Pahalgam Attack Anniversary: यह पहलगाम की वही हसीन वादियां हैं, जिनकी सुकून भरी जमीन पर पाकिस्तान से आए कुछ दहशतगर्दों ने आज से करीब एक साल पहले, यानी 22 अप्रैल 2025 को बड़ा आतंकी हमला किया था. इस हमले के जख्मों के निशान आज भी बैसरन घाटी की वादियों में महसूस किए जाते हैं. हालांकि यह कहना गलत नहीं होगा कि आतंक का यह घाव धीरे-धीरे भर रहा है, लेकिन पहलगाम की खूबसूरती के दामन पर यह हमला आज भी एक धुंधले दाग की तरह मौजूद है, जिसे पूरी तरह मिटाया नहीं जा सका है.
पहलगाम धीरे-धीरे गुलजार हो रहा है. लेकिन, पर्यटक जो यहां स्थानीय लोगों की रोजी-रोटी का एक बड़ा जरिया हैं, घट कर आधे रहे गए हैं. पीक सीजन यानी अप्रैल से जुलाई तक जहां पर्यटकों का हुजूम रहता था, वहां लगभग 40 से 50 फीसदी पर्यटक ही श्रीनगर, सोनमर्ग, गुलमर्ग और पहलगाम आ रहे हैं. यहां टूर एंड ट्रेवल का काम करने वाले ताज इरशाद बताते हैं कि पहलगाम हमले के तीन दिनों के भीतर किस तरह पूरा का पूरा कश्मीर पर्यटकों से खाली हो गया था. उसके बाद के 6 महीनों तक पर्यटकों का आना लगभग पूरी तरह बंद रहा. अब लोग धीरे-धीरे लोग कश्मीर की वादियों का रूख कर रहे हैं, लेकिन इतना तय है की यह संख्या अभी भी आधी ही है.
दरअसल बैसरन घाटी आज भी सुरक्षा कारणों से बंद है. चंदनवाड़ी घाटी पर भी रोड निर्माण का कार्य चल रहा है, लिहाजा वह भी बंद है. दुनिया जहां की खूबसूरती बटोरे आरू घाटी पर पर्यटकों की आवाजाही है. यहां काम करने वाले स्थानीय कश्मीरी युवकों का बड़ा तबका पर्यटकों की ख़िदमत कर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा है.
चाहे वह गुलमर्ग की 13800 फीट की ऊंचाई हो, बेताब घाटी हो, पहलगाम की आरू घाटी हो , हसीन ट्यूलिप गार्डन हो या डल लेक पर तैरता शिकारा, सभी जगहों पर कश्मीरी नौजवान और मेहनतकश बुज़ुर्ग आपको मेहनत करते दिखेंगे. पर्यकटों के लिए इनका एक ही पैग़ाम है- “आपलोग आएंगे, तो हमारा घर चलेगा”. 1998 से डल लेक पर पर्यटकों को शिकारा की सैर कराने वाले बशीर ने अपनी बात हमसे साझा की और कहा “पिछले साल 22 अप्रैल को जब पहलगाम हमला हुआ था, तब सबकुछ थम गया था,लेकिन अब धीरे-धीरे लोग आ रहे हैं.“ जब मैंने उनसे पूछा कि आप क्या चाहते हैं तो उन्होंने चेहरे पर मुस्कुराहट लिए हुए कहा “हम यही चाहते हैं कि कस्टमर (पर्यटक) आएं , हम कमाने लगेंगे और वह भी खुश हो जाएगा.
बशीर और ताज इरशाद जैसे कितने ही कश्मीरी बाशिंदों की रोजी-रोटी पूरे इलाके में सिर्फ और सिर्फ पर्यटकों के दम पर ही चलती है. जाहिर तौर पर यह बिना पर्यटकों के इनके घरों का चूल्हा ठंडा पड़ सकता है. यही हाल फिलहाल एक साल से बंद पड़े बैसरन घाटी के कई स्थानीय लोगों का है जो पर्यटकों से होने वाली आय पर आश्रित थे, ऐसे में पिछले एक साल से उनकी आमदनी की हालत खस्ता है. पूरे पहलगाम में दबी जुबान में कहा जाने वाला सच यही है कि अगर आतंकी पर्यटकों को निशाना बनाने की गलती करेंगे तो यह तय है कि पूरा का पूरा इलाका रोजी-रोटी के लिए मोहताज हो जाएगा. वह एक गलती जो दहशतगर्दों ने बीते 22 अप्रलै 2025 को की थी, वह दोबारा ना हो पूरा का पूरा पहलगाम और कश्मीर सिर्फ और सिर्फ यही चाहता है.
राजीव किशोर
