Mehdi Hasan: जब मेहदी हसन ने बाजरे की रोटी खाने के लिये…..

महान गजल गायक मेहदी हसन राजस्थान के एक छोटे से गांव लूणा के रहने वाले थे. एक बार उनके सम्मान में जिला प्रशासन ने भव्य रात्रिभोज का आयोजन किया था, लेकिन उन्होंने उसे छोड़कर बाजरे की रोटी और चटनी खाया था.


Mehdi Hasan:1947 में भारत के विभाजन ने लोगों के मन में गहरे जख्म छोड़े. सैकड़ों लोगों को अपनी जन्मभूमि छोड़ना पड़ा. उन्हीं लोगों में से महान गजल गायक मेहदी हसन थे.

महान गजल गायक मेहदी हसन का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले में कायमखानी मुस्लिम समुदाय के एक छोटे से धूल भरे गांव लूणा में हुआ था. जब भारत का विभाजन हुआ, तो उस समय 20 वर्षीय मेहदी हसन पाकिस्तान चले गये. संगीत की आरंभिक शिक्षा उन्होंने अपने पिता उस्ताद अजीम खान और चाचा उस्ताद इस्माइल खान से ली थी.

संगीत को लेकर जुनून कभी नहीं हुआ कम.

दोनों ही ध्रुपद के अच्छे जानकार थे. भारत-पाक बंटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान चला गया. वहां उन्होंने कुछ दिनों तक एक साइकिल दुकान में काम की और बाद में मोटर मैकेनिक का भी काम किया. हालांकि संगीत को लेकर जो जुनून उनके मन में था, वह कभी कम नहीं हुआ. लेखक अनिल माहेश्वरी ने अपनी किताब “कंपल्सिव नोज-पिकिंग एंड अदर ट्रू टेल्स” में लिखा है कि मेहदी हसन 1980 में राजकीय अतिथि के रूप में भारत आए थे और उनके कार्यक्रम के तहत उन्हें पैतृक गांव लूणा में कुछ दिन बिताना भी था. लूणा की आबादी लगभग 1,500 की थी. गांव वाले भी उनके आगमन को लेकर बेसब्री से इंतजार कर रहे थे.


जब रेत के टीलों पर लोटने लगे मेहंदी हसन


मेहदी हसन जब गांव जा रहे थे, तो  लूणा के टीलों के बीच उन्होंने गांव के किनारे एक छोटा सा मंदिर देखा. उन्होंने अपनी कार रुकवाई और कार से बाहर निकलकर एक बच्चे की तरह रेत पर लोटने लगे. उनकी आंखों में आंसू आ गए. वे टीलों की भूमि पर लेटकर काफी खुश थे. गजल उस्ताद पुरानी यादों में खो गए थे और खुशी और गम का एक अनोखा मिश्रण उनके चेहरे पर दिख रहा था. उनको देखकर उनका बेटा हैरान था. हैरान होते बेटे की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, बेटा, यह मेरी भूमि है. यहीं पर मैं रेत के टीलों के बीच लोटता था.अपने गांव के दोस्तों संग कुश्ती खेलता था और यहीं पर संगीत पहली बार मेरे पास आया.


भव्य रात्रि भोज को छोड़कर बाजरे की रोटी और चटनी खाया


गजल उस्ताद के शब्दों को याद करते हुए लेखक ने लिखा है कि मेहदी हसन के सम्मान में जिला प्रशासन ने एक भव्य रात्रिभोज का आयोजन किया था, जिसमें संगीतकार ने भाग नहीं लिया. इस यात्रा को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार ईश मधु तलवार ने उन्हें अपने चचेरे भाई के घर में मिट्टी के फर्श पर क्रॉस-लेग्ड बैठे हुए पाया, जहां वे ताजी पके हुए बाजरे की रोटियां और घर की बनी चटनी का आनंद ले रहे थे. हालांकि मेहदी हसन को राज्य अतिथि गृह में रहने की सुविधा दी गई थी, लेकिन उन्होंने टीलों पर एक खाट पर लेटना पसंद किया. राष्ट्रपति के पूर्व प्रेस सचिव अशोक मलिक ने पुस्तक की प्रस्तावना में उल्लेख किया है कि माहेश्वरी ने लोगों के जीवन से कई किस्से सामने लाए हैं और कई ऐसी चीजों की जानकारी दी है, जिसे पढ़ने की जिज्ञासा और अधिक प्रबल होती है.


पारिवारिक संगीत की विरासत है लूणा


लूणा के साथ उनका जुड़ाव उनके परिवार की संगीत विरासत से था, जो इस गांव में 15 पीढ़ियों से चली आ रही है. विभाजन ने भले ही उन्हें अलग कर दिया था, लेकिन गांव के प्रति उनकी ललक कम नहीं हुई. गायकी के लिये दुनिया भर में कई सम्मान मिले. हजारों गजलें उन्होंने गाई. जिनके हजारों अलबम दुनिया के अलग-अलग देशों में जारी हुए. मेहदी आज भी अपने बचपन के गांव में जीवित हैं. जहां संगीत, हवा-पानी और वहां के वातावरण के रग-रग में उनकी गजलों की तरह बसता है. जिसमें रेगिस्तान की रेत की खुशबू, सुरों की मिठास और कविता की नवीनता का मिश्रण है.

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By Anjani Kumar Singh

Anjani Kumar Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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