49.5% आबादी, 40% ग्लोबल GDP और 26% ट्रेड...G7 के मुकाबले कितना ताकतवर है BRICS?

BRICS Economic Power : BRICS की ताकत सिर्फ 40% वैश्विक GDP के आंकड़े से नहीं समझी जा सकती. PPP और डॉलर GDP के अलग-अलग पैमाने बताते हैं कि भारत और BRICS की आर्थिक तस्वीर कितनी बदल जाती है.यहां सवाल ये भी है कि G7 के मुकाबले कितना ताकतवर है BRICS?

20 साल पहले ब्राजील, रूस, भारत और चीन को मिलाकर बना ब्रिक्स दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह था. तब इसमें सिर्फ 4 देश थे. आज इसमें 11 देश हैं और इसकी पहुंच दुनिया की करीब आधी आबादी तक है. ब्रिक्स देश मिलकर वैश्विक जीडीपी का करीब 40 फीसदी और दुनिया के व्यापार का करीब 26 फीसदी हिस्सा रखते हैं.

यानी ब्रिक्स अब सिर्फ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का क्लब नहीं है. यह दुनिया की बड़ी आर्थिक ताकत बन चुका है. इसलिए तो 12-13 सितंबर को नई दिल्ली में होने वाले 18 वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में दुनिया की नजर इस समूह पर है.

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे अहम हिस्सा ये है कि भारत कहां खड़ा है? ब्रिक्स की इस बड़ी ताकत में भारत का कितना हिस्सा है? और डॉलर में भारत की अर्थव्यवस्था जितनी छोटी दिखती है, असल में उसकी ताकत कितनी  बड़ी  है?

कितनी बड़ी है BRICS की आर्थिक ताकत

PPP यानी परचेजिंग पावर पैरिटी के हिसाब से देखें तो BRICS की आर्थिक ताकत G7 से बड़ी है. IMF के मुताबिक, 2025 में दुनिया के कुल उत्पादन में BRICS की हिस्सेदारी 40.5 फीसदी थी, जबकि G7 की 28.3 फीसदी. इस पैमाने पर BRICS ने 2020 में ही G7 को पीछे छोड़ दिया था.

लेकिन जैसे ही हिसाब डॉलर में करने लगते हैं, तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है. बाजार की करेंसी एक्सचेंज रेट के हिसाब से 2025 में दुनिया के कुल उत्पादन में BRICS की हिस्सेदारी 27.9 फीसदी थी, जबकि G7 की हिस्सेदारी 44.4 फीसदी रही.

  • ऐसा क्यों? दरअसल, दोनों आंकड़े अर्थव्यवस्था को देखने का अलग तरीका बताते हैं. आसान भाषा में कहें तो PPP यह बताता है कि किसी देश में उसकी अपनी कीमतों के हिसाब से कितना सामान और सेवाएं तैयार हो रही हैं और लोगों की खरीदने की ताकत कितनी है. वहीं डॉलर वाला आंकड़ा मौजूदा करेंसी रेट के हिसाब से अर्थव्यवस्था का आकार बताता है.
  • अब BRICS की बढ़ती ताकत को एक और तरीके से समझिए. आज के 11 सदस्य देशों को अगर पीछे की तारीख में भी एक साथ रखकर देखें, तो 2005 में उनकी PPP के हिसाब से दुनिया के कुल उत्पादन में हिस्सेदारी करीब 26 फीसदी थी. 2025 में यह बढ़कर 40.5 फीसदी हो गई.
  • हालांकि, यहां एक बात साफ समझना जरूरी है. 2005 में ये सभी 11 देश BRICS का हिस्सा नहीं थे. इसलिए 26 फीसदी को 2005 के BRICS का हिस्सा कहना सही नहीं होगा. यह आज के 11 सदस्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को पीछे जाकर एक साथ रखकर की गई तुलना है.
  • यानी सीधी बात ये है कि BRICS की आर्थिक ताकत को सिर्फ एक आंकड़े से नहीं समझा जा सकता. PPP के हिसाब से यह समूह G7 से आगे है, लेकिन डॉलर में देखें तो G7 अभी भी काफी बड़ा है.

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क्या भारत की अर्थव्यवस्था को मापने के लिए दो तरीके हैं?

  • भारत की अर्थव्यवस्था को अगर डॉलर की मौजूदा कीमत के हिसाब से देखें, तो दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी करीब 3.3 फीसदी है. लेकिन अगर इसे परचेजिंग पावर पैरिटी यानी PPP के हिसाब से देखें, तो भारत की हिस्सेदारी करीब 8.2 फीसदी हो जाती है.
  • सीधी भाषा में कहें तो डॉलर वाला आंकड़ा यह देखता है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी देश की अर्थव्यवस्था की कीमत कितनी है. इसमें मुद्रा की कीमत यानी विनिमय दर का बड़ा असर होता है.
  • वहीं PPP यह देखने की कोशिश करता है कि देश के अंदर वास्तव में कितना सामान और सेवाएं तैयार हो रही हैं और लोगों की खरीदने की ताकत कितनी है. यानी भारत में जो सामान 100 रुपये में मिलता है, वही चीज किसी दूसरे देश में काफी महंगी हो सकती है.
  • इसलिए भारत की अर्थव्यवस्था की असली ताकत समझने के लिए सिर्फ डॉलर वाला आंकड़ा देखना ठीक नहीं होगा. मसलन, अगर रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले गिरती है, तो भारत की डॉलर में जीडीपी कम दिख सकती है, भले ही देश के अंदर उत्पादन बढ़ रहा हो.

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत की असली कहानी

ब्रिक्स की बढ़ती ताकत को भी इसी नजरिए से देखना चाहिए कि PPP के हिसाब से यह समूह दुनिया के कुल उत्पादन का करीब 40 फीसदी हिस्सा रखता है. लेकिन डॉलर के हिसाब से जी7 अभी भी काफी आगे है.

यानी सवाल यह नहीं है कि BRICS बड़ा है या G7. सवाल यह है कि आप अर्थव्यवस्था की ताकत को किस पैमाने से माप रहे हैं. भारत के मामले में भी यही बात लागू होती है. डॉलर में भारत की हिस्सेदारी करीब 3.3 फीसदी दिखती है, लेकिन PPP के हिसाब से यह करीब 8.2 फीसदी है.

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By गौतम कुमार

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