Ikkis Review: परमवीर चक्र विजेता की कहानी में चमके अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र बने भावनाओं की आत्मा, पढ़ें पूरा रिव्यू

Ikkis Review: श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी फिल्म इक्कीस आज, 1 जनवरी को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है. अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत की दमदार अदाकारी से सजी यह फिल्म युद्ध के बीच पनपती इंसानियत की एक संवेदनशील और प्रभावशाली कहानी पेश करती है. पढ़ें पूरा रिव्यू.

निर्देशक: श्रीराम राघवन
कलाकार: अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
अवधि: 143 मिनट
रेटिंग: 4   

Ikkis Review: श्रीराम राघवन के निर्देशन में बनी इक्कीस कोई पारंपरिक वॉर फिल्म नहीं है, बल्कि यह युद्ध के शोर के पीछे छिपी खामोश भावनाओं को टटोलती एक संवेदनशील सिनेमाई रचना है। यह फिल्म भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन से प्रेरित है, लेकिन इसे केवल वीरता का प्रदर्शन बनाकर पेश नहीं किया गया। फिल्म का मूल स्वर आत्मचिंतन, स्मृति और बलिदान की मानवीय कीमत को समझने की कोशिश करता है।

फिल्म की कहानी दो समय-रेखाओं में चलती है। पहली हमें 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान बसंतर की लड़ाई में ले जाती है, जहां मात्र 21 वर्षीय अरुण खेत्रपाल दुश्मन के बारूदी सुरंगों से भरे इलाके में अपने टैंक रेजिमेंट का नेतृत्व करते हैं। ये युद्ध दृश्य भव्य होने के बजाय यथार्थवादी हैं। यहां कैमरा गोलियों से ज़्यादा उस मानसिक दबाव पर टिकता है, जो एक युवा अधिकारी अपने देश की रक्षा करते हुए झेलता है। युद्ध यहां रोमांच नहीं, बल्कि भय, भ्रम और जिम्मेदारी का बोझ बनकर सामने आता है।

अरुण खेत्रपाल के किरदार में अगस्त्य नंदा एक ईमानदार और आत्मविश्वासी कलाकार के तौर पर उभर कर आते है । उनका किरदार अरुण कोई फिल्मी सुपरहीरो नहीं, बल्कि एक ऐसा नौजवान है जो अपने कर्तव्य को पूरी सच्चाई से निभाना चाहता है। उनके फैसले, खासकर जलते टैंक को छोड़ने से इनकार करना, किसी नाटकीय संवाद की वजह से नहीं बल्कि उनके किरदार  की स्वाभाविक प्रवृत्ति के रूप में सामने आता है। अगस्त्य इस भूमिका में नई ऊर्जा और सच्चाई लेकर आते हैं, जो अरुण खेतरपाल के बलिदान को वास्तविक बनाती है।

फिल्म का दूसरा हिस्सा 2001 में घटित होता है, जो इसकी भावनात्मक रीढ़ है। यहां धर्मेंद्र अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल के रूप में  नजर आते हैं। उम्र और अनुभव से भरा उनका चेहरा संवादों से अधिक खामोशी में बोलता है। वहीं, जयदीप अहलावत द्वारा निभाया गया  ब्रिगेडियर नासिर का किरदार   युद्ध के दूसरे छोर की संवेदनशीलता को सामने लाता है। दोनों अनुभवी सैनिकों के बीच होने वाली मुलाकातें फिल्म को एक नई ऊंचाई पर ले जाती हैं, जहां दुश्मनी नहीं, बल्कि एक पीड़ा और इंसानियत का भाव हावी है।

धर्मेंद्र का अभिनय बेहद संयमित और प्रभावशाली है। बिना भारी संवादों के वे पिता का गर्व, दुख और अधूरापन दर्शा देते हैं। जयदीप अहलावत अपने किरदार में गंभीरता और आत्ममंथन का ऐसा संतुलन लाते हैं, जो फिल्म को राजनीति से ऊपर उठाकर इंसानियत की बात करने की ताकत देता है।

तकनीकी स्तर पर फिल्म सधी हुई है। वीएफएक्स का इस्तेमाल सीमित लेकिन प्रभावी है, जिससे टैंक युद्ध के दृश्य वास्तविक और डरावने लगते हैं। बैकग्राउंड स्कोर भावनाओं को उभारता है, लेकिन कभी उन पर हावी नहीं होता। संवाद भी इसी सादगी को अपनाते हैं—कम शब्दों में गहरी बात कहने की कोशिश।

इक्कीस एक ऐसी फिल्म है जो युद्ध को ग्लोरिफाई  नहीं करती, बल्कि उसके बाद बची हुई भावनाओं को सम्मान देती है। यह फिल्म याद दिलाती है कि असली बहादुरी केवल लड़ाई जीतने में नहीं, बल्कि मानवता को बचाए रखने में है।

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By Sheetal choubey

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मूल रूप से बिहार के बक्सर की रहने वाली शीतल की शुरुआती पढ़ाई कानपुर (उत्तर प्रदेश) में हुई. इसके बाद उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन किया.

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