियों की जुबान से बिना कॉमा-फुलस्टॉप के गालियां निकलती हैं, तो कई लोगों को यह किसी कल्चरल शॉक से कम नहीं लगता. सड़क पर कोई लड़की गाली दे दे तो बात सिर्फ उसकी भाषा तक नहीं रहती, उसके चरित्र से होते हुए परिवार की परवरिश और संस्कार तक पहुंच जाती है. वहीं यही काम कोई लड़का करे तो अक्सर उसे लड़कों की आदत, दोस्तों की भाषा या मस्ती कहकर टाल दिया जाता है. सवाल यह है कि गाली गलत है या उसका जेंडर तय करता है कि उसे कितना गलत माना जाएगा? क्या लड़कियों की जुबान पर लगाई गयी पाबंदियां उन्हें विद्रोही बना रही हैं? या फिर सोशल मीडिया और Gen Z की स्लैंग कल्चर ने भाषा की उन सीमाओं को ही बदल दिया है, जिन्हें पिछली पीढ़ियां मर्यादा मानती थीं? इस कहानी को समझने के लिए हमने अलग-अलग शहरों की Gen Z लड़कियों से बात की. उनकी बातें बताती हैं कि वे गाली को सही नहीं ठहरातीं, लेकिन यह सवाल जरूर उठाती हैं कि भाषा और चरित्र का पैमाना लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग क्यों हो?

पहले Gen Z को समझें

लखनऊ की शाम्भवी मुखर्जी जो पेशे से एक टीचर हैं कहती हैं कि इस विषय को समझने के लिए पहले आपको जेन जी को समझना होगा. जेन जी दो तरह के हैं-एक जो मेट्रो सिटी में रहते हैं और दूसरे वो जो स्माॅल टाउन में रहते हैं. आप देखेंगे कि जो स्माॅल टाउन के जेन जी हैं, उनके लैंग्वेज में अभद्र शब्द कम होते हैं, जबकि मेट्रो सिटी के जेन जी में ज्यादा होते हैं. यहां यह गौर करने वाली बात भी है कि दोनों के ब्रिंग अप में भी काफी फर्क होता है. किसी को अपने पैरेंट्‌स के साथ ज्यादा समय बिताने का मौका मिलता है और किसी को कम. ऐसे में वे सोशल मीडिया की ओर जाते हैं, जहां अभद्र भाषा और गालियों की भरमार है.

अगर बात सिर्फ गाली देने की है, तो इसे ऐसे समझना चाहिए कि हमारे समाज में यह बहुत आम है. शहरी महिलाएं भले ही पब्लिक प्लेस में उस तरह से गालियां ना बकती हों, लेकिन गांव की महिलाएं, छोटे शहरों की महिलाएं काफी पुराने समय से गालियां देती रही हैं.

जेंडर बायसनेस ने महिलाओं को बनाया rebellious

शाम्भवी मुखर्जी कहती हैं कि हमारे समाज में जेंडर बायनेस तो आज भी है, चाहे उसकी वजह कुछ भी हो. मैं इस बात को मानती हूं कि मां-बाप अपनी सुरक्षा के लिए लड़कियों पर बंदिश लगाते हैं, लेकिन कहीं ना कहीं इन्हीं बंदिशों ने लड़कियों को रिबेलियस यानी विद्रोही बना दिया. अगर गाली देना बुरी बात है तो इसके लिए लड़कों को भी रोका जाना चाहिए. सिगरेट पीने से अगर कैंसर होता है, तो यह ज्ञान सिर्फ लड़कियों को नहीं लड़कों को भी देना चाहिए. बस इसी वजह से लड़कियों ने उन मर्यादाओं को तोड़ा, जो उनपर बंदिशें लगा रही थीं. आईआईटी दिल्ली की मुस्कान झा कहती हैं कि गाली देना बुरी बात है यह सबको पता है, लेकिन अगर आप इसे केवल लड़कियों से जोड़ते हैं तो वह सही नहीं लगता है. इसकी वजह यह कि आप इससे महिलाओं का कैरेक्टर डिफाइन करने लगते हैं. इसमें लड़का और लड़की का फर्क नहीं किया जाना चाहिए.

गाली देना किसी की पर्सनालिटी डिफाइन नहीं करता

आईआईटी दिल्ली की मुस्कान कहती हैं कि यहां आने से पहले मैं बहुत संकोची स्वभाव की थी और मुझे ऐसा लगता था कि गाली देने वाला व्यक्ति खराब होता है. आईआईटी दिल्ली आकर मैंने यह जाना कि ऐसा नहीं है, गाली देना अलग बात है और अच्छा इंसान होना अलग. कई लोग ऐसे हैं जो अपनी भाषा में गालियों का प्रयोग नहीं करते, लेकिन उनकी सोच छोटी होती है. लड़कियां जब अपने घरों में रहती हैं

ग्रुपिंग के लिए गाली-गलौच की भाषा में बात करते हैं जेन जी

मुस्कान कहती हैं कि जेन जी को यह पता है कि भाषा की मर्यादा क्या होती है. हमलोग अपने दोस्तों के साथ बातचीत में दोस्ताना माहौल के लिए गाली-गलौज की भाषा में जरूर बात करते हैं, लेकिन किसी पब्लिक प्लेस में या अपने पैरेंट्‌स के सामने ऐसे बात नहीं करते हैं. हमें पता है कि भाषा की मर्यादा क्या होती है. मुंबई की आरुषि अभी ग्रेजुएशन कर रही हैं वे कहती हैं कि गाली अब बोलचाल का हिस्सा हो गया है. जेन जी जिस माहौल में जिस तरह से पल पढ़ रहे हैं, उन्हें इस तरह की भाषा का प्रयोग करना पड़ता है क्योंकि सब कर रहे हैं. अगर नहीं करेंगे तो उनका मजाक बनेगा. रांची की प्राची भी इस बात को कहती हैं कि अगर आप जेन जी के स्लैंग का प्रयोग नहीं करेंगे तो आप उनके ग्रुप से बाहर हो जाएंगे और आपका मजाक बनेगा. बस इसी चक्कर में वे गालियां देते हैं.

सोशल मीडिया ने बिगाड़ी भाषा


जंतर मंतर पर प्रदर्शन की तस्वीर (Photo- PTI)

आरुषि कहती हैं कि Gen Z के जीवन का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया पर गुजरता है. रील्स, मीम्स, कमेंट्स और चैटिंग में जिस तरह की स्लैंग और बेझिझक भाषा का इस्तेमाल होता है, वह धीरे-धीरे उनकी रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाती है. शुरुआत में जो शब्द सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित होते हैं, वही दोस्तों के बीच बातचीत में आने लगते हैं और फिर आदत का हिस्सा बन जाते हैं. कई बार ऐसी भाषा को ‘कूल’, बेबाक और ग्रुप में घुलने-मिलने का तरीका भी माना जाता है. यही वजह है कि Gen Z के लिए कुछ ऐसे शब्द, जिन्हें पिछली पीढ़ियां अभद्र मानती थीं, अब सामान्य बोलचाल और स्लैंग का हिस्सा बन चुके हैं.

जंतर-मंतर पर जो हुआ वह गलत

इस स्टोरी के दौरान प्रभात खबर ने अलग-अलग शहरों की कई Gen Z लड़कियों से बात की. दिलचस्प बात यह रही कि एक भी लड़की ने जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री के प्रति इस्तेमाल की गयी आपत्तिजनक भाषा को सही नहीं ठहराया. उनका साफ कहना था कि असहमति जताने और किसी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करने के बीच फर्क होना चाहिए. देश के प्रधानमंत्री के खिलाफ इस तरह की टिप्पणी उचित नहीं है-चाहे वह कोई लड़का करे या लड़की.

हालांकि, इन लड़कियों ने एक और सवाल भी उठाया कि अगर किसी की भाषा आपत्तिजनक है, तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन सिर्फ लड़की होने की वजह से उसे कठघरे में खड़ा करना भी सही नहीं है. गाली को गलत मानने का पैमाना जेंडर के आधार पर नहीं, बल्कि सबके लिए एक जैसा होना चाहिए.

महिलाओं की भाषा पर पहरे की कोशिश बहुत पुरानी

अमेरिकी भाषाविद् और समाजभाषाविज्ञानी रॉबिन लैकॉफ ने 1973 में अपनी चर्चित किताब Language and Woman's Place में महिलाओं की भाषा को लेकर समाज की उम्मीदों पर सवाल उठाया था. उनका तर्क था कि महिलाओं से बोलचाल में अधिक विनम्र, संयमित और स्त्रियोचित होने की अपेक्षा की जाती है. यानी समाज सिर्फ यह तय नहीं करता कि महिला क्या करेगी, बल्कि यह भी तय करने की कोशिश करता है कि वह किस तरह बोलेगी.लैकॉफ के विश्लेषण में महिलाओं से तीखे शब्दों और गालियों यानी से बचने की सामाजिक अपेक्षा भी शामिल थी. यही वजह है कि किसी महिला की बेबाक या आक्रामक भाषा को अक्सर उसके पुरुष समकक्ष की तुलना में ज्यादा असामान्य माना जाता है.

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लेखक के बारे में

By रजनीश आनंद

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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