फिल्म -दो दीवाने सहर में
निर्माता – भंसाली प्रोडक्शन
निर्देशक -रवि उद्यावर
कलाकार – सिद्धांत चतुर्वेदी, मृणाल ठाकुर,आयशा रजा. इला अरुण, जॉय सेनगुप्ता और अन्य
प्लेटफार्म -सिनेमाघर
रेटिंग -ढाई
do deewane seher mein review :फ़रवरी का महीना मतलब प्यार का महीना होता है.बीते सप्ताह ओ रोमियो रिलीज हुई थी तो इस शुक्रवार दो दीवाने सहर में ने दस्तक दे दी है. ओ रोमियो जहां मारकाट से भरी थी। वही यह सिंपल लव स्टोरी है हालांकि यह फिल्म भी यादगार लव स्टोरी फिल्म नहीं पायी है। कहानी प्रेडिक्टेबल रह गयी है लेकिन यह फिल्म यह बताने में कामयाब जरूर होती है कि किसी और को प्यार करने से पहले आपको खुद से प्यार करना होगा.
ये है कहानी
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह शशांक (सिद्धांत चतुर्वेदी और रोशनी (मृणाल ठाकुर )की है। शशांक गुड लुकिंग बंदा है.टैलेंटेड है.मार्केटिंग फर्म में काम करता है लेकिन शशांक की अपनी इंसिक्योरिटी है. वह पटना से मुंबई आया है. उसके बोलचाल में श को स बोलता है. मार्केटिंग फर्म में जहां बोल बच्चन ही सबकुछ है. ऐसे में जब उसे पब्लिक स्पीकिंग से डर लगता है,तो यह पूरी तरह से शशांक को आत्मविश्वास को खत्म कर देता है. वहीं रोशनी एक मीडिया फर्म में काम करती है.वह अपनी ग्राफ़िक डिजाइनिंग की खूबियों से सबको खूबसूरत बनाती है लेकिन उसका अपने लुक्स को लेकर काम्प्लेक्स है.उसकी बहन नैना (संदीपा धर ) उससे बेहद ज्यादा खूबसूरत है.वह अच्छी नहीं दिखती है इसलिए कभी कोई लड़का उससे प्यार नहीं कर पायेगा।दोनों के पेरेंट्स उनको एक दूसरे के लिए ढूंढते हैं. क्या वह एक दूसरे से प्यार कर पाएंगे और उससे पहले अपनी असुरक्षा को खत्म कर खुद से. आगे क्या होता है. यह जानने के लिए आपको थिएटर की ओर रुख करना होगा.
फिल्म की ये हैं खूबियां
फिल्म एक लव स्टोरी है लेकिन यह खुद से प्यार करने और खुद को स्वीकारने की सीख पहले देती है.यह फिल्म मौजूदा दौर में और ज्यादा प्रासंगिक हो गयी है क्योंकि सोशल मीडिया वाले दौर में जहां फ़िल्टर हर किसी की दुनिया का हिस्सा है.वहां यह फिल्म आइना दिखाती है कि आप जैसे हैं.वैसे परफेक्ट हैं.प्यार में किसी को बदलने का नहीं बल्कि उसकी कमियों के साथ उसे स्वीकारने का भी नाम है. फिल्म धीरे धीरे आगे बढ़ती है और खुद से जोड़ती जाती है.महानगरों के वर्किंग कल्चर को भी फिल्म में अच्छे से जोड़ा गया है. तकनीकी पक्ष की बात करें तो फिल्म की सिनेमेटोग्राफी में मुंबई की चकाचौंध और तेज तर्रार जिंदगी को दिखाने के साथ साथ उत्तराखंड के पहाड़ों के सुकून को भी जोड़ा गया है. फिल्म के संवाद रियलिस्टिक अप्रोच लिए हैं.जो मौजूदा दौर के दर्शकों को आसानी से खुद से जोड़ देते हैं. फिल्म के शीर्षक की बात करें टी गुलज़ार के लिखे गीत दो दीवाने शहर में को दो दीवाने सहर में करना शशांक की असुरक्षा से बहुत खूबसूरती के साथ निर्देशक ने जोड़ा है.
खामियां भी हैं
फिल्म की खामियों की बात करें तो फिल्म की रफ़्तार धीमी है. सेकेण्ड हाफ में कहानी खींचती जान पड़ती है.फिल्म की एडिटिंग पर थोड़ा और काम होना चाहिए। इसके साथ ही स्क्रीनप्ले पर भी। इंटरवल के बाद आया हुआ ट्विस्ट थोपा हुआ लगता है और फिल्म आखिरी में एकदम प्रेडिक्टेबल हो गयी है. फिल्म के सब प्लॉट्स पर थोड़ा और काम करने की जरूरत थी और दूसरे किरदारों को भी थोड़ा और एक्सप्लोर किया जाना था. शशांक और रोशनी की असुरक्षा की वजह पर थोड़ा और फोकस किया जाना था. कब से वह खुद को कमतर समझने लगे.क्या अतीत में ऐसा हुआ था। रोमांटिक फिल्मों में गीत संगीत सबसे अहम होता है.फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह यहां भी मामला कमजोर रह गया है
सिद्धांत और मृणाल ने किरदार को बखूबी है निभाया
अभिनय की बात करें तो सिद्धांत चतुर्वेदी और मृणाल ठाकुर ने अपने किरदार के साथ न्याय किया है. अपने -अपने किरदार से जुड़ी असुरक्षा को उन्होंने परदे पर बखूबी जिया है.उनकी जोड़ी परदे पर फ्रेश लगी है.आयशा रजा और इला अरुण ने अपनी भूमिका से फिल्म एक अलग ही रंग भरा है.इला अरुण अपने संवाद से हंसाने में कामयाब रही है.बाकी के किरदार भी अपनी अपनी भूमिका के साथ न्याय करते हैं। —
