Film Review: मां बेटी के रिश्ते की इमोशनल कहानी Tribhanga

Film Review Tribhanga, Tribhanga film: प्रसिद्ध अभिनेत्री रेणुका शहाने ने मराठी फिल्म रीटा से बतौर निर्देशिका अपनी शुरुआत 2009 में की थी।त्रिभंग उनकी बतौर निर्देशिका हिंदी फिल्मों में पहली शुरुआत है।त्रिभंग ओड़िसी डांस की एक मुद्रा है जिसमें सिर,धड़ और घुटने पर मुड़ा हुआ हो���ा है. फ़िल्म भी ऐसे ही तीन महिलाओं की कहानी है।जो एक परिवार से हैं लेकिन अलग अलग पीढियां।कुलमिलाकर कामयाब मांओं की ज़िंदगी को उनके बच्चों के नज़रिए से ये फ़िल्म दिखाती है.

फ़िल्म : त्रिभंग

निर्देशक : रेणुका शाहने

कलाकार : काजोल, तन्वी आज़मी, मिथिला, कुणाल रॉय कपूर, कंवलजीत और अन्य

प्लेटफार्म : नेटफ्लिक्स

रेटिंग : तीन

प्रसिद्ध अभिनेत्री रेणुका शहाने ने मराठी फिल्म रीटा से बतौर निर्देशिका अपनी शुरुआत 2009 में की थी।त्रिभंग उनकी बतौर निर्देशिका हिंदी फिल्मों में पहली शुरुआत है।त्रिभंग ओड़िसी डांस की एक मुद्रा है जिसमें सिर,धड़ और घुटने पर मुड़ा हुआ होता है. फ़िल्म भी ऐसे ही तीन महिलाओं की कहानी है।जो एक परिवार से हैं लेकिन अलग अलग पीढियां।कुलमिलाकर कामयाब मांओं की ज़िंदगी को उनके बच्चों के नज़रिए से ये फ़िल्म दिखाती है.

फ़िल्म की कहानी पर आए तो त्रिभंग की कहानी तीन पीढ़ी की तीन अलग अलग महिलाओं की कहानी है। नयनतारा आप्टे( तन्वी आज़मी) एक प्रसिद्ध लेखिका है लेकिन शादी के लिए गलत आदमियों के चुनाव की वजह से उसकी बेटी अनुराधा(काजोल) को बहुत कुछ झेलना पड़ता है. वह अपने सौतेले पिता से शारीरिक शोषण का भी शिकार होती है. जिस वजह से वह अपनी मां से नफरत करने लगती है।अपनी मां की गलतियों से सीख लेते हुए प्रसिद्ध अभिनेत्री और डांसर अनु कभी शादी नहीं करती है वह रूसी युवक के साथ लिव इन में रहते हुए प्रेग्नेंट होती है.

उसकी मां की तरह उसकी जिंदगी में भी पुरुष आते रहते हैं लेकिन वह अपने किसी बॉयफ्रेंड को कभी अपने घर यानी बेटी माशा के करीब आने देती है लेकिन माशा ( मिथिला) को भी अपनी मां से शिकायतें हैं. बिना शादी के अपने जन्म की पहचान से उसे एतराज़ है. उसके पिता उसके साथ कभी नहीं थे उसे इस बात का बहुत दुख है लेकिन वह अपनी से ना तो शिकायत करती है ना ही नफरत लेकिन वह इस वजह से संकीर्ण सोच रखने वाले परिवार में शादी ज़रूर कर लेती है ताकि उसकी मां और नानी की तरह उसकी जिंदगी बिखरी हुई ना हो. वह अपने बच्चे को पिता और परिवार दे सके. जो उसे कभी नहीं मिल सका. नयन तारा के कोमा में जाने के तीनों पीढ़ी एक साथ होती है और उन्हें अपने फैसले और रिश्तों पर सोचने का मौका मिलता है. जिससे बिगड़े हुए रिश्ते सुधरते हैं.

फ़िल्म मां और बेटी की कहानी होने के साथ साथ महिलाओं से जुड़े कई दूसरे मुद्दे परिवार में हो रहे शारीरिक शोषण, सिंगल मदर से जुड़े पूर्वाग्रह, पुरुष प्रधान समाज को भी बखूबी रखती है.

डेढ़ घंटे की कहानी में संवेदनशील तरीके से ज़िन्दगी की कहानी को बयां किया है. सबकुछ रियलिस्टिक है इसलिए किरदार दोषरहित नहीं होने के बावजूद नकारात्मक नहीं लगते हैं फिर चाहे नयनतारा हो या अनुपमा का. कहानी फ्लैशबैक के ज़रिए अतीत और वर्तमान में कही गयी है. महिला प्रधान इस फ़िल्म में महिलाएं मजबूरी में फैसला नहीं ले रही है बल्कि अपनी शर्तों पर जीवन जी रही है।यह इसे खास बनाता है. जिसके लिए लेखिका और निर्देशिका रेणुका शहाने की तारीफ करनी होगी.

अभिनय की बात करें तो काजोल ने अपने किरदार को बहुत ही बेबाक अंदाज़ में जिया है जो इस फ़िल्म को खास बना जाता है तो वहीं तन्वी आज़मी भी अपने किरदार की गहराई में उतरी हैं. परदे पर दोनों का अभिनय एक अलग ही रंग इस कहानी में भरता है. मिथिला पारकर और कुणाल रॉय कपूर ने इनका साथ बखूबी दिया है. बाकी के किरदार भी अपनी हिस्से के सीन्स बखूबी निभा गए हैं.

फ़िल्म के संवाद कहानी को और प्रभावी बनाते हैं खासकर नयनतारा का लिखा हुआ खत इमोशनल कर जाता है. यह एक दिल को छू जाने वाली कहानी है.

प्रभात खबर डिजिटल प्रीमियम स्टोरी

लेखक के बारे में

Published by: कोरी

Digital Media Journalist having more than 2 years of experience in life & Style beat with a good eye for writing across various domains, such as tech and auto beat.
और पढ़ें

संबंधित खबरें >

यह भी पढ़ें >