क्या आप भी आंखों में आंखें डालकर नहीं कर पाते बात? यह कोई कमजोरी नहीं, इसके पीछे छिपी हैं ये असली वजहें

Body Language Secrets: क्या आप भी किसी से बात करते समय अपनी नजरें झुका लेते हैं और बाद में सोचते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? अगर हां, तो इसका मतलब सिर्फ डर या झूठ नहीं होता. इसके पीछे आपके मन, सोच और बचपन से जुड़ी कई बातें छिपी हो सकती हैं. आइए आसान शब्दों में समझते हैं कि आखिर इसकी असली वजह क्या है.

Body Language Secrets: क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी से बात करते समय आपकी नजरें अपने आप ही झुक गई हों? या फिर क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि आपके लिए सामने वाले की आंखों में लगातार देखना भी मुश्किल हो गया हो? अक्सर हमें लगता है कि आंखों में आंखें डालकर बात कर पाना कॉन्फिडेंस की एक निशानी है, और अगर हम ऐसा न कर पाएं तो यह किसी डर या फिर झूठ की तरफ इशारा करता है. अगर आपको भी ऐसा ही लगता है, तो आप काफी हद तक गलत हैं. अगर आप किसी की आंखों में नहीं देख पा रहे हैं, तो इसके पीछे कई गहरे साइकोलॉजिकल और साइंटिफिक कारण भी छिपे हुए होते हैं. इनका झूठ या फिर डर से कोई भी लेना-देना नहीं है. तो चलिए, बिना बातों को घुमाए और बिल्कुल ही आसान शब्दों में जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है और इसके पीछे की असली वजह क्या है.

क्यों आप आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर पाते? Ai image

कॉन्फिडेंस की कमी और हिचकिचाहट

अगर आप बात करते समय आंखों में नहीं देख पाते हैं, तो इसका सबसे बड़ा और कॉमन कारण है लो कॉन्फिडेंस यानी कि आत्मविश्वास की कमी. जब हमें खुद पर भरोसा कम होता है या फिर हम किसी बात को लेकर झिझक महसूस कर रहे होते हैं, तो इन दोनों ही कारणों से सामने वाले से बात करते समय हमारी नजरें अपने आप नीचे झुक जाती हैं. हमें ऐसा लगता है कि सामने वाला इंसान हमारी आंखों में देखकर हमारी कमियों को पकड़ लेगा. साइकोलॉजी के अनुसार, यह पूरी तरह से एक नॉर्मल ह्यूमन बिहेवियर है. ऐसा तब और ज्यादा होता है जब हम किसी ऐसे इंसान से बात कर रहे होते हैं जो हमसे उम्र या फिर पॉजिशन में बड़ा हो.

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दिमाग पर ज्यादा लोड होना

क्या आपने कभी यह ध्यान दिया है कि जब आप कोई बहुत ही गहरी या फिर कठिन बात के बारे में सोच रहे होते हैं, तो उस समय आपकी नजरें ऊपर आसमान की तरफ या फिर नीचे जमीन की तरफ अपने आप ही चली जाती हैं? साइंटिस्ट्स की अगर मानें तो किसी की आंखों में लगातार देखना हमारे दिमाग के लिए एक बहुत ही बड़ा टास्क होता है. जब हम कुछ बहुत ही जरूरी बात सोच रहे होते हैं या फिर अपनी बातों को सही शब्दों में कहने की कोशिश कर रहे होते हैं, तो इस कंडीशन में भी हमारा दिमाग आई कॉन्टैक्ट तोड़ देता है. ऐसा इसलिए होता है ताकि दिमाग का पूरा फोकस सोचने और सही बोलने पर लग सके.

सोशल एंग्जायटी या घबराहट भी हो सकती है वजह

कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें भीड़ में जाने या फिर अनजान लोगों से बात करने में बहुत ही ज्यादा घबराहट महसूस होती है. मेडिकल की लैंग्वेज में इसे सोशल एंग्जायटी कहा जाता है. इस सिचुएशन में इंसान को हमेशा इस बात का डर लगा रहता है कि सामने वाला इंसान उसे जज कर रहा है या फिर उसका मजाक उड़ा रहा है. अपने अंदर के इसी डर और घबराहट की वजह से वह सामने वाले इंसान की आंखों में आंखें डालकर बात नहीं कर पाता और नजरें चुराने भी लग जाता है.

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बचपन की आदतें और परवरिश

आपको शायद यह जानकर हैरानी हो, लेकिन हमारी बॉडी लैंग्वेज काफी हद तक इस बात पर भी टिकी होती है कि हमारा बचपन कैसा रहा है. कई परिवारों या कल्चर्स में बड़ों की आंखों में आंखें डालकर बात करना बदतमीजी या फिर अपमान करने जैसा माना जाता है. ऐसे में जिन बच्चों को बचपन से ही बड़ों के सामने नजरें झुकाकर बात करने की आदत हो जाती है, वे बड़े होकर भी आसानी से दूसरों से आई कॉन्टैक्ट नहीं बना पाते हैं. उनके सबकॉन्शियस माइंड में यह बात बैठ जाती है कि नजरें झुकाना ही सामने वाले को इज्जत देना है.

इसे कैसे सुधारें? कुछ आसान टिप्स

अगर आपके साथ भी ऐसा होता है, तो टेंशन लेने की बिल्कुल जरूरत नहीं है. आप कुछ बहुत ही आसान और छोटी-छोटी ट्रिक्स अपनाकर इस आदत को सुधार सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले आप 50/70 का रूल फॉलो करना शुरू करें. इसका मतलब यह है कि जब आप खुद बोल रहे हों, तो लगभग आधे समय ही सामने वाले से आई कॉन्टैक्ट बनाकर रखें, और जब आप सामने वाले की बात सुन रहे हों, तो अपना ध्यान लगभग 70 प्रतिशत समय उनकी तरफ रखें. अगर आपको डायरेक्टली किसी की आंखों में देखने से घबराहट महसूस होती है, तो आप उनकी दोनों भौहों के बीच में या फिर नाक के ऊपरी हिस्से पर देख सकते हैं. इससे सामने वाले इंसान को यही फील होगा कि आप सीधे उनकी आंखों में ही देख रहे हैं और आपकी घबराहट भी दूर हो जाएगी. इस बदलाव के लिए आप बहुत धीरे-धीरे शुरुआत करें. सबसे पहले अपने परिवार के लोगों और करीबी दोस्तों से बात करते समय आई कॉन्टैक्ट बनाने की प्रैक्टिस करें. धीरे-धीरे यह आपकी एक परमानेंट आदत बन जाएगा.

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लेखक के बारे में

Published by: Saurabh Poddar

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