Odisha Train Accident: पिता की आस ने बेटे को मुर्दाघर से जिंदा वापस किया, जानें पूरी कहानी

कोलकाता के रहने वाले हेलाराम मलिक को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुछ घंटे पहले अपने जिस बेटे को उन्होंने शालीमार स्टेशन पर कोरोमंडल एक्सप्रेस में चढ़ाया था उसकी मौत ट्रेन एक्सीडेंट में हो सकती है.

ओडिशा ट्रेन दुर्घटना 2023 : हिंदी में एक कहावत है -जबतक सांस तबतक आस, इस कहावत के अर्थ को चरितार्थ कर दिया है एक पिता की आस ने जो यह मानने को तैयार ही नहीं था कि उसके बेटे की मौत ओडिशा रेल हादसे में हो गयी है और अंतत: उसकी आस ने उसके बेटे को जिंदा लौटा दिया. टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के अनुसार कोलकाता के रहने वाले हेलाराम मलिक को यह विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कुछ घंटे पहले अपने जिस बेटे को उन्होंने शालीमार स्टेशन पर कोरोमंडल एक्सप्रेस में चढ़ाया था उसकी मौत ट्रेन एक्सीडेंट में हो सकती है. यही वजह थी कि उन्होंने हावड़ा से बालासोर की 230 किलोमीटर की यात्रा तय की और अपने बेटे विश्वजीत मलिक को ढूंढ़ना शुरू किया और अंतत: उसे जिंदा अपने साथ लेकर गये.

दुर्घटना के बाद बेटे को किया फोन तो मिला ये जवाब

हावड़ा के रहने वाले और पेशे से दुकानदार हेलाराम मलिक को जैसे ही कोरोमंडल एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने की जानकारी मिली उन्होंने तुरंत अपने बेटे के मोबाइल पर फोन किया और उनकी किस्मत अच्छी थी कि विश्वजीत ने फोन उठा लिया और बताया कि वे अभी जीवित हैं, लेकिन बहुत पीड़ा में हैं. बस इतना सुनना था कि हेलाराम मलिक ने बालासोर जाने का निश्चय कर लिया.

अस्पताल में बेटे को तलाशते रहे हेलाराम

हेलाराम ने स्थिति की गंभीरता को समझा और अविलंब एक स्थानीय एंबुलेंस चालक पलाश पंडित से संपर्क किया और ओडिशा के बालासोर रवाना हो गये. उनके साथ उनके साले भी थे. अगले दिन वे देर रात बालासोर पहुंचे, कई अस्पतालों में पता करने के बाद भी उन्हें अपने बेटे की कोई सूचना नहीं मिली. लेकिन हेलाराम ने हिम्मत नहीं हारी और वे लगातार अपने बेटे के बारे में पता करते रहे. टाइम्स आॅफ इंडिया के अनुसार हेलाराम के साले ने बताया कि हमें कुछ लोगों ने कहा कि अगर अस्पताल में आपका बेटा नहीं मिल रहा तो आप स्कूल जाकर देखें, वहां शव रखे गये हैं. यह बात सुनकर उनके होश उड़ गये, लेकिन उनके पास कोई रास्ता नहीं था. वे उस अस्थायी मुर्दाघर पहुंचे और वहां उन्होंने जो देखा वह अचंभित करने वाला था.

मुर्दों के बीच पड़ा था विश्वजीत मलिक

हेलाराम का बेटा विश्वजीत वहां मुर्दों के बीच पड़ा था, लेकिन उसके दाहिने हाथ में तेज कंपन हो रहा था. हेलाराम और उसके साले दीपक दास ने विश्वजीत को तुरंत एंबुलेंस में डाला और उसे लेकर बालासोर अस्पताल गये जहां उसका इलाज हुआ. विश्वजीत बुरी तरह से घायल था और बेहोश था जिस वजह से उसे मृत मानकर मुर्दों के बीच रख दिया गया था. बालासोर अस्पताल में उसकी स्थिति को देखते हुए कटक मेडिकल काॅलेज रेफर कर दिया गया, लेकिन हेलाराम ने एक बांड साइन करके उसे कोलकाता ले गये जहां एसएसकेएम अस्पताल में उसका इलाज हो रहा है. उसकी स्थिति गंभीर है, कई आॅपरेशन हुए हैं, लेकिन वह जीवित है और अपनों के पास है.

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लेखक के बारे में

Author: Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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