भारत में समय-समय पर ऐसे मुद्दे सामने आते हैं, जिनका असर सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं रहता बल्कि पूरे लोकतंत्र पर पड़ता है. ऐसा ही एक विषय है परिसीमन. साल 2026 में यह मुद्दा फिर चर्चा में है. संसद के मानसून सत्र के दौरान परिसीमन को लेकर लगातार बहस हो रही है.
ऐसे में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों और सामान्य पाठकों के लिए यह जानना जरूरी है कि परिसीमन क्या होता है, इसका उद्देश्य क्या है और इससे देश की चुनावी व्यवस्था पर क्या असर पड़ता है.
What is Delimitation: क्या होता है परिसीमन?
परिसीमन यानी निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय करने की प्रक्रिया. अंग्रेजी में इसे Delimitation कहा जाता है. जब किसी राज्य या आसान भाषा में समझें तो परिसीमन का मतलब है चुनावी क्षेत्रों का नया बंटवारा. जब किसी इलाके की आबादी बढ़ जाती है या कम हो जाती है, तो वहां की चुनावी सीमाओं में बदलाव किया जाता है.
Why Delimitation Needed: संविधान में कहां है परिसीमन का प्रावधान?
भारत के संविधान के अनुच्छेद 81 और अनुच्छेद 82 में परिसीमन का प्रावधान किया गया है. इसके अलावा परिसीमन आयोग अधिनियम (Delimitation Commission Act) के तहत परिसीमन आयोग का गठन किया जाता है.
आखिर परिसीमन की जरूरत क्यों पड़ती है?
देश की आबादी लगातार बदलती रहती है. कहीं तेजी से शहरीकरण होता है, कहीं लोग रोजगार के लिए पलायन करते हैं, तो कहीं आबादी बहुत तेजी से बढ़ जाती है. ऐसे में कई निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा हो जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम रहती है. इसी असंतुलन को दूर करने के लिए परिसीमन किया जाता है. इसके तीन बड़े उद्देश्य होते हैं-
- हर सांसद और विधायक लगभग बराबर आबादी का प्रतिनिधित्व करे.
- बढ़ती या घटती आबादी के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाएं.
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण नई जनसंख्या के अनुसार किया जाए.
भारत में अब तक कितनी बार हुआ परिसीमन?
अब तक कब-कब हुआ परिसीमन (इतिहास) आजादी के बाद अब तक चार बार परिसीमन आयोग बना. आजादी के बाद अब तक चार बार परिसीमन आयोग बना: 1952, 1963, 1973 और 2002.
1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने लोकसभा सीटों की संख्या 2000 तक फ्रीज कर दी थी. 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इस फ्रीज को आगे बढ़ाकर 2026 तक कर दिया.
परिसीमन पर पूरी रिपोर्ट
परिसीमन का क्या असर हो सकता है?
अगर भविष्य में जनसंख्या के आधार पर परिसीमन होता है, तो जिन राज्यों की आबादी अधिक बढ़ी है, वहां लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ सकती है. दूसरी ओर जिन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अपेक्षाकृत कम रही है, वहां सीटों की संख्या में कम बदलाव हो सकता है. हालांकि अंतिम फैसला परिसीमन आयोग की सिफारिशों और संसद द्वारा किए जाने वाले कानूनी प्रावधानों पर निर्भर करेगा.
प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण तथ्य-
- परिसीमन का अंग्रेजी नाम Delimitation है.
- संविधान के अनुच्छेद 81 और 82 इससे जुड़े हैं.
- परिसीमन आयोग का गठन राष्ट्रपति करते हैं.
- आयोग के निर्णय सामान्य तौर पर अदालत में चुनौती नहीं दिए जा सकते.
- आजादी के बाद अब तक चार बार परिसीमन आयोग का गठन हुआ है.
- वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग बनाए गए.
- 1976 और 2002 में लोकसभा सीटों की संख्या को निश्चित अवधि तक स्थिर रखने का निर्णय लिया गया.
- परिसीमन का उद्देश्य समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है.
परिसीमन को प्वाइंट्स में समझें
| बिंदु | जानकारी |
| मौजूदा लोकसभा सीटें | 543 |
| प्रस्तावित अधिकतम लोकसभा सीटें | 850 |
| राज्यों के लिए प्रस्तावित सीटें | 815 |
| केंद्र शासित प्रदेशों के लिए प्रस्तावित सीटें | 35 |
| परिसीमन का प्रस्तावित आधार | 2011 की जनगणना |
| संबंधित संविधान संशोधन विधेयक | 131वां संविधान संशोधन विधेयक |
| महिला आरक्षण से संबंधित संशोधन | 106वां संविधान संशोधन (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) |
| महिलाओं के लिए प्रस्तावित आरक्षण | 33% |
| अब तक परिसीमन आयोग का गठन | 1952, 1963, 1973 और 2002 |
| अप्रैल 2026 सत्र में विधेयक पारित करने के लिए आवश्यक वोट | 352 |
| परिसीमन से जुड़े संवैधानिक अनुच्छेद | अनुच्छेद 81 और अनुच्छेद 82 |
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