धान से दाल तक पर खतरा, देश के 200 जिलों पर अल नीनो का असर; मानसून पर IMD की बड़ी चेतावनी

EL Nino India Monsoon 2026 Rainfall: अल नीनो की वापसी और कमजोर मानसून के संकेतों ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है. आईएमडी ने 2026 में सामान्य से कम बारिश का अनुमान जताया है. जानिए किन राज्यों पर सबसे ज्यादा खतरा है, खरीफ फसलों पर क्या असर पड़ेगा और किसानों के सामने कौन-कौन सी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

EL Nino India Monsoon 2026 Rainfall: देश में 2026 के मानसून को लेकर सामने आए ताजा संकेत किसानों, कृषि विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ाने लगे हैं. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने अल नीनो की आधिकारिक वापसी की पुष्टि कर दी है और इसके साथ ही सामान्य से कम बारिश की आशंका भी जताई है. यदि अनुमान सही साबित होते हैं तो इसका सीधा असर खरीफ फसलों के उत्पादन, किसानों की आय और देश की खाद्य आपूर्ति पर पड़ सकता है.

अल नीनो प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह के तापमान में होने वाले बदलाव का एक प्राकृतिक चक्र है. इसके प्रभाव से दुनिया भर के मौसम पैटर्न में बदलाव आता है. भारत में, अल नीनो का संबंध अक्सर मॉनसून के कमजोर होने और सूखे जैसी स्थिति से रहा है. मौसम विभाग और कई अंतरराष्ट्रीय मौसम पूर्वानुमान एजेंसियों ने इस साल अल नीनो के सक्रिय रहने की पुष्टि की है.

आईएमडी ने की अल नीनो की आधिकारिक पुष्टि

आईएमडी के अनुसार जून 2026 में अल नीनो की स्थिति औपचारिक रूप से विकसित हो चुकी है. भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान अल नीनो की निर्धारित सीमा से ऊपर पहुंच गया है. नीनो 3.4 इंडेक्स का अप्रैल-मई-जून 2026 का तीन महीने का औसत +0.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक दर्ज किया गया है, जो अल नीनो घोषित करने का मानक माना जाता है.

मौसम विभाग का कहना है कि केवल समुद्र ही नहीं, बल्कि वायुमंडलीय परिस्थितियों ने भी इस गर्मी पर प्रतिक्रिया दी है. इससे महासागर और वायुमंडल की संयुक्त प्रणाली पूरी तरह अल नीनो अवस्था में पहुंच चुकी है.

मानसून के दौरान और मजबूत हो सकता है अल नीनो

आईएमडी के मॉनसून मिशन कपल्ड फोरकास्ट सिस्टम (एमएमसीएफएस) के अनुसार जून से सितंबर तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान अल नीनो का प्रभाव और मजबूत हो सकता है.

पूर्वानुमान के मुताबिक जून से अगस्त के बीच मध्य प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बना रहेगा. जुलाई से मध्य और पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में गर्म समुद्री जल का विस्तार और तीव्रता बढ़ने की संभावना है.

विभाग ने यह भी बताया कि समुद्र के नीचे के हिस्सों में भी बड़े क्षेत्र में सकारात्मक तापमान विसंगतियां दर्ज की गई हैं, जो अल नीनो के और मजबूत होने का संकेत देती हैं.

11 वर्षों का सबसे कमजोर मानसून पूर्वानुमान

आईएमडी ने 2026 के मानसून के लिए दीर्घकालिक अनुमान सामान्य वर्षा का केवल 90 प्रतिशत रखा है. इसे पिछले करीब 11 वर्षों का सबसे कमजोर मानसून पूर्वानुमान माना जा रहा है.

वर्तमान में इंडियन ओशन डायपोल (आईओडी) तटस्थ स्थिति में है. मौसम विभाग का मानना है कि मानसून के दौरान भी इसके तटस्थ बने रहने की संभावना है. इसका मतलब है कि आईओडी न तो अल नीनो के प्रभाव को बढ़ाएगा और न ही उसे कम करेगा.

150 से 200 जिलों पर मौसमीय जोखिम का खतरा

डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के अनुसार, इस साल मॉनसून में 60 प्रतिशत कम बारिश की संभावना है. ऐसे में कई जगह बारिश कम हो सकती है और कई जगह सूखा भी पड़ सकता है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के दीर्घकालिक आकलन के मुताबिक देश के लगभग 150 से 200 जिलों को मौसम संबंधी जोखिम की दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है.

विभाग का अनुमान है कि मराठवाड़ा और उत्तरी कर्नाटक का क्षेत्र सामान्य से कम वर्षा का सबसे अधिक सामना कर सकता है. इसके अलावा राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में भी वर्षा की कमी की आशंका जताई गई है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के कुछ क्षेत्रों को भी जोखिम वाले इलाकों में शामिल किया गया है. आईएमडी के आकलन के अनुसार तेलंगाना के कुछ भागों तथा दक्षिण भारत के चुनिंदा तटीय क्षेत्रों को छोड़ दें तो देश का बड़ा हिस्सा किसी न किसी स्तर पर मानसूनी असामान्यता के प्रभाव में आ सकता है.

अल नीनो और सूखे का पुराना संबंध

भारत के मौसमीय इतिहास पर नजर डालें तो अल नीनो और सूखे के बीच गहरा संबंध दिखाई देता है. वर्ष 1901 से अब तक देश में 18 बड़े सूखा वर्ष दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 13 वर्ष अल नीनो वाले रहे.

वहीं 1951 से 2022 के बीच 16 अल नीनो वर्ष दर्ज किए गए. साल 2000 के बाद 2026 सहित कुल आठ बार अल नीनो की स्थिति बन चुकी है. इससे पहले 2023 में भी अल नीनो विकसित हुआ था.

मॉनसून की भविष्यवाणी और चिंताएं

मौसम विभाग की मॉनसून के सामान्य से कम रहने की संभावना की भविष्यवाणी ने किसानों और कृषि विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. अगर मॉनसून कमजोर रहता है, तो कई इलाकों में पानी की कमी हो जाएगी, जिसका सीधा असर खरीफ की बुवाई और फसल की पैदावार पर पड़ेगा. खरीफ फसलें, जैसे धान, मक्का, सोयाबीन और दालें, मुख्य रूप से मॉनसून पर ही निर्भर करती हैं.

खरीफ फसलों पर संभावित प्रभाव

अल नीनो के कारण मॉनसून की कमी से खरीफ फसलों के उत्पादन पर गहरा प्रभाव पड़ने की आशंका है.

धान की खेती पर असर: धान की खेती के लिए भरपूर पानी की जरूरत होती है. अगर मॉनसून कमजोर रहा तो धान की रोपाई प्रभावित हो सकती है और जिन इलाकों में सिंचाई के साधन सीमित हैं, वहां उत्पादन में भारी गिरावट आ सकती है. इससे न केवल किसानों की आय कम होगी, बल्कि खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है.

अन्य खरीफ फसलें भी प्रभावित: केवल धान ही नहीं, मक्का, सोयाबीन, मूंगफली, कपास और विभिन्न प्रकार की दालों जैसी अन्य खरीफ फसलें भी मॉनसून की कमी से प्रभावित होंगी. इन फसलों की पैदावार में कमी आने से बाजार में इन अनाजों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा.

किसानों के लिए चुनौतियां

मॉनसून की कमी किसानों के लिए कई तरह की चुनौतियां खड़ी कर सकती है.

पानी की उपलब्धता और सिंचाई: जिन क्षेत्रों में बारिश पर निर्भरता ज्यादा है, वहां किसानों को पानी की भारी किल्लत का सामना करना पड़ सकता है. सिंचाई के लिए पानी की कमी होने पर फसलें सूखने का खतरा बढ़ जाएगा. जिन किसानों के पास ट्यूबवेल या अन्य सिंचाई के साधन हैं, वे कुछ हद तक राहत में रहेंगे, लेकिन बिजली की उपलब्धता और पानी की गहराई भी एक मुद्दा बन सकती है.

बीज और खाद की लागत: इसके अलावा, फसल की पैदावार कम होने पर किसानों की आय पर सीधा असर पड़ेगा. बीज, खाद, कीटनाशक और मजदूरी पर किए गए खर्च की भरपाई करना भी मुश्किल हो जाएगा. इस स्थिति में कई किसान कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं.

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सरकार और विशेषज्ञों की राय

अल नीनो का प्रभाव सिर्फ इस खरीफ सीजन तक ही सीमित नहीं रह सकता. जलवायु परिवर्तन के इस दौर में ऐसी मौसमी घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ने की आशंका है.

दीर्घकालिक समाधान की जरूरत

किसानों को इस तरह की अनिश्चितताओं से बचाने के लिए दीर्घकालिक समाधानों पर काम करने की जरूरत है. इसमें टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाना, सिंचाई के साधनों का विस्तार करना, फसल बीमा योजनाओं को मजबूत करना और किसानों को वैकल्पिक आय के स्रोत प्रदान करना शामिल है.

उन्नत बीज और तकनीक

साथ ही, ऐसी फसलों की किस्मों को विकसित करने पर भी जोर देना होगा जो कम पानी में भी अच्छी पैदावार दे सकें. मौसम की सटीक भविष्यवाणी और किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाना भी इस संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. कुल मिलाकर, अल नीनो का खतरा एक गंभीर चेतावनी है जिस पर तुरंत और प्रभावी ढंग से ध्यान देने की आवश्यकता है.

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By Anant narayan shukla

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अनन्त को राष्ट्रीय राजनीति की भी समझ है. उन्होंने झारखंड विधान सभा 2024, दिल्ली विधान सभा चुनाव 2025 चुनाव और देश के अन्य चुनावों को कवर किया है. चुनाव के काउंटिंग डे को कवर करने का भी उनके पास काफी अनुभव है.

अनन्त कभी-कभी नेशनल डेस्क भी संभालते हैं, जिसमें देश भर में जनता से जुड़े जरूरी सामाजिक मुद्दे, न्यायिक खबरों और अपराध की खबरों को भी कवर करते हैं. इसके अलावा उन्हें रोचक जानकारियों को क्यूरेट करने का भी शौक है. इसमें लाइफस्टाइल, ऐतिहासिक और पुरातात्विक जानकारी के साथ ही दुनिया भर के साम्राज्यों के बारे में खबरें करते हैं.

उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के रहने वाले अनन्त ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने 2024 में अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत प्रभात खबर में खेल पत्रकार के रूप में की थी, जहां उन्होंने करीब एक वर्ष तक क्रिकेट और अन्य खेलों से जुड़ी खबरों को कवर किया. बाद में अपनी रुचि और विशेषज्ञता के चलते उन्होंने अंतरराष्ट्रीय डेस्क का रुख किया और आज वैश्विक राजनीति व भू-राजनीति के प्रमुख विषयों पर लेखन कर रहे हैं.

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