समरसता का संदेश देती फिल्म कंजक, जो क्लाइमेक्स में स्तब्ध कर देती है

Kanjak Movie Review: नवरात्रि, कन्या पूजा और एक ऐसा अंत जो भीतर तक हिला दे. ‘कंजक’ सिर्फ फिल्म नहीं, समाज से सीधा संवाद है. प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी की कहानी पर बनी यह फिल्म सिर्फ एक सिनेमा नहीं, बल्कि दिल को झकझोर देने वाला अनुभव है.

Kanjak Movie Review: सामाजिक सद्भाव, संवेदना और सौहार्द पर बनी कहानियां हर दौर में दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही हैं, खासकर जब उनका अंत सोचने पर मजबूर कर दे. प्रख्यात साहित्यकार सच्चिदानंद जोशी की कहानी ‘कंजक’ पर आधारित निर्देशक राहुल यादव की इसी नाम से बनी फिल्म भी ऐसी ही प्रभावशाली कड़ी है.

यह फिल्म न सिर्फ धार्मिक आस्था और सामाजिक व्यवहार के द्वंद्व को सामने लाती है, बल्कि दर्शक को अंत तक बांधे रखती है.

साहित्य से सिनेमा तक का इमोशनल सफर

फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया से सिनेमा का ककहरा सीखने वाले राहुल यादव दर्जनों डॉक्यूमेंट्री, शॉर्ट फिल्में और विज्ञापन फिल्में बना चुके हैं. किसी साहित्यिक कहानी पर यह उनकी पहली फिल्म है. लेखक शब्दों के जरिए जो चित्र उकेरता है, उसे निर्देशक भिन्न-भिन्न वर्ग और उम्र के दर्शकों के हिसाब से अपने मस्तिष्क में आकार देता है और फिर कैमरे की आंख से परदे पर इस तरह उतारता है, लेखक ने जो शब्दों से कहा है.

निर्देशक ने उसे ज्यों का त्यों परदे पर उकेर दिया है, ‘कंजक’ में ये खूबियां बखूबी नजर आती हैं. निर्देशक राहुल यादव कहते हैं, “फिल्मांकन के लिए जोशी जी की कहानी में कुछ बदलाव किए लेकिन यह ध्यान रखा कि मूल आत्मा पर कोई असर न पड़े.

इस बात से स्वयं सच्चिदानंद जोशी भी संतुष्ट नजर आते हैं, जो इस फिल्म में अभिनय करते भी दिखते हैं. श्री जोशी एक उत्कृष्ट लेखक के साथ-साथ उम्दा अभिनेता भी हैं. युवा दिनों में “मृत्युंजय” नाटक में दुर्योधन की भूमिका में उनके अभिनय को नाट्य प्रेमी आज भी याद करते हैं.

‘कंजक’ की कहानी नवरात्रि के दौरान कन्या पूजा के इर्द-गिर्द बुनी गई है, लेकिन इसका दायरा इससे कहीं बड़ा है. यह साधारण घरेलू माहौल से निकलकर सामाजिक पाखंड, धार्मिक आस्था और मानवीय संवेदनाओं पर तीखा सवाल खड़ा करती है. सच्चिदानंद जोशी की लेखनी की खासियत रही है कि वे दैनिक जीवन की सामान्य घटनाओं में छिपी असाधारण भावनाओं को उजागर करते हैं. फिल्म इस गुण को पूरी मजबूती से आगे बढ़ाती है.

कैमरे की आंख से उभरती घुटन

फिल्म का अधिकांश हिस्सा एक छोटे से कमरे और रसोई में फिल्माया गया है, लेकिन यही सीमित स्पेस इसकी ताकत बन जाता है. कैमरा वर्क ऐसा है कि दर्शक खुद को उसी घर में मौजूद महसूस करता है. शुरुआती दृश्य में प्रेशर कूकर के जरिए समाज की घुटन को जिस प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया गया है, वह फिल्म की थीम को शुरुआती मिनटों में ही स्पष्ट कर देता है.

सच्चिदानंद जोशी और उनकी पत्नी मालविका जोशी का अभिनय बेहद स्वाभाविक है. पति का आध्यात्मिक विरक्त स्वभाव और पत्नी की दुनियादारी से भरी उलझनें दोनों के बीच गहरा विरोधाभास रचती हैं. यही टकराव फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है. सवलीन कौर का किरदार, खासकर क्लाइमेक्स में, दर्शकों को स्तब्ध कर देता है. निर्देशक राहुल की तारीफ करनी होगी कि बगैर किसी भूमिका के फिल्म पात्रों और दर्शकों के साथ आत्मीय रिश्ता बना लेती है.

क्लाइमेक्स जो लंबे समय तक पीछा करता है

‘कंजक’ का क्लाइमेक्स ऐसा है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शक के भीतर चलता रहता है. वह दर्शक के मस्तिष्क में एक अंतहीन हलचल और कोलाहल छोड़ जाता है.

यह वही प्रभाव है, जो कभी ओ हेनरी की कहानियों में दिखता था—साधारण कथा, लेकिन असाधारण अंत. उम्दा संपादन, सटीक साउंड डिजाइन और मजबूत पटकथा इस फिल्म को एक यादगार अनुभव बना देते हैं.

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लेखक के बारे में

By Pratyush Prashant

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.

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