बहुत चालाक हैं कश्मीर के जंगल में छिपे पाकिस्तानी आतंकी! सुरक्षाबलों को देते हैं ऐसे चकमा

खबरों की मानें तो दो ग्रुप में से एक को खत्म किया जा चुका है. यह ग्रुप सशस्त्र बलों को निशाना बनाता आ रहा था. जानें पाकिस्तानी आतंकी कैसे देते हैं सुरक्षाबलों को जम्मू-कश्मीर में चकमा

जम्मू-कश्मीर में सेना के जवानों को कौन निशाना बना रहा है? इसको लेकर एक स्टडी सामने आई है जिसे अंग्रेजी वेबसाइट indian express ने प्रकाशित की है. खबर में बताया गया है कि अक्टूबर 2021 के बाद से हुए सभी हमलों के सावधानीपूर्वक स्टडी के बाद, सुरक्षा बलों का अब मानना है कि दो से ज्यादा ग्रुप- जिनमें लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी शामिल हैं…घात लगाकर किए गए हमलों में शामिल रहे हैं.

अक्टूबर 2021 से अब तक लगभग 30 आतंकवादी ढ‍ेर

सूत्रों के हवाले से खबर दी गई है कि एक ग्रुप में दो लोग शामिल हो सकते हैं जिसमें पाकिस्तानी आतंकी हो सकता है. वहीं दूसरे ग्रुप में तीन से पांच लोग शामिल हो सकते हैं. इस ग्रुप को हाई ट्रेंड कमांडर लीड करता होगा. कुल मिलाकर जम्मू-पुंछ-राजौरी क्षेत्र में लगभग 15-20 पाकिस्तानी आतंकवादियों की मौजूदगी होने की संभावना व्यक्त की गई है. वहीं, सेना ने अक्टूबर 2021 से अब तक लगभग 30 आतंकवादियों को ढ‍ेर कर दिया है. इनमें से ज्यादातर पाकिस्तानी हैं. इस कार्रवाई में 30 जवान भी शहीद हुए हैं.

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खबरों की मानें तो दो ग्रुप में से एक को खत्म किया जा चुका है. यह ग्रुप सशस्त्र बलों को निशाना बनाता आ रहा था. आतंकी घटना की पहली कड़ी, जो 11 अक्टूबर 2021 से शुरू हुई थी इसी ग्रुप ने अंजाम दिया था. इन्होंने सर्च ऑपरेशन में गये जवानों के टेंट में आग लगा दी थी जिसमें पांच जवानों की मौत हुई थी. इसके बाद अगले सात दिनों में पास के भाटा धुरिया के जंगलों में चार और सैनिक शहीद हुए थे. देहरा की गली के जंगल क्षेत्र में अगला बड़ा हमला 11 अगस्त, 2022 को किया गया, जब आतंकवादियों ने राजौरी में भारतीय सेना के परगल कैंप पर हमला किया और चार सैनिकों को मार दिया.

क्यों बचे हुए हैं आतंकी

जम्मू में तैनात एक सशस्त्र बल अधिकारी ने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि इस समूह का नेतृत्व करने वाला कमांडर अपनी टीम के साथ अब तक स्थानीय लोगों के घरों में शरण लेने से बचता रहा है. यही वजह है कि ये अबतक बचे हुए हैं, नहीं तो अक्सर घुसपैठ के कुछ महीनों के भीतर ऐसे गुर्गों को गिरफ्तार कर लिया जाता है या मार दिया जाता है. यह ग्रुप गुफाओं को अपना ठिकाना बनाता है और शायद ही कभी जंगल छोड़ता है. वे ढुक (पहाड़ियों में चरवाहों द्वारा बनाया गया अस्थायी आश्रय) का भी उपयोग नहीं करते हैं. वे भोजन और गैस सिलेंडर जैसी साजो-सामान संबंधी सहायता के लिए स्थानीय लोगों के साथ कम से कम संपर्क में रहते हैं.

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बहुत चालाकी से रहते हैं आतंकी

पिछले डेढ़ साल में सुरक्षा बलों ने ऐसे कुछ स्थानीय लोगों को उठाया है और उनसे पूछताछ भी की है. लेकिन सूत्रों ने कहा कि ऐसा लगता है कि किसी ने भी कमांडर को नहीं देखा है या उसका नाम नहीं जानता है. सूत्रों ने कहा कि मई 2022 में, एक इनपुट मिली जिसके बाद, सेना के पैराट्रूपर्स ने कंडी जंगल में एक जगह के आसपास जाल भी बिछाया था, जहां से आतंकी ग्रुप को अपना भोजन लेना था, लेकिन कम से कम तीन दिन तक वह नहीं आए. 5 मई को आतंकियों की पैराट्रूपर्स के साथ गोलीबारी हुई जिसमें भारतीय सेना के पांच जवान मारे गए. यह आतंकी ग्रुप अपने भीतर या स्थानीय समर्थकों के साथ रेडियो फ्रीक्वेंसी मैसेंजर के माध्यम से संपर्क करता है. इसमें मैसेज एन्क्रिप्टेड हैं और इन्हें इंटरसेप्ट नहीं किया जा सकता है.

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By Amitabh kumar

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अमिताभ 1 अप्रैल 2011 से प्रभात खबर से जुड़े और शुरुआत से ही डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय रहे. खबरों को आसान, रोचक और आम लोगों की भाषा में पेश करना इनकी खासियत है. डिजिटल के साथ-साथ प्रिंट के लिए भी कई अहम रिपोर्ट कीं. खासकर ‘पंचायतनामा’ के लिए गांवों में जाकर की गई ग्रामीण रिपोर्टिंग करियर का यादगार अनुभव है.

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