DU: दिल्ली विश्वविद्यालय(डीयू) के स्कूल ऑफ अल्टीमेट लीडरशिप (एसओयूएल) के सहयोग ‘लीडर्स टॉक’ नाम से लीडरशिप इंटरेक्शन कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में इंफोसिस के फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति ने छात्रों और युवा पेशेवरों के साथ लीडरशिप, एथिक्स, प्रोडक्टिविटी और कार्य के भविष्य पर चर्चा की. कार्यक्रम के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और भारत के टेक सेक्टर में इसकी बढ़ती भूमिका पर नारायण मूर्ति ने कहा कि इंसान के दिमाग से बेहतर कुछ नहीं है. एआई भले ही छोटे-मोटे कामों को ऑटोमेट कर दे, लेकिन यह इंसानों को ऊंचे लेवल की सोच, रचनात्मकता और निर्णायक क्षमता बढ़ाने की ओर ले जाने का काम करेगा.
एआई को खतरे के बजाय एक वरदान के तौर पर लेना चाहिए. रीस्किलिंग, रीट्रेनिंग और सीखने की इच्छा के साथ इंसान का दिमाग लगातार बेहतर होता रहेगा. बदलाव लगातार होता रहता है. एआई से चलने वाली दुनिया में युवाओं के लिए काम का बने रहने के लिए बेहतर सीखने की क्षमता, यानी ज्ञान हासिल करने और उसे अलग-अलग हालात में इस्तेमाल करने की क्षमता जरूरी है.जीवन से जुड़े एक घटना का जिक्र करते हुए नारायणमूर्ति ने कहा कि जब वे 10वीं कक्षा में पढ़ते थे, एक साइंस टीचर ने एक एक्सपेरिमेंट के दौरान नमक का इस्तेमाल सावधानी से किया. जब सवाल किया गया तो टीचर ने समझाया कि यह संसाधन स्कूल का है और इसलिए समुदाय का है और इसका इस्तेमाल जिम्मेदारी से किया जाना चाहिए. शिक्षक का यह सबक उनके बिजनेस एथिक्स का सेंटर बन गया और बाद में वह नींव बनी जिस पर इंफोसिस काम कर रहा है.
सफलता के लिए एथिक्स को भूलना गलत
मूर्ति ने कहा कि रेवेन्यू, प्रॉफिट और मार्केट कैपिटलाइजेशन जैसे फाइनेंशियल पहलू सेकेंडरी हैं. सच्ची गुडविल सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ आपसी सम्मान से मिलती है. सबसे सफल एंटरप्रेन्योर बनने की चाहत रखने के बजाय सबसे पहले इज्जत (रिस्पेक्ट) का लक्ष्य होना चाहिए. इज्जत से क्वालिटी डिलीवरी, नैतिक तरीके, मजबूत एम्प्लॉई कमिटमेंट और आखिरकार सस्टेनेबल रेवेन्यू पक्का होता है. इस मायने में रेवेन्यू इज्जत का बाय-प्रोडक्ट बन जाता है ना कि मुख्य लक्ष्य. अपने सबसे मुश्किल दौर में से एक के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 1990 के दशक में एक फॉर्च्यून 10 यूएस कंपनी के साथ उनकी कंपनी के सांझेदारी हुई. जिसने इंफोसिस के बिजनेस में लगभग 25 फीसदी का योगदान दिया था.
एक शॉर्ट-टर्म प्राइसिंग फैसले के लंबे समय तक गंभीर नतीजे हुए, जिससे काफी नुकसान हुआ. इस झटके के बावजूद इंफोसिस ने 1998 तक वापसी की और रफ्तार पकड़ने का काम किया. इस घटना ने शॉर्ट-टर्म फायदों से अधिक लंबे समय तक सोचने के महत्व को और मजबूत किया. अपने मैनेजमेंट के तरीके के बारे में बताते हुए कहा कि ऑफिस के बाहर वह फ्रेंडली हैं, लेकिन अंदर बॉस के तौर पर अपनी भूमिका को लेकर क्लियर हैं. उन्होंने लीडरशिप पर जोर देते हुए कहा कि बिना परेशानी और कड़ी मेहनत के कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है. शोहरत और तालियां कुछ समय के लिए होती हैं. लीडरशिप की असली पहचान विनम्रता, तहजीब और अपने काम को अपनी शान से अधिक बोलने देना है.
ReplyForward
Add reaction
Share in chat
New
