जब-जब ‘पद्मावत’ की बात हुई है, तब-तब हंगामा बरपा है. कभी संजय लीला भंसाली के सेट पर हमला हुआ. कभी उन्हें थप्पड़ मारे गए. दीपिका पादुकोण की नाक काटने की धमकी दी गई. फिल्म का नाम बदला गया. रिलीज के वक्त सिनेमाघरों तक विरोध पहुंचा और अब करीब आठ साल बाद ‘पद्मावत’ फिर विवाद में है.
इस बार वजह हैं स्वरा भास्कर.
स्वरा ने फिल्म के जौहर सीन को लेकर अपनी पुरानी आपत्ति दोबारा सामने रखी. उनका सवाल था कि अगर किसी महिला के साथ यौन हिंसा होती है और वह उसके बाद जिंदगी चुनती है, तो क्या उसे कम सम्मान की नजर से देखा जाना चाहिए? उनके मुताबिक ‘पद्मावत’ में जौहर को जिस तरह दिखाया गया, उससे समाज में महिलाओं को लेकर एक परेशान करने वाला संदेश जा सकता है.
इसके बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई. स्वरा पर आरोप लगा कि उन्होंने जौहर करने वाली महिलाओं और रानी पद्मावती को कायर बताया. उन्होंने इस आरोप से इनकार किया और कहा कि उनका सवाल जौहर करने वाली महिलाओं पर नहीं, बल्कि फिल्म में उसके चित्रण और उससे निकलने वाले संदेश पर था.
विरोध के बीच उन्हें जुबान काटने की धमकी तक दिए जाने की बात सामने आई.
यानी ‘पद्मावत’ पर आठ साल बाद फिर बहस है. लेकिन इस बार फिल्म की कहानी से ज्यादा चर्चा उस एक शब्द की है- जौहर.
इस शब्द को समझने के लिए कहानी को आज के विवाद से निकालकर सदियों पीछे ले जाना होगा.
‘पद्मावत’ का विवाद शुरू से ही इतना बड़ा क्यों था?
साल 2017 में संजय लीला भंसाली ‘पद्मावती’ बना रहे थे. दीपिका पादुकोण रानी पद्मावती, शाहिद कपूर रतन सिंह और रणवीर सिंह अलाउद्दीन खिलजी के किरदार में थे.
फिल्म की शूटिंग के दौरान ही विरोध शुरू हो गया.
जयपुर में फिल्म के सेट पर हमला हुआ. भंसाली के साथ मारपीट की गई और सेट को नुकसान पहुंचाया गया. बाद में कोल्हापुर में बनाए गए सेट पर भी तोड़फोड़ हुई.
विरोध करने वालों की सबसे बड़ी आपत्ति यह थी कि फिल्म में रानी पद्मावती के इतिहास को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. उस कथित ड्रीम सीक्वेंस को लेकर भी विवाद हुआ, जिसमें पद्मावती और खिलजी को साथ दिखाए जाने की बात कही जा रही थी. भंसाली ने ऐसी किसी रोमांटिक कल्पना से इनकार किया.
इसके बाद विवाद दीपिका तक पहुंचा.
दीपिका को नाक काटने की धमकी दी गई. भंसाली और दीपिका के खिलाफ इनाम की घोषणाओं की खबरें सामने आईं.
फिल्म का नाम ‘पद्मावती’ से ‘पद्मावत’ हुआ. रिलीज टली और जनवरी 2018 में फिल्म सिनेमाघरों तक पहुंची. लेकिन विरोध वहां भी खत्म नहीं हुआ.
यानी ‘पद्मावत’ की रिलीज से पहले ही एक बात साफ हो चुकी थी. यह सिर्फ फिल्म नहीं रह गई थी. यह इतिहास और उससे जुड़े sentiment का मामला बन चुकी थी.
जौहर की कहानी यहीं से शुरू होती है
फिल्म के क्लाइमेक्स में रानी पद्मावती और दूसरी महिलाओं का जौहर दिखाया गया है.
मध्यकालीन युद्धों के संदर्भ में जौहर उस स्थिति से जुड़ा था, जब किसी किले की हार तय मानी जाती थी और महिलाओं के सामने बंदी बनाए जाने, हिंसा, यौन शोषण या गुलामी का खतरा होता था. ऐसे हालात में महिलाओं के सामूहिक आत्मदाह को जौहर कहा जाता था.
इसके बाद पुरुष योद्धा आखिरी लड़ाई के लिए निकलते थे, जिसे साका कहा जाता था.
यानी जौहर को उस समय की युद्ध व्यवस्था से अलग करके समझना मुश्किल है. किले की घेराबंदी, हार और दुश्मन के हाथों पड़ने का डर इसके पीछे बड़ी वजह थे.
लेकिन चित्तौड़ की कहानी में जौहर सिर्फ एक घटना नहीं, एक बड़ी ऐतिहासिक स्मृति बन गया.
चित्तौड़ के किले से जुड़ी हैं तीन बड़ी घटनाएं
चित्तौड़गढ़ के इतिहास में तीन बड़े जौहरों का उल्लेख मिलता है- 1303, 1535 और 1568.
1303 में अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला किया. इसी घटना के साथ रानी पद्मिनी की सबसे मशहूर कहानी जुड़ती है.
1535 में गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के हमले के दौरान हुए जौहर को परंपरा में रानी कर्णावती से जोड़ा जाता है.
फिर 1568 में अकबर की सेना ने चित्तौड़ पर हमला किया. इस दौरान भी जौहर की घटना का उल्लेख मिलता है.
इन घटनाओं ने चित्तौड़ को राजपूत इतिहास में एक अलग जगह दी. यहां जौहर की कहानी रानियों और महिलाओं की कुर्बानी के साथ जुड़ती चली गई.
यही वजह है कि आज भी इनका जिक्र सिर्फ इतिहास की तारीखों के साथ नहीं होता. इनके साथ साहस, सम्मान और बलिदान की भावना भी जुड़ी हुई है.
लेकिन रानी पद्मिनी की कहानी में इतिहास और लोककथा अलग-अलग हो जाते हैं
यहीं ‘पद्मावत’ की सबसे दिलचस्प परत सामने आती है.
रानी पद्मिनी या पद्मावती की सबसे प्रसिद्ध कहानी मलिक मुहम्मद जायसी की रचना ‘पद्मावत’ में मिलती है. इसे करीब 1540 के आसपास लिखा गया माना जाता है.
यानी 1303 की चित्तौड़ की घटना के दो सदी से ज्यादा बाद.
अलाउद्दीन खिलजी के दौर के प्रमुख ऐतिहासिक विवरणों में पद्मिनी का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता. इसी वजह से इतिहासकारों के बीच उनकी ऐतिहासिकता को लेकर लंबे समय से बहस है.
इसका मतलब यह नहीं कि जौहर की घटनाएं भी काल्पनिक थीं.
पद्मिनी की कहानी और जौहर की ऐतिहासिक परंपरा को अलग-अलग देखना जरूरी है.
पद्मिनी का इतिहास विवादित हो सकता है, लेकिन चित्तौड़ के बाद के जौहर इतिहास का हिस्सा हैं.
और शायद यही वह फर्क है, जिसे ‘पद्मावत’ के विवाद में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है.
फिर रानियों की कुर्बानी को इतना सम्मान क्यों मिला?
उस दौर में युद्ध सिर्फ राजा और सैनिकों के बीच की लड़ाई नहीं था. किसी किले की हार का असर पूरे राजघराने पर पड़ता था. महिलाओं के सामने बंदी बनाए जाने और दुश्मन के हाथों पड़ने का खतरा रहता था.
राजपूत युद्ध संस्कृति में इसे सम्मान और अपमान की बड़ी लड़ाई के रूप में देखा गया.
इसी सोच के बीच जौहर को आखिरी प्रतिरोध की तरह याद किया गया.
रानी कर्णावती से जुड़ी कहानी हो या पद्मिनी की लोककथा. समय के साथ इन महिलाओं की छवि सिर्फ रानियों की नहीं रही. वे उस दौर की अस्मिता और कुर्बानी का प्रतीक बन गईं.
यही कारण है कि इनसे जुड़ी किसी भी कहानी पर प्रतिक्रिया सिर्फ फिल्म की प्रतिक्रिया नहीं होती.
वह sentiment से जुड़ जाती है.
और यही बात ‘पद्मावत’ के मामले में भी हुई.
लेकिन आज सवाल कुछ और है
आज जब उसी जौहर की कहानी को देखा जाता है तो सवाल बदल गया है.
अगर किसी महिला के सामने हिंसा या यौन शोषण का खतरा हो, तो क्या उसके लिए मौत को सम्मान से जोड़ना सही है?
क्या जिंदगी चुनने वाली महिला को कम बहादुर माना जा सकता है?
और क्या आज के दर्शक को जौहर को सिर्फ गौरव और बलिदान के फ्रेम में दिखाना चाहिए?
स्वरा का सवाल इसी जगह आता है.
दूसरी तरफ फिल्म के लेखक प्रकाश कपाड़िया का तर्क है कि जौहर उस समय की वास्तविकता थी और फिल्म ने उसे उसी संदर्भ में दिखाया. यानी एक पक्ष इतिहास को उसके समय के हिसाब से देखने की बात करता है. दूसरा आज की संवेदना से सवाल करता है.
यही बहस ‘पद्मावत’ को सिर्फ इतिहास की फिल्म नहीं रहने देती.
इतिहास पर फिल्म बनाना हमेशा विवाद के साथ क्यों आता है?
‘पद्मावत’ अकेली फिल्म नहीं है.
‘जोधा अकबर’ में ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर विरोध हुआ. ‘बाजीराव मस्तानी’ पर भी इतिहास को लेकर विवाद खड़ा हुआ. 2022 में अक्षय कुमार की ‘पृथ्वीराज’ का नाम बदलकर ‘सम्राट पृथ्वीराज’ किया गया. 2025 में ‘छावा’ के लेजिम डांस सीन पर आपत्ति हुई और विरोध के बाद वह हिस्सा हटा दिया गया.
हर बार एक ही टकराव सामने आया.
फिल्मकार इतिहास को कहानी की तरह देखता है.
दर्शक उसे अपनी पहचान और स्मृति से जोड़कर देखता है.
और इतिहासकार स्रोतों के आधार पर सवाल उठाता है.
यही तीनों नजरिए जब एक जगह आते हैं, तो विवाद होना लगभग तय हो जाता है.
आठ साल बाद भी जौहर पर बहस क्यों?
‘पद्मावत’ की रिलीज को आठ साल हो चुके हैं. फिर भी एक पुराना सीन आज के विवाद के केंद्र में है.
क्योंकि जौहर सिर्फ एक ऐतिहासिक घटना नहीं है. वह अलग-अलग लोगों के लिए अलग अर्थ रखता है.
किसी के लिए यह रानियों की कुर्बानी और आखिरी प्रतिरोध है.
किसी के लिए यह उस दौर की महिलाओं की मजबूरी की तस्वीर है.
और किसी के लिए यह इतिहास को आज के नजरिए से समझने का सवाल है.
स्वरा के बयान ने इसी पुराने सवाल को फिर सामने ला दिया है.
शायद इसलिए इस बहस का जवाब सिर्फ ‘स्वरा सही हैं’ या ‘स्वरा गलत हैं’ में नहीं है.
सवाल यह है कि इतिहास को याद करते वक्त क्या हम सिर्फ गौरव देख सकते हैं और उसकी त्रासदी को भूल सकते हैं?
और क्या किसी रानी की कुर्बानी का सम्मान करते हुए उस दौर की महिलाओं की मजबूरी पर सवाल नहीं किया जा सकता?
‘पद्मावत’ का जौहर सीन आज फिर चर्चा में है.
लेकिन असली बहस उस आग की नहीं, उस आग को देखने वाली हमारी नजर की है.
