Dried Foods: ‘सूखे-सुखाये’ खाने का अनूठा स्वाद, जानें इसके फायदे

रोजमेरी, थाइम, बेसिल, टैरागौन आदि नाम अजनबी सुनाई देते हैं, पर यदि आयुर्वेद के ग्रंथों को टटोलें, तो यह रहस्योद्घाटन होते देर नहीं लगती कि इन जड़ी-बूटियों को हमारे देसी खान-पान में भी औषधीय गुणों के कारण आहार को मौसम के अनुकूल बनाने के लिए काम लाया जाता रहा है.

शुरू में ही यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि यहां सूखा शब्द किस अर्थ में काम लाया जा रहा है. खुश्क तथा तरी वाले व्यंजन दुनियाभर के खान-पान में मिलते हैं. यहां उनका जिक्र नहीं हो रहा है. इसी तरह दुर्भिक्ष की पूर्व सूचना पहुंचाने वाले सूखे से हमारा वास्ता इस वक्त नहीं. यहां जिस खास जायके की बात हम करना चाहते हैं, वह सुखाये हुए खाद्य पदार्थों के व्यंजनों के अनोखे स्वाद का है, जो इन दोनों संदर्भों से फर्क होता है. सुखाना- धूप में फैला कर या फिर मंद या तेज आंच में भोजन को संरक्षित करने की प्राचीन विधि है. आज भले ही विज्ञान ने हमें आधुनिक तकनीक के माध्यम से फूड प्रिजर्वेशन के कई सुगम तरीके सुलभ करा दिया है, पर यह जायके के मामले में जतन से सुखाये गये खाद्य पदार्थों का मुकाबला नहीं कर सकते.

इतालवी खान-पान में ‘सन ड्राइड टमाटोस’ की निराली महिमा है, तो दुनिया की सबसे महंगी सब्जी कश्मीर की ‘गुच्छी’ का शुमार भी सुखाये गये स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ में किया जाता है. कश्मीर में ही सुखाये बैंगनों को ‘सुक वांगुन’ के लिए सर्वश्रेष्ठ समझते हैं. लद्दाख एवं पूर्वोत्तर भारत में याक के दूध से बनी पनीर को सुखा कर चुर्बी तैयार करते हैं. उत्तराखंड के गावों में जाड़े के मौसम में सुखायी मूली, मेथी तथा अन्य सब्जियों का ही सहारा रहता था.

ऐसा नहीं कि सिर्फ ठंडे पहाड़ी इलाके में रहने वाले ही सूखे जायकों पर निर्भर थे या इनसे खेलना जानते थे. तपते रेगिस्तान की संतानें भी सुखायी सब्जियों तथा बेरियों से स्वादिष्ट व्यंजन बनाने में माहिर हैं. कैर सांगरी इसका सिर्फ एक उदाहरण है. पापड़, मंगोडी मारवाड़ी सौदागरों के काफिलों के साथ ही अमृतसर पहुंची, ऐसा खान-पान के इतिहासकारों का मानना है. तटवर्ती भारत में दूध में सुखायी मछलियां चाव से खायी जाती हैं, तो हरे-भरे केरल में जिमीकंद, कटहल, केले के देसी चिप्स सुखा कर घर-घर में रखे रहते हैं ताकि जरूरत पड़ने पर तल कर या पहले से तले खाये-खिलाये जा सकें.

सूखे-सुखाये खाने के सामान का कुरकुरापन उनके स्वाद को बढ़ाता है. औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों के लिए पौपडम अर्थात पापड़ भारतीय भोजन का अनिवार्य हिस्सा समझे जाते थे. एक लंबी सूची सूखे मसालों की है, तो दूसरी सुखाये फलों की, जो मेवे बन जाते हैं. सुखाये जाने के बाद मिर्च हो या अदरक, इनका असर तेज होने लगता है. फलों में अंगूर, खुबानी, अंजीर, आलू बुखारा की याद दिलाने की जरूरत नहीं. आम से बनाये आम पापड़ को कैसे भूल सकते हैं भला! खाने में खटास का पुट देने वाला आमखड (साबुत अमचूर), कोकम, इमली इन सभी का सुखाया रूप ही अधिक प्रचलित है.

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पश्चिम में जिन बूटियों (हर्ब) का इस्तेमाल मसालों के एवज में किया जाता है, वह सुवासित वनस्पतियों की प्रजातियां ही हैं. इन्हें ताजा तथा सुखा कर दोनों तरह से काम लाया जाता है. रोजमेरी, थाइम, बेसिल, टैरागौन आदि नाम अजनबी सुनाई देते हैं, पर यदि आयुर्वेद के ग्रंथों को टटोलें, तो यह रहस्योद्घाटन होते देर नहीं लगती कि इन जड़ी-बूटियों को हमारे देसी खान-पान में भी औषधीय गुणों के कारण आहार को मौसम के अनुकूल बनाने के लिए काम लाया जाता रहा है. इनका स्वाद हमारे व्यंजनों को नायाब बनाता रहा है.

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