Passive Euthanasia India: भारत में इच्छामृत्यु का मुद्दा समय-समय पर चर्चा का विषय बनता रहा है. हाल ही में यह एक बार फिर सुर्खियों में है, क्योंकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने लंबे समय से अचेत अवस्था में पड़े एक युवक के मामले में पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. यह मामला हरीश राणा से जुड़ा है, जो करीब 13 वर्षों से बेहोशी की हालत में बिस्तर पर हैं. भारत में इच्छामृत्यु से जुड़ा सबसे चर्चित और ऐतिहासिक मामला अरुणा शानबाग का है. दअसलस, एक दर्दनाक घटना के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई और वे लगभग 42–43 वर्षों तक अचेत अवस्था में बिस्तर पर रहीं. उनकी गंभीर हालत को देखते हुए कुछ लोगों ने अदालत से अनुरोध किया था कि उन्हें इच्छामृत्यु की अनुमति दी जाए, ताकि उनकी पीड़ा का अंत हो सके, हालांकि उनके मामले में अनुमति नहीं मिली थी. अब जब कि हरीश राणा के मामले में अनुमति मिलने के बाद, यह मामला एक बार फिर चर्चा में है.
क्या कहते हैं एडवोकेट
ऐसे में इस आर्टिकल में एडवोकेट सूरज कुमार ने पैसिव इच्छामृत्यु के बारे में विस्तार से बताया है. उन्होंने बताया कि यह एक संवेदनशील और कानूनी विषय है, जो मरीज के जीवन और मृत्यु दोनों से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित होता है, तब उसे अनावश्यक पीड़ा से बचाने के लिए इलाज को रोक देना ही पैसिव इच्छामृत्यु कहलाता है. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह सीधे किसी की मृत्यु देना नहीं है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने देना है. भारत में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद इसे कुछ शर्तों के साथ कानूनी मान्यता भी मिल चुकी है, जिससे “गरिमा के साथ मृत्यु” का अधिकार सुनिश्चित होता है.
पैसिव इच्छामृत्यु का मतलब क्या होता है?
पैसिव इच्छामृत्यु का मतलब होता है किसी गंभीर रूप से बीमार मरीज को जीवित रखने वाली मशीनों (जैसे वेंटिलेटर) या इलाज की प्रक्रिया को हटा लेना, ताकि उक्त मरीज प्राकृतिक रूप से मृत्यु को प्राप्त हो सके. इसमें डॉक्टर सीधे मौत नहीं देते, बल्कि इलाज रोक देते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि जो मरीज तकलीफ में है और उनकी देखभाल में उसके परिजन नहीं हैं, तो पैसिव इच्छामृत्यु देकर उसे असहनीय दर्द से राहत दी जाती है.
यह शब्द पहली बार कब आया?
“Euthanasia” शब्द ग्रीक भाषा से आया है: Eu (अच्छा) + Thanatos (मृत्यु) = “अच्छी मृत्यु” इस शब्द का उपयोग सबसे पहले 17वीं सदी में Francis Bacon ने किया था. उन्होंने कहा था कि जब बीमारी लाइलाज हो, तो मरीज को दर्द से मुक्ति मिलनी चाहिए.
क्या था पहला मामला और कौन थी अरुणा शानबाग ?
इस कानून की चर्चा भारत में सबसे पहले अरुणा शानबाग से हुई थी. अरुणा शानबाग का जन्म कर्नाटक के एक सामान्य परिवार में हुआ था. शुरुआती शिक्षा उन्होंने अपने गांव में पूरी की. इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे मुंबई चली गईं. वहां उन्होंने नर्सिंग की ट्रेनिंग ली और बाद में King Edward Memorial Hospital (KEM अस्पताल) में नौकरी शुरू की. साल 1971 में उन्हें यहां नर्स के रूप में पहली नियुक्ति मिली. अपने समर्पण और मेहनत के कारण वे जल्द ही अस्पताल के स्टाफ के बीच सम्मानित और लोकप्रिय हो गईं.
शादी से पहले घटी दर्दनाक घटना
अरुणा शानबाग की शादी होने वाली थी, पर 27 नवंबर 1973 की रात शादी से ठीक एक महीने पहले उनके साथ एक भयावह घटना घटी. इस घटना ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी. अस्पताल के एक वार्डबॉय ने उनके साथ गंभीर अपराध किया और पहचान छिपाने के लिए कुत्ते की चेन से उनका गला घोंट दिया. इस हमले की वजह से उनके मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच सका. इससे उनका ब्रेन बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया. हमलावर उन्हें मृत समझकर वहां से फरार हो गया, लेकिन अरुणा जीवित रहीं, हालांकि वे गहरे कोमा में चली गईं और फिर कभी सामान्य स्थिति में वापस नहीं आ सकीं.
42 साल तक संघर्ष भरी जिंदगी
इस घटना के बाद अरुणा शानबाग वर्षों तक अचेत रहीं. वे न बोल सकती थीं, न चल-फिर सकती थीं और न ही अपने दैनिक कार्य कर सकती थीं. इसके बावजूद KEM अस्पताल की नर्सों और स्टाफ ने उनका साथ नहीं छोड़ा. उन्होंने अरुणा की देखभाल अपने परिवार के सदस्य की तरह की. करीब 42 वर्षों तक वे अस्पताल के एक बिस्तर पर जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती रहीं.
इच्छामृत्यु को लेकर कानूनी लड़ाई
साल 2011 में उनकी स्थिति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एक याचिका दायर की गई, जिसमें उनके लिए इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी गई. मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने मेडिकल बोर्ड से जांच करवाई और KEM अस्पताल के स्टाफ की राय भी ली. अस्पताल की नर्सों ने स्पष्ट कहा कि वे अरुणा की देखभाल जारी रखना चाहती हैं. 7 मार्च 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया और इच्छामृत्यु की अनुमति देने से इनकार कर दिया, हालांकि इस मामले में “पैसिव इच्छामृत्यु” को लेकर महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जरूर तय किए गए.
क्या हुआ था हरीश के साथ ?
हरीश राणा चंडीगढ़ के एक कॉलेज से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे. 20 अगस्त 2013 को पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद कोमा में चले गए. चंडीगढ़ से दिल्ली एम्स तक हरीश राणा का इलाज चला, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ. लंबे समय से उनके माता-पिता घर पर ही उनकी देखभाल कर रहे थे. 13 सालों तक दर्द झेलने और अचेत रहने के कारण आखिरकर वर्ष 2026 में उन्हें इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई है.
हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु की क्यों मिली मंजूरी?
हरिश राणा का मामला पैसिव इच्छामृत्यु को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है. वे लंबे समय से गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं और उनकी हालत ऐसी हो गई है कि वे खुद कुछ भी करने में सक्षम नहीं हैं. डॉक्टरों के अनुसार उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं बची है और वे लगातार असहनीय पीड़ा में हैं. ऐसी स्थिति में उनके परिवार ने कोर्ट से गुहार लगाई कि उन्हें किसी लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखने के बजाय शांति से मरने की अनुमति दी जाए. कोर्ट ने सभी मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह माना कि मरीज को जब ठीक होने की कोई उम्मीद न हो और वह केवल मशीनों के सहारे जीवित हो, तब पैसिव इच्छामृत्यु देना उचित हो सकता है. इसलिए हरीश राणा को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई, ताकि उन्हें बेवजह की पीड़ा से मुक्ति मिल सके और वे गरिमा के साथ अंतिम समय बिता सकें.
