Difference Between Rocket and Missile: रॉकेट और मिसाइल शब्दों का इस्तेमाल अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर कर दिया जाता है. यह भ्रम स्वाभाविक भी है, क्योंकि दोनों ही ऐसे हथियार प्रणालियां हैं जो रॉकेट प्रोपल्शन के जरिये विस्फोटक वारहेड को लक्ष्य तक पहुंचाती हैं. इसी कारण कई बार सोशल मीडिया पर सशस्त्र बलों के सदस्य कुछ मीडिया संगठनों को टोकते नजर आते हैं, जब खबरों में यह कहा जाता है कि रॉकेट दागे गए, जबकि वास्तव में इस्तेमाल किए गए हथियार मिसाइल होते हैं या कभी-कभार इसके उलट. भारत के पास रॉकेट और मिसाइल दोनों की काफी मात्रा में वैराइटी है. ब्रह्मोस मिसाइल तो दुनिया भर में अपना नाम कमा चुकी है. वहीं पिनाका, सूर्यास्त, Elbit PULS, और ERASR रॉकेट भी भारतीय सेना के पास हैं. पिनाका ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारत ने इसका शानदार उपयोग किया था. इंडिया इसका एक्सपोर्ट वर्जन आर्मेनिया को बेच भी रहा है. वहीं, ब्रह्मोस ने ऑपरेशन सिंदूर में कमाल दिखाया.
हालांकि, अब भी कई बार रॉकेट और मिसाइल को लेकर भ्रम देखने को मिलता है. पहली नजर में दोनों काफी हद तक एक जैसे दिखते हैं. दोनों दूर स्थित लक्ष्यों पर दागे जाते हैं, हवा में खुद को आगे बढ़ाते हैं और लक्ष्य पर विस्फोट करते हैं. लेकिन असल में ये दो अलग-अलग हथियार प्रणालियां हैं. इनके बीच बुनियादी अंतर को हम आपको समझाने का प्रयास कर रहे हैं.
रॉकेट: सरल तकनीक, लंबा इतिहास
दिखने में भले ही मिसाइल जैसे हों, लेकिन रॉकेट तकनीकी रूप से कहीं ज्यादा सरल होते हैं. रॉकेट का मूल सिद्धांत ‘मोमेंटम’ पर आधारित होता है. यानी उसके भीतर जलने वाला ईंधन जो थ्रस्ट पैदा करता है, वही उसे आगे बढ़ाता है. रॉकेट दागते समय पीछे की ओर निकलने वाली तेज गैस (बैक ब्लास्ट) खतरनाक हो सकती है, इसलिए इन्हें दागते समय आसपास मौजूद लोगों की सुरक्षा बेहद अहम होती है. रॉकेट अधिकतर अनगाइडेड (अनिर्देशित) होते हैं, हालांकि, अब इन्हें भी नियंत्रित किया जा सकता है.
फन फैक्ट: दीपावली में हम उन पटाखों को भी रॉकेट कहते हैं, जो आसमान में जाते हैं, दरअसल यह सच्चाई है, क्योंकि यह रॉकेट तकनीक पर ही काम करता है. यह न्यूटन के गति के तीसरे नियम पर काम करता है. रॉकेट इसी सिद्धांत पर काम करता है.
रॉकेट का इतिहास
रॉकेट का विकास मिसाइलों से बहुत पहले हो गया था. रॉकेटों का इतिहास 13वीं सदी के चीन से जुड़ा है. उस दौर में चीन में ऐसे शुरुआती मल्टी-लॉन्च रॉकेट सिस्टम विकसित हुए थे, जिनमें लकड़ी के ढांचों में बारूद से भरे तीर लगाए जाते थे. यह तकनीक मंगोलों के जरिये यूरोप पहुंची, जहां इसका इस्तेमाल घेराबंदी के दौरान आग लगाने वाले हथियार के रूप में किया गया.
भारत में 1780 में पोलिलूर की लड़ाई के दौरान ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के सैनिकों का सामना टीपू सुल्तान के राज्य में मैसूर के रॉकेटों से हुआ. ये रॉकेट पहले के मुकाबले कहीं अधिक उन्नत थे. बांस या कागज की जगह लोहे की नलियों में बारूद भरा जाता था, जिससे उनकी मारक क्षमता और रेंज काफी बढ़ गई थी. इतिहासकारों के अनुसार, इन रॉकेटों की वजह से ब्रिटिश सेना का गोला-बारूद ले जाने वाला वाहन आग पकड़ बैठा था, जिसने उनकी हार में अहम भूमिका निभाई. करीब 150 साल बाद आधुनिक रॉकेटों का स्वरूप सामने आया. द्वितीय विश्व युद्ध में इस्तेमाल किए गए एंटी-टैंक रॉकेट लॉन्चर जैसे अमेरिकी बाज़ूका, ब्रिटिश PIAT और जर्मन पैंजरफॉस्ट इसी सोच पर आधारित थे.
रॉकेट किस-किस तरह के होते हैं?
रॉकेटों को आम तौर पर दो तरीकों से समझा और बांटा जाता है. पहला- वे किस काम के लिए इस्तेमाल होते हैं और दूसरा- उनमें किस तरह की प्रणोदन (प्रोपल्शन) तकनीक लगी होती है. काम के आधार पर देखें तो सबसे पहले स्पेस रॉकेट या लॉन्च व्हीकल आते हैं, जिनका इस्तेमाल सैटेलाइट, अंतरिक्ष यात्रियों या वैज्ञानिक उपकरणों को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए किया जाता है. इसके उदाहरण हैं NASA का स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS), SpaceX का फाल्कन-9 और भारत के ISRO के PSLV और GSLV. इसके अलावा साउंडिंग रॉकेट होते हैं, जो अंतरिक्ष में नहीं जाते बल्कि ऊपरी वायुमंडल तक जाकर वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए डेटा इकट्ठा करते हैं.
अगर प्रोपल्शन यानी ईंधन प्रणाली के आधार पर बात करें तो सबसे आम हैं सॉलिड फ्यूल रॉकेट. ये सरल, भरोसेमंद होते हैं और अक्सर बूस्टर के तौर पर इस्तेमाल किए जाते हैं. इसके बाद आते हैं लिक्विड फ्यूल रॉकेट, जिनमें अलग-अलग ईंधन और ऑक्सीडाइजर होता है, जिससे इन्हें ज्यादा नियंत्रित किया जा सकता है और भारी पेलोड को ऊंची कक्षा तक ले जाना आसान होता है. कुछ रॉकेट हाइब्रिड सिस्टम पर काम करते हैं, जिनमें ठोस और तरल दोनों तरह के तत्व मिलते हैं. वहीं, गहरे अंतरिक्ष मिशनों में आयन या इलेक्ट्रिक रॉकेट इस्तेमाल किए जाते हैं, जो बहुत कम लेकिन लगातार थ्रस्ट देते हैं और लंबे समय तक चलने वाले अभियानों के लिए उपयुक्त होते हैं.
सैन्य क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले रॉकेट और मिसाइल भी इसी श्रेणी में आते हैं. इनमें कुछ छोटे और सामरिक (टैक्टिकल) हथियार होते हैं, जैसे हवा से हवा या जमीन से हवा में मार करने वाले रॉकेट, जबकि कुछ रणनीतिक हथियार होते हैं, जैसे बैलिस्टिक मिसाइलें और अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें (ICBM). इसके अलावा कुछ खास रॉकेट ऐसे भी होते हैं, जो अंतरिक्ष में पहुंचने के बाद सैटेलाइट को एक कक्षा से दूसरी कक्षा में ले जाने का काम करते हैं, इन्हें अपर स्टेज या स्पेस प्रोब रॉकेट कहा जाता है.
इनके अलावा शौकिया और प्रयोगात्मक रॉकेट भी होते हैं, जैसे मॉडल रॉकेट या पानी से उड़ने वाले रॉकेट, जिन्हें शिक्षा और मनोरंजन के लिए बनाया जाता है. एक खास तरह के रॉकेट लॉन्च एस्केप सिस्टम भी होते हैं, जिनका काम किसी आपात स्थिति में अंतरिक्ष यान के क्रू कैप्सूल को तुरंत रॉकेट से दूर खींचकर सुरक्षित निकालना होता है.
मिसाइल: रॉकेट तकनीक का अगला कदम
मिसाइल देखने में रॉकेट जैसी लग सकती हैं, लेकिन तकनीकी रूप से वे कहीं ज्यादा उन्नत होती हैं. सबसे बड़ा अंतर यह है कि जहां रॉकेट पूरी तरह निशाने की सटीकता पर निर्भर करता है, यानी यह गाइडेड होती हैं. हर मिसाइल के भीतर अपना एक गाइडेंस सिस्टम होता है. यही सिस्टम मिसाइल को उड़ान के दौरान दिशा बदलने और लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करता है और इसे रॉकेट से अलग बनाता है. मिसाइल फायर एंड फारगेट सिद्धांत पर काम करता है. यानी इन्हें लांच करने के बाद, किसी और इनपुट या मार्गदर्शन की जरूरत नहीं होती.
लंबी दूरी और जटिल उड़ान पथ के कारण मिसाइलों में बड़े फिन, पंख और अन्य एयरोडायनामिक संरचनाएं होती हैं. मिसाइलों में अलग-अलग तरह के गाइडेंस सिस्टम हो सकते हैं. जैसे हीट-सीकिंग, लेजर-गाइडेड या सैटेलाइट आधारित सिस्टम. आधुनिक मिसाइलों के शुरुआती रूप द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान सामने आए, जब जर्मनी ने V-1 फ्लाइंग बम और V-2 हथियार विकसित किए. इन हथियारों में जाइरोस्कोप, कम्पास और अन्य यंत्र लगे होते थे, जो उन्हें तय रास्ते पर बनाए रखते थे.
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मिसाइलें कितनी तरह की होती हैं?
मिसाइलों को आम तौर पर उनके उड़ान के तरीके, कहां से छोड़ी जाती हैं, किस लक्ष्य को मारती हैं और उनकी रफ्तार के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है. सबसे सरल शब्दों में कहें तो मिसाइल दो मुख्य तरह की होती हैं पहली- बैलिस्टिक मिसाइल और दूसरी- क्रूज मिसाइल. बैलिस्टिक मिसाइलें बहुत ऊंचाई तक जाकर धनुषाकार रास्ते से (पाराबोला बनाकर) लक्ष्य पर गिरती हैं और ज्यादातर लंबी दूरी के रणनीतिक हमलों में इस्तेमाल होती हैं, जैसे अग्नि और पृथ्वी. वहीं क्रूज मिसाइलें कम ऊंचाई पर उड़ती हैं और पूरी उड़ान के दौरान गाइड की जाती हैं, ताकि रडार से बच सकें. ब्रह्मोस (सुपरसोनिक) और निर्भय इसके उदाहरण हैं.
लांच प्लेटफॉर्म और टारगेट के आधार पर क्लासिफिकेशन
मिसाइलों को इस आधार पर भी समझा जा सकता है कि वे कहां से छोड़ी जाती हैं और किसे निशाना बनाती हैं. जमीन या जहाज से जमीन पर मार करने वाली मिसाइलें सरफेस-टू-सरफेस कहलाती हैं, जैसे अग्नि. जमीन से हवा में उड़ रहे लक्ष्यों को गिराने वाली मिसाइलें सरफेस-टू-एयर होती हैं, जैसे आकाश. लड़ाकू विमानों से दूसरे विमानों को मारने वाली मिसाइलें एयर-टू-एयर कहलाती हैं, जैसे अस्त्र. विमानों से जमीन या समुद्री लक्ष्यों पर दागी जाने वाली मिसाइलें एयर-टू-सरफेस होती हैं. इसके अलावा टैंकों और बख्तरबंद वाहनों को नष्ट करने के लिए खास तौर पर बनाई गई एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें भी होती हैं, जैसे नाग और हेलिना. पनडुब्बियों से छोड़ी जाने वाली बैलिस्टिक मिसाइलें, जो अक्सर परमाणु क्षमता वाली होती हैं, सबमरीन लांच्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) कहलाती हैं, जैसे K-15.
रफ्तार के आधार पर अंतर
रफ्तार के आधार पर भी मिसाइलों को बांटा जाता है. सबसोनिक मिसाइलें आवाज की गति से धीमी होती हैं, सुपरसोनिक मिसाइलें आवाज से दो से तीन गुना तेज उड़ती हैं, जबकि हाइपरसोनिक मिसाइलें आवाज से पांच गुना या उससे भी ज्यादा तेज होती हैं, जिन्हें रोकना बेहद मुश्किल होता है. ब्रह्मोस-II को इसी श्रेणी का उदाहरण माना जाता है.
दूरी के आधार पर मिसाइलों का वर्गीकरण
इसके अलावा, मिसाइलों को उनकी मारक दूरी के हिसाब से भी समझा जाता है. जैसे- कम दूरी की मिसाइलें, मध्यम दूरी की, मध्यम से लंबी दूरी की और अंतरमहाद्वीपीय मिसाइलें, जो एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप तक वार कर सकती हैं. भारत की मिसाइल ताकत की बात करें तो अग्नि सीरीज परमाणु क्षमता वाली बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए जानी जाती है, ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में शामिल है. नाग एक आधुनिक एंटी-टैंक मिसाइल है और आकाश एक भरोसेमंद सतह से हवा में मार करने वाली रक्षा प्रणाली मानी जाती है. S-400 मिसाइल सिस्टम से भी आप परिचित ही होंगे. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इसकी खूब चर्चा रही.
संक्षेप में कहें तो रॉकेट और मिसाइल दिखने में भले ही एक जैसे लगें, लेकिन तकनीकी रूप से दोनों अलग हैं. रॉकेट पुराने और सरल हथियार हैं, जिनमें कोई आंतरिक गाइडेंस सिस्टम नहीं होता और जिन्हें पूरी तरह निशाना साधकर दागा जाता है. मिसाइल अपेक्षाकृत नई और उन्नत तकनीक हैं, जिनमें खुद को दिशा देने की क्षमता होती है.
एंटी बैलिस्टिक मिसाइलें भी चर्चा में
अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइलें (ICBM) भी रॉकेट तकनीक का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन इनमें उड़ान के दौरान मार्गदर्शन और फिर गुरुत्वाकर्षण के जरिये लक्ष्य पर गिरने की क्षमता होती है. ये आमतौर पर परमाणु हथियार ले जाने के लिए जानी जाती हैं. आजकल तो एंटी बैलिस्टिक मिसाइलें भी आ गई हैं, यह बैलिस्टिक मिसाइलों के खिलाफ ढाल की तरह काम करती है.
वहीं, आज की एंटी-टैंक मिसाइलें, जैसे जैवेलिन और NLAW और भी उन्नत हैं. ये पहले लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं, फिर ऊपर चढ़कर आर्क बनाते हुए टैंक के ऊपर से हमला करती हैं, क्योंकि टैंक का ऊपर का हिस्सा अपेक्षाकृत कम सुरक्षित होता है. भारत कई तरह के मिसाइल सिस्टम पर काम कर रहा है. ब्रह्मोस सिर्फ एक बानगी है, अलग-अलग तकनीक पर आधारित मिसाइल सिस्टम्स से देश की सीमा सुरक्षा में इंडियन आर्मी प्रगति के पथ पर है.
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