गृह मंत्री अमित शाह ने 13 सितंबर 2026 को मुंबई में एक बयान दिया. "2029 के लोकसभा चुनाव से पहले NDA शासित सभी 21 राज्यों में UCC लागू किया जाएगा." अब इस बयान की सबसे ज्यादा चर्चा बिहार में हो रही है. सवाल कई हैं, जैसे अलग-अलग धर्मों के पर्सनल लॉ में क्या बदलेगा? क्या मुस्लिमों के लिए एक से ज्यादा शादी का प्रावधान खत्म हो जाएगा? क्या निकाह के मौजूदा नियम बदल जाएंगे? आइए Knowledge Adda की इस कड़ी में इन सवालों के जवाब जानते हैं.
नेताओं के बयानों की बौछार
गृह मंत्री अमित शाह के बयान के बाद बिहार में सत्ताधारी दल के कई बड़े नेता मैदान में उतर आए. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का कहना है कि आजादी के बाद ही यह कानून लागू हो जाना चाहिए था. उनके मुताबिक कांग्रेस ने तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से इसे लागू नहीं होने दिया.
असली ट्विस्ट तो नीतीश कुमार की पार्टी JDU से आया. पार्टी नेता श्याम रजक ने साफ कहा:
"इस मुद्दे पर हमारा रुख हमारे नेता ने बहुत पहले ही स्पष्ट कर दिया था. भले ही हमारी पार्टी संसद में UCC विधेयक का समर्थन कर रही है, लेकिन वह बिहार में इसे लागू करने के पक्ष में नहीं है."
गृह मंत्री अमित शाह ने क्या कहा?
पत्रकारों ने पूछा कि नीतीश कुमार के राजनीति से संन्यास लेने और BJP नेता सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद क्या JDU का रुख मायने रखता है. रजक ने जवाब दिया:
"मुख्यमंत्री भले ही BJP के हों, लेकिन सरकार सहयोगियों की मदद से चलाई जा रही है... हमारा रुख स्पष्ट है, बिहार में UCC लागू करने का सवाल ही नहीं उठता."
UCC आखिर है क्या?
विराग गुप्ता बताते हैं कि देश में मोटे तौर पर दो तरह के कानून हैं, सिविल और क्रिमिनल. UCC एक तरह का सिविल लॉ है. सिविल लॉ का ताल्लुक शादी, प्रॉपर्टी, तलाक और मानहानि जैसे मामलों से होता है. इन कानूनों में परंपरा, रीति-रिवाज और संस्कृति की खास भूमिका होती है. साथ ही सजा से ज्यादा जोर समझौते और सेटलमेंट पर रहता है.
वहीं हत्या, मारपीट और अपहरण जैसे मामले क्रिमिनल लॉ के तहत आते हैं. क्रिमिनल लॉ देश में सभी धर्मों और समुदायों के लिए एक समान है. दिक्कत सिविल लॉ में है, जो अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग है. इन्हें ही पर्सनल लॉ कहा जाता है.
पर्सनल लॉ का पिटारा
अगर बिहार में UCC लागू होता है तो मुस्लिम, हिंदू और ईसाई सबके लिए शादी और संपत्ति से जुड़े मामलों में एक समान कानून होगा. पूरे बवाल की असली जड़ यही है. अल्पसंख्यकों को डर है कि उनके सामाजिक और सांस्कृतिक नियम यानी पर्सनल लॉ खत्म हो जाएंगे.
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अनुच्छेद 44 से शाहबानो तक
अनुच्छेद 44 क्या कहता है: संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा. यह नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है. यह कोई मौलिक अधिकार नहीं, बल्कि राज्य के लिए एक संवैधानिक दिशा-निर्देश है. विराग गुप्ता पूछते हैं कि जब यह प्रावधान संविधान में मौजूद है, तो आजादी के इतने दशकों बाद भी केंद्रीय स्तर पर कानून क्यों नहीं बना.
अंग्रेजों के दौर की चर्चा: ब्रिटिश शासन में भी अलग-अलग क्षेत्रों और समुदायों के कानूनों में एकरूपता और संहिताकरण पर चर्चा हुई थी. 1840 के दौर में कानूनों को व्यवस्थित करने की अहम पहल हुई, लेकिन उस समय कोई समान सिविल कोड लागू नहीं किया गया.
शाहबानो केस: 1985 के मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 44 का उल्लेख करते हुए कहा था कि यह लंबे समय से प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाया है. लेकिन यहां एक कानूनी अंतर समझना जरूरी है. बाद के एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पहले के फैसलों में अदालत ने सरकार को UCC लागू करने का बाध्यकारी आदेश नहीं दिया था. वे सिर्फ टिप्पणियां और सुझाव थे.
राज्यों की पहल बनाम राष्ट्रीय ढांचा: विराग गुप्ता यह भी पूछते हैं कि जब अलग-अलग राज्य अपने स्तर पर UCC जैसे कानूनों की दिशा में कदम उठा रहे हैं, तो राष्ट्रीय स्तर पर एक समान ढांचा क्यों नहीं बना.
अपवादों की भूलभुलैया: भारत जैसे विविधता वाले देश में UCC बनाते समय अलग-अलग समुदायों, क्षेत्रों और संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े अपवादों का सवाल उठेगा. उनके मुताबिक अगर कानून में बहुत ज्यादा अपवाद रखे गए, तो समान नागरिक संहिता का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है. इसलिए UCC सिर्फ कानून बनाने का विषय नहीं है. इसके लिए व्यापक संवैधानिक, सामाजिक और कानूनी विमर्श की जरूरत होगी.
बिहार की आबादी और वोट का गणित
बिहार में 17 फीसद से ज्यादा मुस्लिम आबादी है. इसके अलावा 0.08 फीसद बौद्ध, 0.05 फीसद ईसाई और 0.01 फीसद सिख धर्म के लोग रहते हैं. JDU को अल्पसंख्यकों के एक बड़े तबके का वोट मिलता रहा है. यही वजह है कि पार्टी इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रख रही है.
अनुच्छेद 25 vs शरिया: मुस्लिम पक्ष की चिंता
मुस्लिम समुदाय के लोग UCC का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 25 सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है. उनका कहना है कि शादी-ब्याह और परंपराओं जैसे मामलों में सब पर समान कानून थोपना संविधान के खिलाफ है.
मुस्लिम जानकारों के मुताबिक शरिया कानून 1400 साल पुराना है और कुरान तथा पैगम्बर मोहम्मद साहब की शिक्षाओं पर आधारित है. इसलिए यह उनकी आस्था का विषय है. उनकी चिंता है कि 1947 के बाद मिली धार्मिक आजादी को धीरे-धीरे छीनने की कोशिश हो रही है.
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