क्या चिप्स के पैकेट में हवा भरकर कंपनियां आपको बना रही हैं बेवकूफ? असली वजह जानकर घूम जाएगा आपका दिमाग

Air in Chips Packet: अगर हर बार चिप्स का पैकेट खोलते ही आपको ऐसा लगता है कि कंपनियां आपको ठग रही हैं, तो यह आर्टिकल आपकी सोच को पूरी तरह से बदल सकता है. जब आप इस आर्टिकल को पढ़ लेंगे तो आपको यह समझ में आने लगेगा कि इसके पीछे कोई स्कैम या धोखा नहीं, बल्कि सोची-समझी साइंस है.

Air in Chips Packet: जब आप बाजार से चिप्स का पैकेट लेकर आते हैं, तो उसे खोलते ही आपका दिल पूरी तरह से टूट जाता है. बाहर से पैकेट को देखकर लगता है कि इसके अंदर तो चिप्स ऊपर तक भरा हुआ होगा, लेकिन पैकेट खोलते ही उससे सारी हवा निकल जाती है और नीचे बैठे हुए मिलते हैं मुट्ठी भर चिप्स. इस समय दिमाग पूरी तरह से घूम जाता है और गुस्सा भी आता है. जब पैकेट से हवा निकल जाती है तो दिमाग में सबसे पहला सवाल आता है कि, यार ये कंपनियां तो हमें खुलेआम ठग रही हैं. पैकेट में चिप्स से ज्यादा तो हवा ही भरा हुआ है. अगर आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है या फिर आपको हर दिन ऐसा ही लगता है, तो आपको यह समझना होगा कि क्या कंपनियां वाकई में अपने कस्टमर्स को बेवाकूफ बनाने का बिजनेस कर रही है या फिर इसके पीछे कोई साइंस है? जब आप इस आर्टिकल को पूरा पढ़ लेंगे, तो आपको कंपनियों के ऐसा करने के पीछे का कारण साफ समझ में आने लग जाएगा.

क्या पैकेट में सिर्फ नॉर्मल हवा होती है?

अगर आपको लगता है कि पैकेट में वही हवा है जिसमें हम सांस लेते हैं, तो आप पूरी तरह से गलत हैं. कंपनियां चिप्स के पैकेट में सिंपल हवा हवा या ऑक्सीजन नहीं भरती, बल्कि पैकेट्स में नाइट्रोजन गैस भरे जाते हैं. अब आप कहेंगे कि इसकी क्या जरूरत है? दरअसल, अगर पैकेट में नॉर्मल हवा छोड़ दी जाए, तो उसमें मौजूद ऑक्सीजन नमकीन के तेल और मसालों के साथ मिलकर चिप्स का पूरा मजा ही खराब कर देगी. इसकी वजह से नमकीन तुरंत सील जाएगी, उसका स्वाद अजीब हो जाएगा और उसमें से महक आने लगेगी. नाइट्रोजन गैस पूरी तरह से सेफ होती है और यह चिप्स को महीनों तक एकदम फ्रेश और क्रिस्पी रखने में मदद भी करती है.

चूरा होने से बच जाता है आपका स्नैक

बता दें फैक्ट्री से निकलकर चिप्स डायरेक्टली आपकी दुकान तक नहीं पहुंचती. इसे ट्रकों में लादकर, उबड़-खाबड़ रास्तों से होते हुए लंबा सफर तय करना पड़ता है. लोडिंग और अनलोडिंग के समय इन पैकेट्स को जमकर पटका भी जाता है. अब सोचिए, अगर पैकेट एकदम पिचके हुए होंगे, तो रास्ते के झटकों से अंदर के सारे चिप्स और नमकीन टूटकर पाउडर बन जाएंगे. यह जो नाइट्रोजन गैस का गुब्बारा होता है, यह एक कुशन की तरह काम करता है. इसकी वजह से पैकेट पर कितना भी प्रेशर पड़े, अंदर की चिप्स और नमकीन बिल्कुल सही-सलामत बची रहती है.

तो क्या यह सीधे-सीधे धोखाधड़ी है?

अब बात करते हैं आपके सबसे बड़े सवाल की, क्या कंपनियां इस बहाने हमसे एक्स्ट्रा पैसे वसूल रही हैं? ईमानदारी से कहें तो नहीं, यह आपके साथ कोई स्कैम या धोखा नहीं है. कानूनी तौर पर हर कंपनी के लिए यह जरूरी किया गया है कि वह पैकेट पर नेट वेट यानी कि चिप्स का असली वजन साफ-साफ लिखे जैसे कि 30 ग्राम या फिर 50 ग्राम या उससे भी ज्यादा. कंपनियां आपसे पैकेट की लंबाई-चौड़ाई के पैसे नहीं मांगतीं, बल्कि उस वजन के पैसे लेती हैं. हां, यह जरूर है कि बड़ा पैकेट देखकर हमारी आंखें धोखा खा जाती हैं और हमें लगता है कि बहुत सारा चिप्स निकलने वाला है. इसे आप कंपनियों की चालाक मार्केटिंग कह सकते हैं, लेकिन धोखाधड़ी बिल्कुल नहीं.

फूले हुए पैकेट की एक और तरकीब

पैकेट में ज्यादा हवा भरने की एक वजह यह भी है कि दुकानों पर लटके हुए फूले-फूले पैकेट दिखने में काफी अट्रैक्टिव लगते हैं. इन्हें देखकर बच्चों और बड़ों का मन तुरंत इन्हें खरीदने का कर जाता है. इसके अलावा, नाइट्रोजन से भरे इस पैकेट में किसी भी तरह के बैक्टीरिया या फंगस नहीं पनप पाते, जिससे ये चिप्स आपकी सेहत भी सुरक्षित बनी रहती है.

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लेखक के बारे में

Published by: Saurabh Poddar

सौरभ पोद्दार एक लाइफस्टाइल जर्नलिस्ट हैं और पिछले 4 सालों से डिजिटल मीडिया में एक्टिव हैं. उन्होंने रांची के सेंट जेवियर्स कॉलेज से जर्नलिज्म और मास कम्युनिकेशन में मास्टर्स किया है. फिलहाल, सौरभ 'प्रभात खबर' के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बतौर कंटेंट राइटर काम कर रहे हैं. सौरभ को उन विषयों पर लिखना सबसे ज्यादा पसंद है, जो हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े हैं. उनके आर्टिकल्स में आपको हेल्थ, फिटनेस, स्किन-हेयर केयर, पेरेंटिंग, हेल्दी रेसिपीज, घरेलू नुस्खे, रिलेशनशिप और वास्तु शास्त्र जैसी उपयोगी जानकारियां मिलेंगी. फिटनेस और अच्छी सेहत सौरभ की निजी जिंदगी का भी अहम हिस्सा हैं. वे जिन विषयों पर लिखते हैं, उन्हें अपनी रूटीन में फॉलो भी करते हैं. उनका मानना है कि जब आप किसी चीज को खुद एक्सपीरियंस करते हैं, तभी दूसरों तक सही और प्रैक्टिकल जानकारी पहुंचा सकते हैं. उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि वे ट्रेंडिंग टॉपिक्स पर बिल्कुल आसान और आम बोलचाल की भाषा में लिखें, ताकि हर पाठक उसे आसानी से समझ सके. यही वजह है कि उनके लिखे आर्टिकल्स काफी एंगेजिंग और एसईओ फ्रेंडली होते हैं.

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