पीठ ने सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा, इस तरह भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने से इसी आधार पर नौकरियों की मांग करने वालों की बाढ़ आ जाएगी. गौरतलब है कि मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय ने 10 जुलाई 2026 को इस घटना में जान गंवाने वाले 31 लोगों के परिजनों को नियुक्ति पत्र सौंपे थे.
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि यह फैसला पूरी तरह से गैर-कानूनी और राजनीतिक कदम था. वकील मोहम्मद रशीद के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मानवीय आधार पर नौकरी देने के लिए तय की गई चार प्रमुख गाइडलाइंस के तहत करूर भगदड़ के पीड़ित इस श्रेणी में पात्र नहीं आते हैं. सरकार का तर्क था कि यह नौकरियां एक नीतिगत फैसले के तहत दी गई थीं, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया.
हाई कोर्ट का फैसला युवाओं के लिए एक बड़ी जीत : याचिकाकर्ता के वकील
याचिकाकर्ता के वकील क्लीटस ने इस फैसले को राज्य के युवाओं के लिए एक बड़ी जीत बताया. उन्होंने कहा, "यह पूरे भारत के लिए एक अहम फैसला है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट पहले ही मुआवजे के आदेशों का पालन करने के तरीके पर निर्देश और गाइडलाइंस दे चुका है. तमिलनाडु में मुआवजे के आदेशों के लिए पहले से ही एक सरकारी आदेश (GO) मौजूद है. उसी के आधार पर हमने अपनी दलीलें पेश कीं. इसके बाद, कोर्ट ने उस सरकारी आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत करूर घटना में मारे गए लोगों के परिवारों को नौकरी दी जा रही थी. सरकार ने अपने पक्ष में चार घटनाओं का जिक्र किया था."
