Rajni Ki Barat: बचपन में झांसी की रानी सीरियल में मनु के किरदार से घर-घर में पहचान बनाने वाली मशहूर अभिनेत्री उल्का गुप्ता (Ulka Gupta) अब बड़े पर्दे पर अपनी कला का लोहा मनवा रही हैं. आदित्य अमन (Aditya Aman) द्वारा निर्देशित फिल्म ‘रजनी की बारात’ में उनके अभिनय को खूब सराहा जा रहा है. मुंबई में पैदा होने और वहीं पली-बढ़ी होने के बावजूद वे अपनी बिहारी जड़ों और संस्कृति से बेहद गहराई से जुड़ी हुई हैं. फिल्म की शूटिंग भी दरभंगा में संपन्न हुई है. इसे लेकर उन्होंने प्रभात खबर से बातचीत की.
उन्होंने बताया कि यह फिल्म उनके लिए बिहार की समृद्ध संस्कृति को एक ट्रिब्यूट देने जैसा है, जिसमें मिथिलांचल के असली टोन और महिला सशक्तिकरण की एक नायाब सोच को बड़े पर्दे पर उतारा गया है.
Q. आपकी जड़ें बिहार से जुड़ी हैं. दरभंगा में शूटिंग के दौरान अपने राज्य में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
– मेरा जन्म व परवरिश भले ही मुंबई में हुई है, लेकिन मेरी जड़ें हमेशा बिहार से जुड़ी रही हैं. बचपन से हम छठ पूजा या शादियों में बिहार जाते रहे हैं. मुंबई की टीम शुरुआत में दरभंगा आने पर थोड़ीडरी हुई थी. संयोग से जिस दिन हम पहुंचे, उस दिन होली थी. होटल के शेफ होली खेलने चले गए, तो हमें समय पर खाना नहीं मिला. लेकिन इसकी अपनी एक अलग खूबसूरती है. जब लोगों को पता चला कि मिथिला की बेटी आई है, तो हर घर से मेरे लिए खाना आने लगा. वहां का लाड-प्यार, घुघनी, सत्तू व सरसों के तेल का स्वाद लाजवाब था. बिहार में जो सुकून और गाढ़ा कल्चर है, वह बड़े शहरों में कहीं नहीं मिलता.
Q. Rajani Ki Barat में रजनी का किरदार निभाने की सबसे बड़ी चुनौती क्या थी और इसमें आपको सबसे ज्यादा क्या पसंद आया?
– जब मुझे इस फिल्म का वन-लाइनर बताया गया कि यह मिथिला की लड़की रजनी झा की कहानी है, तो मैं तुरंत तैयार हो गई. बाहर के लोग बिहार का मतलब सिर्फ भोजपुरी समझते हैं, उन्हें मैथिली, मगही या अंगिका के बारे में पता ही नहीं है. इस फिल्म के जरिए हम मिथिलांचल के असली टोन और वहां के लोगों को दिखा पाए हैं. सबसे नायाब बात यह है कि इस फिल्म में एक लड़की अपनी बारात लेकर जा रही है. यह सोच ही लड़कियों को सशक्त करती है कि वे अपने जीवन की लगाम खुद अपने हाथों में लें. घर के संस्कार भी रहें और अपना फैसला भी खुद करें, यही इसका असली मैसेज है.
Q. आपको मनु के किरदार से पहचान मिली. इतने सालों में एक कलाकार के रूप में खुद में सबसे बड़ा बदलाव क्या देखती हैं?
– बचपन में भी मेरा मिजाज थोड़ालड़कों जैसा ही था. मैं फुटबॉल, क्रिकेट खेलती थी और कुंगफू करती थी. झांसी की रानी के मनु का स्वभाव भी ऐसा ही था, इसलिए वह रोल मेरे करीब था. उस सीरियल से मैंने सबसे बड़ी बात यह सीखी कि नारी कुछ भी कर सकती है. एक औरत होना भगवान का आशीर्वाद है. वहीं से मेरे भीतर यह बात बैठ गई कि अपना देश और समाज सबसे पहले है. इसी कनविक्शन के कारण जब मुझे ‘द केरला स्टोरी’ का ऑफर मिला, तो मेरे मन में कोई झिझक नहीं थी क्योंकि वह समाज की भलाई से जुड़ा एक गंभीर मुद्दा था.
Q. टीवी, हिंदी फिल्मों व रीजनल सिनेमा में काम करने के दौरान किस माध्यम में अभिनय की सबसे ज्यादा चुनौती महसूस होती है?
– परिश्रम और अभिनय की जरूरत हर जगह होती है, लेकिन अलग-अलग किरदार आपको चैलेंज करते हैं.‘रजनी की बारात’ में मैथिली टोन पकड़ना मेरे लिए आसान था क्योंकि घर में सब मैथिली जानते हैं. लेकिन ‘द केरला स्टोरी’ में एक मलयाली लड़की का रोल करने के लिए मैंने वर्कशॉप की. चुनौती यह होती है कि जब आप कोई रीजनल कैरेक्टर करें, तो वहां के लोगों को ठेस न पहुंचे. हमारा अभिनय इतना रियल होना चाहिए कि उन्हें लगे कि हम उनका सम्मान कर रहे हैं, मजाक नहीं उड़ारहे. जब मेरे मलयाली दोस्तों ने मेरे एक्सेंट की तारीफ की, तो मुझे लगा कि मेरी मेहनत सफल हो गई.
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Q. बिहार की कई लड़कियां अभिनय की दुनिया में करियर बनाना चाहती हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगी?
– एक वक्त था जब लोग फिल्म इंडस्ट्री में अपनी बिहारी आइडेंटिटी छुपाते थे, लेकिन अब वक्त बदल चुका है. मुझे अपने बिहारी होने पर गर्व है. जो लड़कियां इस फील्ड में आना चाहती हैं, उन्हें सबसे पहले थिएटर करना चाहिए, क्योंकि वहां से बहुत कुछ सीखने को मिलता है. आजकल ऑनलाइन ऑडिशन के भी बहुत सारे मौके हैं, इसलिए अच्छी कास्टिंग एजेंसियों पर नजर रखनी चाहिए. काम न मिलने पर घबराना नहीं चाहिए. आज जयदीप अहलावत, शेफाली शाह व मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों ने केवल अपनी बेहतरीन एक्टिंग के दम पर अपनी जगह बनाई है. लुक्स के साथ-साथ अच्छी एक्टिंग ही आपको टिकाए रखेगी.
