Type 1 Diabetes: किसी बच्चे को छोटी उम्र में कोई गंभीर बीमारी हो जाए, तो माता-पिता के मन में सबसे पहले उसके भविष्य को लेकर डर पैदा होता है. लेकिन जर्मन टेनिस खिलाड़ी अलेक्जेंडर ज्वेरेव की कहानी बताती है कि सही सोच, परिवार का साथ और लगातार मेहनत हो तो बीमारी को जिंदगी की सीमा बनने से रोका जा सकता है.
ज्वेरेव को सिर्फ 4 साल की उम्र में टाइप 1 डायबिटीज का पता चला था. उस समय डॉक्टरों ने उनके परिवार को बताया था कि इस बीमारी की वजह से उनकी जिंदगी और खेल से जुड़ी कई चीजें सीमित हो सकती हैं. लेकिन उनकी मां इरीना ने इसे अपने बेटे के सपनों के रास्ते में नहीं आने दिया.
मां ने बेटे को दिया सबसे बड़ा हौसला
ज्वेरेव ने अपनी बड़ी जीत के बाद अपनी मां को याद करते हुए बताया कि उन्होंने कभी बीमारी को उसकी पहचान नहीं बनने दिया. उनकी मां का भरोसा था कि बेटा जो बनना चाहे, बन सकता है. यही भरोसा शायद ज्वेरेव के लिए सबसे बड़ी ताकत बना.
उन्होंने टेनिस को अपना करियर बनाया और बीमारी के बावजूद दुनिया के बड़े मंचों पर खेलते रहे. उनकी कहानी यह भी बताती है कि किसी बच्चे को बीमारी के नाम से सीमित कर देना उसके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकता है.
टाइप 1 डायबिटीज से कैसे लड़ें?
टाइप 1 डायबिटीज में शरीर इंसुलिन नहीं बना पाता, इसलिए इसे कंट्रोल में रखने के लिए डॉक्टर की सलाह के मुताबिक इंसुलिन लेना जरूरी होता है. साथ ही ब्लड शुगर की नियमित जांच करके उसके स्तर पर नजर रखनी चाहिए. बीमारी को समझना और समय-समय पर डॉक्टर से सलाह लेते रहना इसके मैनेजमेंट का अहम हिस्सा है.
डेली लाइफस्टाइल में रखें इन बातों का ध्यान
टाइप 1 डायबिटीज के साथ जिंदगी को आसान बनाने के लिए रोज की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है. समय पर खाना, पर्याप्त नींद लेना और ब्लड शुगर से जुड़ी जरूरी चीजों को नजरअंदाज न करना मददगार हो सकता है.
बच्चों को उनकी बीमारी के बारे में धीरे-धीरे समझाना भी जरूरी है, ताकि वे बड़े होने के साथ अपनी देखभाल खुद करना सीख सकें. सबसे जरूरी बात यह है कि बीमारी की वजह से बच्चे को हर समय डर या रोक-टोक में न रखा जाए.
खेल और एक्सरसाइज को लेकर रखें सावधानी
टाइप 1 डायबिटीज होने का मतलब यह नहीं कि बच्चा खेल-कूद से दूर रहे. हालांकि, एक्सरसाइज के दौरान ब्लड शुगर कम या ज्यादा हो सकता है. इसलिए खेल या वर्कआउट से पहले और बाद में शुगर की स्थिति पर नजर रखना जरूरी हो सकता है. बच्चों और खिलाड़ियों के लिए किस तरह की एक्सरसाइज सही है और किन सावधानियों की जरूरत है, यह डॉक्टर या डायबिटीज टीम से समझना बेहतर है.
परिवार का साथ बन सकता है सबसे बड़ी ताकत
बीमारी के साथ जीना केवल मरीज की जिम्मेदारी नहीं होती. परिवार का व्यवहार भी बहुत मायने रखता है. अगर माता-पिता हर समय डराने या रोकने के बजाय बच्चे को उसकी स्थिति समझने और आत्मनिर्भर बनने में मदद करें, तो उसका आत्मविश्वास बढ़ सकता है. ज्वेरेव की मां ने भी यही किया. उन्होंने बीमारी को नजरअंदाज नहीं किया, बल्कि उसे समझते हुए बेटे के सपनों पर भरोसा रखा.
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