भारत-पाकिस्तान के बीच टकराव का पारंपरिक मॉडल अब सिर्फ आतंकवादी संगठनों और सीमा पार घुसपैठ तक सीमित नहीं रह गया है. एक ऐसे मॉडल को विकसित किया गया है, जिसमें क्रिमिनल गैंग, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंस, ड्रोन से होने वाली तस्करी और छोटे स्तर की हिंसक गतिविधियों को एक-दूसरे से जोड़कर इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है.
इस नैरेटिव के केंद्र में पाकिस्तान के पंजाब का गैंगस्टर शहजाद भट्टी बताया गया है.
हालांकि, यहां किए गए ISI से जुड़े कई दावों को स्वतंत्र रूप से सत्यापित किए बिना तथ्य के रूप में नहीं पेश किया जा सकता. फिर भी, इस पूरे मॉडल को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह हाइब्रिड वॉरफेयर और क्रिमिनल नेटवर्क के बीच बढ़ते संभावित गठजोड़ की ओर इशारा करता है.
1. शहजाद भट्टी: गैंगस्टर से ‘डिजिटल आइकन’ तक?
शहजाद भट्टी ने पाकिस्तान के पंजाब में स्थानीय आपराधिक गतिविधियों के जरिए अपनी पहचान बनाई और बाद में सोशल मीडिया पर उसकी एक ‘हाइपरमैस्कुलिन’ गैंगस्टर इमेज तैयार हुई.
Facebook और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म पर गैंगस्टर लाइफस्टाइल, हथियारों और दबदबे से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो युवाओं के बीच लोकप्रिय होने लगे.
इसी को इस मॉडल का पहला चरण बताया गया है- पहले क्रिमिनल को डिजिटल आइकन बनाइए, फिर उसकी लोकप्रियता को नेटवर्क बनाने के लिए इस्तेमाल कीजिए.
लेकिन महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी सोशल मीडिया अकाउंट की लोकप्रियता अपने आप किसी खुफिया एजेंसी से उसके संबंध साबित करती है? नहीं. इसलिए इस दावे को जांच और आधिकारिक प्रमाण के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए.
2. Social Media से ‘टैलेंट स्पॉटिंग’ का दावा
इस मॉडल का सबसे दिलचस्प हिस्सा सोशल मीडिया डेटा से जुड़े होने का दावा है.
ऐसे युवाओं की पहचान की जा सकती है जो बार-बार गैंगस्टर कंटेंट देखते हैं, उससे प्रभावित होते हैं या संबंधित अकाउंट्स से संपर्क करने की कोशिश करते हैं. इसके बाद आर्थिक रूप से कमजोर या बेरोजगार युवाओं को छोटे-मोटे कामों के लिए इस्तेमाल किए जाने का दावा किया गया है.
यानी कथित मॉडल है:
रील्स → आकर्षण → ऑनलाइन संपर्क → टारगेट की पहचान → छोटे भुगतान → आपराधिक गतिविधि
इसमें सबसे बड़ा खतरा यही है कि युवा को शुरुआत में यह किसी बड़े आतंकी नेटवर्क का हिस्सा नहीं, बल्कि छोटे पैसे के बदले किया गया एक मामूली काम लग सकता है.
3. Drone Drop से CCTV तक: कथित नेटवर्क का अगला चरण
कथित तौर पर, भारत-पाकिस्तान सीमा के आसपास ड्रोन के जरिए ड्रग्स, हथियार, गोला-बारूद और नकदी गिराने के बाद स्थानीय स्तर पर लोगों के जरिए इन्हें उठवाने का मॉडल अपनाया गया.
इसके बाद इसी तरह के लोगों को कथित तौर पर दूसरे कामों के लिए इस्तेमाल किए जाने की बात कही गई है.
इनमें एक दावा CCTV कैमरों की निगरानी संबंधी गतिविधियों का है. कुछ लोगों को सैन्य प्रतिष्ठानों, पुलिस स्टेशनों या अन्य संवेदनशील स्थानों के आसपास कैमरे लगाने के लिए इस्तेमाल किए जाने की आशंका बताई गई है.
अगर किसी विदेशी खुफिया नेटवर्क को इस तरह का ग्राउंड-लेवल डेटा वास्तव में मिल रहा हो, तो उसका महत्व बहुत बड़ा होगा. लेकिन चीन को लाइव फीड साझा करने जैसे दावों के लिए independent और credible प्रमाण आवश्यक हैं.
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4. बड़ा हमला नहीं, ‘लो-इंटेंसिटी कॉन्फ्लिक्ट’?
इस कथित रणनीति का एक और महत्वपूर्ण पहलू है- बड़े आतंकवादी हमले के बजाय छोटे-छोटे व्यवधान.
पुलिस स्टेशनों, सुरक्षा प्रतिष्ठानों या अन्य स्थानों के आसपास कम तीव्रता वाली हिंसक घटनाओं और विस्फोटों को एक ऐसे मॉडल से जोड़ने की कोशिश की गई है जिसका उद्देश्य लंबे समय तक अस्थिरता बनाए रखना बताया गया है.
इसका फायदा कथित तौर पर दो स्तरों पर हो सकता है.
- पहला—Plausible Deniability: सीधे state sponsored terrorism का आरोप लगाना कठिन हो सकता है, क्योंकि सामने क्रिमिनल गैंग दिखाई देती है.
- दूसरा—Information Warfare: बाद में इन्हीं घटनाओं को यह दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है कि भारत में कानून-व्यवस्था कमजोर है और आपराधिक हिंसा बढ़ रही है.
यानी लड़ाई सिर्फ जमीन पर नहीं, नैरेटिव और धारणा के स्तर पर भी लड़ी जा सकती है.
5. भारत के लिए असली चुनौती: बेरोजगार युवा + सोशल मीडिया + क्रिमिनल नेटवर्क
पूरे मामले का सबसे बड़ा सबक शायद किसी एक गैंगस्टर से ज्यादा बड़ा है.
अगर बेरोजगारी, सोशल मीडिया पर गैंगस्टर ग्लैमर, आसान पैसे का लालच और सीमा पार आपराधिक नेटवर्क एक-दूसरे से जुड़ते हैं, तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नया कमजोर बिंदु बन सकता है.
कथित तौर पर, कुछ सोर्स से NIA और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों द्वारा ऐसे नेटवर्क को समझने और उसके खिलाफ रणनीति विकसित करने की बात कही गई है. लेकिन दीर्घकालिक समाधान केवल पुलिस कार्रवाई नहीं हो सकता.
जरूरत है कि सरकारें और समाज मिलकर युवाओं के लिए रोजगार, डिजिटल साक्षरता, साइबर जागरूकता और वैकल्पिक रोल मॉडल तैयार करें.
आखिर खतरा क्या है?
पुराने दौर में सीमा पार से खतरा दिखता था- घुसपैठिया, हथियार या आतंकी संगठन.
नए हाइब्रिड मॉडल में खतरा कहीं ज्यादा धुंधला हो सकता है:
सोशल मीडिया की एक रील → ऑनलाइन संपर्क → कुछ हजार रुपये → छोटा आपराधिक काम → क्रिमिनल नेटवर्क → सुरक्षा पर असर → अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव.
इसीलिए शहजाद भट्टी का मामला, अगर जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है, तो सिर्फ एक गैंगस्टर की कहानी नहीं होगी. यह इस बात का उदाहरण बन सकता है कि आधुनिक हाइब्रिड संघर्ष में खुफिया एजेंसियां, क्रिमिनल नेटवर्क और सोशल मीडिया किस तरह एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं.
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