-चरणसिंह केदारखंडी-
महान दार्शनिक राष्ट्रवादी विचारक एवं स्वतंत्रता सेनानी अरविंद घोष के विचार आज के दौर में भी महत्वपूर्ण हैं. 15 अगस्त उनकी जयंती के मौके पर हमें यह समझना चाहिए कि हमें उन्हें क्यों पढ़ना चाहिए और उनके विचारों की खासियत क्या है. ये पांच कारण हैं, जो उन्हें बहुत खास बनाते हैं.
पूरब और पश्चिम का समन्वय
भारतीय समाज में आज दो धाराएं हैं : पहली उस अभिजन वर्ग की है जिसके पास सत्ता, संपत्ति, वर्चस्व और वैभव की भाषा है और जो जीवन दृष्टि, रहन-सहन और आचार-विचार में पूरी तरह पश्चिम से प्रभाव. दूसरी धारा भारतीय भाषा, संस्कृति और परंपरा से गहराई से सम्मोहित (लेकिन पश्चिम की ज्ञान परंपरा और योगदान से लगभग अनजान) उस वृहद समाज की है जो प्रत्येक पश्चिमी विचार, नवाचार और बयार को बिना हिचक अस्वीकृत करता है और उसे अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के लिए बाधक मानता है. मेरे देखे ये दोनों ही विचार और भाव अतिवादी हैं. श्रीअरविंद के जीवन की प्राण नदी इसी अतिवाद को चुनौती देती है. वे पश्चिम के तर्क और विज्ञान वैभव के प्रतीक भी हैं और पूरब के धर्म और ध्यान के प्रतिबिंब भी.
भारत को अतिवाद से बचाने के लिए मध्य मार्ग पर चलना चाहिए
श्रीअरविंद किंग्स कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के सबसे प्रतिभाशाली छात्रों में एक रहे हैं. नोबेल पुरस्कार विजेता रोमां रोलां ने उन्हें ‘पूरब और पश्चिम का पूर्ण संभव समन्वय’ कहा है. उनकी साहित्य दृष्टि और विश्व दृष्टि विराट है और देशबंधु चित्तरंजन दास के उस कथन की याद दिलाती है जिसमें उन्होंने श्रीअरविंद को ‘a lover of humanity’ कहा है.
ग्रीक और लैटिन भाषा में पारंगत श्रीअरविंद का पश्चिम की ज्ञान परंपरा–मुख्यतः रोम और यूनान–पर विशद अध्ययन रहा है. जीवन के 14 वर्षों का समय उन्होंने ब्रिटेन में बिताया और पश्चिम के सामाजिक स्वभाव, राजनीतिक व्यवहार, बौद्धिक आचरण और साहित्य-संस्कृति का गहन अनुभव किया. श्रीअरविंद का यह अध्ययन उनके पत्रों, संदेशों, संपादकीयों सहित ‘सावित्री’ महाकाव्य में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है.
1893 में भारत आकर उन्होंने भारत की आत्मा को आत्मसात किया और उसकी ध्यान/ज्ञान परंपरा पर ‘वेद रहस्य’, ‘ईश उपनिषद’, ‘गीता प्रबंध’, ‘केन और अन्यान्य उपनिषद’ और ‘भारत में पुनर्जागरण’ जैसे ग्रंथों का उपहार दिया…उन्होंने संस्कृत भाषा सीखी और उसमें ‘भवानी भारती’ जैसा काव्य लिखा. श्रीअरविंद के अनुसार संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा होना चाहिए.
भविष्य दृष्टि के योगी
श्रीअरविंद का कहना है कि स्वर्णिम अतीत की परिणति संभावनापूर्ण वर्तमान से स्वर्णिम भविष्य के रूप में होनी चाहिए. श्री अरविंद कहते हैं कि भविष्य के निर्माण में अतीत की उपलब्धियों और उसके 'सांचों' को सुरक्षित रखा जाना चाहिए, लेकिन किसी भी व्यक्ति/समाज और राष्ट्र को अतीतजीवी होकर नहीं, बल्कि भविष्य दृष्टि के साथ जीवन को जीना, जानना और समझना चाहिए. भविष्य को लेकर हमारा विश्वास सकारात्मकता और उम्मीद से पूर्ण होना चाहिए.
Essays on the Gita के पृष्ठ 10 पर वे लिखते हैं :
हमारा संबंध अतीत की उषाओं से नहीं, भविष्य की दोपहरों से है. (We do not belong to the dawns of the past but to the noons of the future.)
वे भारत का स्वर्णिम समय गुजरे अतीत में नहीं, उसके भविष्य में देखते हैं. एक कवि के रूप में उन्होंने ‘भावी कविता’ (The Future Poetry) जैसी टीका लिखकर और ‘सावित्री, एक प्रतीक और आख्यान’ जैसा अनुपम काव्य लिखकर अपनी भविष्य दृष्टि को रेखांकित किया है…. योग को पोथियों और परिभाषाओं के दायरों से समृद्ध करते हुए वे जब ‘सारा जीवन योग है’ – का आह्वान करते हैं तो इस वाक्य में भी योग की भावी समझ ही समाहित है.
अपनी कहानी 'क्षमा का आदर्श’ का निष्कर्ष वे इस तरह प्रस्तुत करते हैं : ‘आने वाले समय में भारत में ऐसे ऋषि पैदा हो रहे हैं जिनकी आभा के आगे अतीत के ऋषियों की आभा मद्धिम पड़ जाएगी’!
स्वराज के पहले उद्घोषक/भारत बोध के नायक
समकालीन भारत मूर्तियों के अनावरण और फॉलोअर्स की संख्या से एक महापुरुष और उसकी विरासत को संजोना चाहता है, लेकिन किसी महापुरुष को याद करने का सबसे उत्कृष्ट मार्ग तो यह है कि समाज मूर्तियों को खड़ी करने के स्थान पर स्वयं उन विचारों और आदर्शों की प्रतिपूर्ति (जीवंत सत्य) बन जाए, जिसका वह महापुरुष प्रतिनिधि रहा है.
यदि स्वतंत्रता दिवस स्वाधीनता संग्राम की विरासत को याद करने का समय है तो आज के भारत को इसलिए भी श्रीअरविंद को याद करना चाहिए क्योंकि उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से 22 साल पहले, वर्ष 1907 में, अपनी पत्रिका 'वंदे मातरम्' के माध्यम से भारत के पूर्ण स्वराज की उद्घोषणा करते हुए कहा था कि जिस देश की इतनी महान ज्ञान परंपरा रही हो, 'पराधीनता उसके पौरुष के अनुकूल नहीं है'. श्रीअरविन्द ने अपने अल्पकालिक राजनीतिक जीवन में स्वराज के साथ-साथ स्वदेशी आंदोलन के विचार, निष्क्रिय प्रतिरोध का सिद्धांत, लोकतंत्र में आम आदमी की भागीदारी का मूल्य, ग्राम स्वराज्य/ग्रामोत्थान, स्वावलंबी/आत्मनिर्भर भारत और शिक्षा को औपनिवेशिक प्रभाव से मुक्त रखने की बात न केवल जोर देकर की, बल्कि सुबोध मल्लिक जैसे राष्ट्रवादी राजाओं के सहयोग से 'बंगाल नेशनल कॉलेज' की स्थापना जैसे जमीनी प्रयास भी किए.
वे मानते हैं कि जिस देश का मानस कैद है, उसकी स्वाधीनता अक्षुण्ण नहीं रह सकती.
आज हम भारतीय हैं, लेकिन भारत और भारतीय ज्ञान परंपरा की सुवास हमारे भीतर अनुपस्थित है.
भारत और उसकी ध्यान-ज्ञान परंपरा को समझने के लिए श्रीअरविन्द को पढ़ा जाना चाहिए. उन्होंने वेदों, उपनिषदों, पुराणों, दो महान महाकाव्यों सहित भारतीय ज्ञान परंपरा के अनेक महत्वपूर्ण आयामों पर ऋषि दृष्टि से मंथन किया है.
आज का भारत धार्मिक, जातीय, विचारधारा, भाषा, उत्तर-दक्षिण और लेफ्ट विंग और राइट विंग की binaries में बंट गया है. आज हम शायद ही कोई बात भारतीय होकर सोचते हैं और भारत के लिए सोचते हैं. हम भारत के नहीं, अपने विचार, राजनीतिक रुझान, भाषा और जाति के कुनबे के होकर रह गए हैं. यह स्थिति हमारे 'भारतबोध' के लिए हानिकारक है.
विचारवान युवा शक्ति के लिए प्रेरणा
श्रीअरविन्द बहुत ठाठ-बाठ, विशेषाधिकार और वर्चस्व का जीवन चुन सकते थे. उन्होंने 1890 में आई.सी.एस. (वर्तमान में I.A.S.) की परीक्षा पास कर ली थी. लेकिन उन्होंने ब्रिटिश राज की नौकरी स्वीकार नहीं की और असुरक्षा की सुरक्षा का कंटकाकीर्ण अग्निपथ चुना. आज जब देश को सुविधाहीन, विपन्न, रुग्ण और थर्ड वर्ल्ड का मानकर पहला अवसर मिलते ही युवा उसे छोड़कर जा रहे हैं, तब एक बार पुनः 'बंगाल नेशनल कॉलेज (आज की जादवपुर यूनिवर्सिटी) में 23 अगस्त 1907 को युवाओं को दी गयी श्रीअरविन्द की इस अनमोल 'सलाह' का पुनर्पाठ होना चाहिए .
'जब मैं लौटकर वापस आऊं तो तुममें से कुछ लोगों को मैं महान बनते हुए देखना चाहता हूं, अपने लिए महान नहीं, बल्कि भारत माता के लिए महान. मैं तुममें से कुछ को धनवान बनते हुए देखना चाहता हूँ, लेकिन तुम्हारे तुच्छ अहंकार की तृप्ति के लिए धनवान नहीं, बल्कि इसलिए कि तुम्हारे धन से भारत माता धनवान हो सके...पीड़ा भोगो ताकि माँ भारती आनंद मना सके, कर्म करो ताकि माँ भारती सम्पन्न हो सके. सब कुछ इस एक सलाह में सम्मिलित है'.
(Speeches page 6/7)
आज के भारत में हम भारत माता को विपन्न करके स्वयं धनवान होना चाहते हैं. राष्ट्रव्यापी भ्रष्टाचार के इस दौर में श्री अरविन्द की सलाह प्रासंगिक है.
मौलिक चिंतन पर 1913 के आसपास लिखा श्रीअरविन्द का निबंध 'On Original Thinking’ तो हमारे समय के लिए इतना अपरिहार्य है कि उसे भारत के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में होना चाहिए. इस निबंध में वे स्पष्ट रूप से लिखते हैं कि अपने लिए मौलिक चिंतन करने वाला देश ही जीवित रह पाता है और अपनी स्वाधीनता और विचार निधि को सुरक्षित रख पाता है.
अस्तित्व कभी भी अधूरे सृजन से संतुष्ट नहीं होता और मानव अंतिम नहीं है, केवल एक मध्यवर्ती कड़ी है
तमाम सामाजिक, नैतिक और वैधानिक विधानों, धार्मिक उपदेशों, शास्त्र और प्रवचनों के भयों और भयादोहन के बाद भी मनुष्य मनुष्य होने के लिए जूझ रहा है.
कुछ लोगों को लग सकता है कि पाषाणकाल बीत गया है, लेकिन वस्तुतः वह जारी है. मनुष्य की पशु वृत्तियों, हिंसक और हत्यारे स्वभाव में जरक भी कमी नहीं आयी है. जरा सा कुरेदने पर उसके भीतर दुबका हुआ आदिमानव सतह पर आ जाता है. वह शाम को बुद्ध की बात करता है और सुबह युद्ध की तैयारी करता है!
आप पूरी कायनात को परिवार मानने का उपदेश पढ़ता है, लेकिन 4 व्यक्तियों के परिवार को एक सूत्र में पिरोने और उनके भीतर मैत्री और प्रेम का संचार करने में असफल हो रहा है! वह सोशल मीडिया पर ख़ुश और कामयाब है, लेकिन वास्तविक जिंदगी में अवसाद और अनिद्रा की गोलियां लेकर सो रहा है.
क्या प्रकृति इस तरह के अधकचरे सृजन को सर्वश्रेष्ठ मान सकती है? कदापि नहीं. इसीलिए धरती पर उद्विकास क्रम चल रहा है. Human body को human being में बदलने की तैयारी जारी है. इसी तैयारी को श्रीअरविन्द ने अतिमानस अथवा अतिमानव कहा है. सही अर्थों में मानव हो जाना अतिमानव होने की प्रारंभिक शर्त है.
अभी धरती का राजा मानवी अहंकार है और अज्ञान उसका अमात्य है. यही कारण है कि चारों ओर इतनी हिंसा, घृणा, अमैत्री और अनाचार है. यही कारण है कि मृत्यु का अट्टहास जीवन के उल्लास पर भारी पड़ रहा है, यही कारण है कि सूर्योदय की उपस्थिति में धरती पर इतना अंधकार है और यही कारण है कि कोयल और बुलबुल के वासंती एहसासों के बाद भी धरती पर पूस की रात विदा नहीं हुई है.
जब तक जीवन में पूरी तरह सत्यचेतना का शासन नहीं हो जाता, तब तक धरती इसी तरह चलती रहेगी और अज्ञान, अवसाद, मृत्यु और अहंकार की शक्तियों का रौरव काल इसी तरह अट्टहास करता रहेगा...
जब श्रीमां पूछती हैं 'सत्य अथवा रसातल'? तो इसका अर्थ यही है.
अतिमानव या सत्य चेतना का मानव श्रीअरविन्द की पूरी साधना का नवनीत है और इस धरती पर चेतना के वसंत का आगमन भी.
ये वसंत संत की तरह जितनी जल्दी आएगा, मानवजाति उतनी लंबी जिएगी.
