Success Story: कहते हैं अगर हौसला हो तो मुश्किल-से-मुश्किल चीज हासिल की जा सकती है. कुछ ऐसी ही कहानी बेंगलुरु के रहने वाले साई कौस्तुव दासगुप्ता (Sai Kaustuv Dasgupta) की है, जो व्हीलचेयर पर तो हैं. लेकिन उनकी पहचान इससे कई बड़ी है. देश-विदेश में लोग उन्हें जानते हैं. खुद जिंदगी में बहुत सारी तकलिफयों का सामना करने वाले साई आज लोगों को खुश रहने का तरीका बता रहे हैं. वो कहते हैं कि ज्यादातर लोग सोचते हैं कि वो दिव्यांग की सेवा करें, लेकिन मैंने सोचा कि क्यों न मैं ही देश की सेवा करूं. ग्लोबल स्पीकर, ग्राफिक्स डिजाइनर, हैप्पीनेस कोच और दिव्यांग इंफ्लूएंसर हैं. डिग्री की बात करें तो उनके बास MBA की डिग्री है. जीवन जब व्हीलचेयर पर शुरू हुआ उससे पहले वे डांस और म्यूजिक की दुनिया में भी खूब तारीफें बटोर चुके हैं. उन्हें लोग व्हीलचेयर (Wheelchair Warrior) वारियर नाम से जानते हैं.
डॉक्टर ने बताया गंभीर बीमारी और हुआ गलत इलाज
साई का जन्म पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी (Siliguri) में हुआ था. बचपन से ही उनकी हड्डियां कमजोर थीं. 1991 में जब उन्होंने कलकत्ता में इलाज कराया डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें Brittle Bone Disease है. डॉक्टरों की नासमझी और गलत इलाज ने साई का पूरा जीवन खराब कर दिया. एक गलत इलाज ने साई का पूरा जीवन खराब कर दिया. उन्हें डर और निराशा के घेरे में जीना पड़ा. पिता कौशिक जोकि एक फोटो जर्नलिस्ट हैं और मां डॉ शिला क्लासिकल सिंगर और न्यूमरोलॉजिस्ट हैं, दोनों ने साई के स्वास्थ्य और उनकी खुशियों को प्राथमिकता दी.
म्यूजिक की दुनिया में जीता अवार्ड
माता-पिता के गुण साई में भी आए हैं और उन्हें हमेशा से कला जगत से प्रेम रहा. उन्हें डांस करना पसंद था. वे बचपन में डांस किया करते थे. उन्होंने कई स्टेज परफॉर्मेंस भी दी है. हालांकि, हड्डियां कमजोर रहने के कारण उन्हें डॉक्टरों ने डांस से दूरी बनाने की सलाह दी. फिर जाकर उन्होंने म्यूजिक में एंट्री ली.
मन्ना डे, रशीद खान साहब, अनुराधा पोडिवाल, जैसे बड़े कलाकारों के साथ मंच शेयर करने से लेकर पश्चिम बंगाल के श्रेष्ठ बाल संगीतकार के रूप में Dishari Award जीतने तक, म्यूजिक में साई का करियर ग्राफ ऊपर जा रहा था. उनका सपना था रियालिटी शो में जाने का. लेकिन उस वक्त उनकी शारीरिक परिस्थिति इतनी सही नहीं था और दिव्यांग लोगों के लिए मौकों की कमी थी.
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बाथरूम में गिरने का वो हादसा, जिसने पूरी जिंदगी ही बदल दी
फिर एक दिन साई के जीवन में ऐसा पल आया, जिससे उनका जीवन थम गया. बाथरूम में गिरने से साई के दोनों पैरों की हड्डियां टूट गईं. आनन-फानन में उनका इलाज कराया गया. अस्पताल वालों ने जिस पोस्चर में साई बैठे थे, उसी में पैरों पर प्लास्टर चढ़ा दिया. इस हादसे ने उन्हें व्हीलचेयर पर ला दिया. उस पल को याद करते हुए साई आज भी ट्रॉमा से भर जाते हैं.
दवाइयों से नहीं छूटा पीछा
साई की एक समस्या दिव्यांगता थी तो दूसरी गलत दवाइयां. हड्डियों के कमजोर होने और हमेशा से गलत ट्रीटमेंट चलने के कारण उन्हें कई सारे साइड इफैक्ट्स झेलने पड़ते थे. स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उनके माता-पिता उन्हें नॉर्थ, साउथ से लेकर ईस्ट वेस्ट के हर जगह, हर अस्पताल ले गए. उनके माता-पिता चाहते थे कि वो बस किसी तरह ठीक हो जाएं. हालांकि, ये संभव नहीं था. फिर भी एक आखिरी उम्मीद से माता-पिता ने साई को साउथ के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल ले गए.
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साई की पढ़ाई-लिखाई पर एक नजर
| शिक्षा | संस्थान |
| स्कूली शिक्षा | श्री साई बालाजी जूनियर कॉलेज |
| बैचलर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (BBA) | छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय, कानपुर |
| मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (MBA) | जैन (डीम्ड-टू-बी यूनिवर्सिटी), बेंगलुरु |
| मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) | वर्ल्ड रिकॉर्ड यूनिवर्सिटी, लंदन |
दिव्यांग लोगों की समस्या को लेकर क्या है साई दासगुप्ता का कहना?
साई ने प्रभात खबर से बातचीत में अपना अनुभव शेयर करते हुए कहा कि परिवार भी अक्सर दिव्यांग बच्चों को इस तरह का सपोर्ट नहीं दे पाते हैं. दिव्यांग लोगों को लेकर सभी की माइंडसेट ही अलग होती है. रिसर्च और अपने अनुभव को देखते हुए साई का मानना है कि अभी तक भारत में दिव्यांग लोगों को लेकर बहुत कम ही बदलाव हुआ है.
उन्होंने कहा कि कॉलेज, स्कूल, बैंक, पब्लिक संस्था आदि बहुत सारे जगहों पर आज भी दिव्यांग लोगों के लिए सुविधाएं नहीं हैं. मैं तो करीब-करीब भारत के सभी बड़े शहरों में गया हूं. साउथ में थोड़ी अवेयरनेस ज्यादा है पर नॉर्थ में अभी भी बहुत काम बाकी है.
उन्होंने कहा कि भारत में दिव्यांग (यहां व्हीलचेयर पर बैठे लोगों की बात की जा रही है) लोगों के साथ सबसे बड़ी समस्या ये है कि वो ट्रेन और बस से अच्छे से सफर नहीं कर सकते हैं क्यूंकि कोई भी साधन सुगम्य नहीं हैं. हवाई जहाज में सफर की बात तो छोड़ ही दें. ऐसे में अगर कोई दिव्यांग पढ़ना या काम करना चाहें तो उनके आगे कई सारी मुश्किलें आती हैं. मैं खुशनशीब था.
माता-पिता और भाई का बहुत बड़ा सपोर्ट: साई दासगुप्ता
साई ने बताया कि माता पिता और छोटा भाई कुशल उनके जीवन का तीन पहलु है, जिसके सहारे आज वो इस मुकाम पर आए हैं. एक बार तो मम्मी-पापा ने घर में मेरे रूम में पटाखे जलाए दिवाली के अवसर में ताकि मैं खुश हो जाऊं, ताकि मुझे दिवाली का सेलेब्रेशन अधूरा न लगे. परिवार साथ थे बोलकर साई कठिन परिस्थितयों से लड़ पाए, और आज भी लड़ रहे है.
एक वक्त ऐसा आया जब सब कुछ छूटने लगा
2009 आते-आते साई की हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई. वो पूरी तरह से बिस्तर पर आ गए. पढ़ाई के साथ-साथ म्यूजिक भी छूट गया. वो पूरी तरह से डिप्रेशन में चले गए. उन्हें लगने लगा कि उनसे सब छूट रहा है. वो अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पा रहे हैं. कोई एक्टिविटी नहीं हो पा रही है. हर सेलेब्रेशन छूट रहा है. माता -पिता पर हर काम के लिए निर्भर हो गए हैं. वो इस जिंदगी से परेशान हो गए. तंग आकर कई बार सोचा करते थे कि भगवान ने उन्हें ऐसा जीवन क्यों दिया.
फ्रेंड ने दी जीने की हिम्मत और बदल गई किस्मत
2011-2012 में एक फ्रेंड आया और उसने साई से को कंप्यूटर सिखने की सलाह दी. दोस्त ने मोटिवेट किया कि अगर तुमने ये कर लिया तो समाज के लिए एक मैसेज सेट होगा. साई ने भी सोचा जब लाइफ जब व्हीलचेयर में गुजारनी है तो गम में क्यों बीताऊं, क्यों नहीं खुशी में जिया जाए. इसी सोच के साथ उन्होंने कंप्यूटर सिखना शुरू किया.
दिव्यांग होने के कारण मिली अधूरी शिक्षा
शुरुआत बेसिक से हुई, जिसमें उन्हें एक साल लग गए. वे रोज 4-5 घंटे कंप्यूटर चलाते थे. फिर उन्होंने डिप्लोमा कोर्स किया, फिर ग्राफिक डिजाइनर सीखना शुरू किया. एक ट्यूशन टीचर आते थे जो साई को सिखाते थे. लेकिन उन्होंने सिर्फ बेसिक सिखाया. उन्हें लगा दिव्यांग होने के वजह से मैं कुछ कमाल नहीं कर पाऊंगा. साई ने ये सब बस बाएं हाथ की एक उंगली से किया क्योंकि शरीर में बस एक उंगली में ही ताकत बची थी.
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पहली नौकरी मिली तो बढ़ा आत्मविश्वास
ग्राफिक डिजाइनिंग सिखने के बाद साई को Global Radio Center में जॉब मिली. उन्हें उस वक्त बहुत खुशी हुई. साई कहते हैं कि हालांकि सैलरी बहुत कम थी. लेकिन पहली बार मुझे लगा कि मैं भी कुछ कर पाया. एक आत्मविश्वास आया और तब से आजतक मैंने पीछे मुरकर नहीं देखा.
इसके बाद 2015 में साई ने क्सटमाइज व्हीलचेयर लिया. उन्होंने इस सोच के साथ कि कुछ बड़ा करना है, घर से निकलना शुरू किया. स्काइप और Zoom पर मोटिवेशनल क्लासेज देना शुरू कर दिया. अपनी छूटी हुई पढ़ाई पूरी की. बैंगलुरु के जैन यूनिवर्सिटी से MBA किया.
सोशल मीडिया ने घर-घर स्टोरी पहुंचाने में की मदद
उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया ने उनकी काफी मदद की और उनकी स्टोरी घर-घर तक पहुंचाई. इसके बाद उन्होंने लंदन यूनिवर्सिटी से मानद डॉक्टरेट (Honorary Doctorate) की. वे Ted X जैसे प्लेटफॉर्म पर 4 बार जा चुके हैं. उन्होंने दो पेपर पर रिसर्च किया, हैप्पीनेस और Accessibility of Inclusion Of Society.
2023 में मिला नेशनल अवॉर्ड
फ्लोरिडा से हैप्पीनेस का कोर्स करने और सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद साई भारत का पहला दिव्यांग सर्टिफाइड हैप्पीनेस कोच बन गए. दो हजार से ज्यादा मोटिवेशनल स्पीच दिए. 2023 में उन्हें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू(Droupadi Murmu) द्वारा नेशनल अवॉर्ड (श्रेष्ठ दिव्यांगजन) से सम्मानित किया गया. D -30 Disability Impact List जोकि USA द्वारा आयोजित किया जाने वाला कार्यक्रम है, उस लिस्ट में भी नाम आया. UN में भारत की प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला.
साई ने नेशनल अवार्ड को लेकर अपना अनुभव साझा करते हुए कहा कि लोग दिव्यांग लोगों को हमेशा हीन दृष्टि से देखते हैं. लेकिन इस अवार्ड को पाने तक की सफर में, मैंने सिर्फ खुद के लिए रास्ता नहीं बनाया बल्कि समाज को भी संदेश दिया. उन्होंने बताया कि जब उन्हें नेशनल अवॉर्ड लेने के लिए दिल्ली जाना था तो उन्होंने स्पेशल कार से 5 दिन ट्रैवल किया. वो कहते हैं कि क्योंकि मैं प्रिविलेज हूं, मेरे पास स्पेशल कार है तो मेरे लिए फिर भी ये आसान बात थी. लेकिन बहुत से लोग ये नहीं कर पाएंगे. दिव्यांग लोगों के लिए भी फ्लाइट में कोई आसान व्यवस्था होनी चाहिए.
समाज में अभी बहुत से बदलाव होना बाकी है: साई दासगुप्ता
विपरीत परिस्थितियों से लड़ते हुए और कई फ्रैक्चर्स का असहनीय दर्द सहते हुए साई ने खुद को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. साई ने न सिर्फ अपनी जिंदगी बनाई बल्कि समाज को भी संदेश दिया. आज वे दिव्यांगजनों और उनके परिवारों के समान अधिकार, सम्मान और अवसरों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं. लंबी इसलिए क्योंकि उनका मानना है कि समाज में अभी बहुत से बदलाव होने बाकी हैं. साई कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज में बदलाव के साथ-साथ सरकार को भी दिव्यांग लोगों के बारे में सोचना चाहिए और ये पूरी तरह से तभी होगा जब मंत्रालय में भी एक दो दिव्यांग नेताओं को जगह मिलेगी.
रुकना नहीं है! दर्द को ताकत बनाकर बने ‘व्हीलचेयर योद्धा
साई कहते हैं कि थमना नहीं है, रुकना नहीं है. मंजिल अभी बहुत दूर है, लेकिन अपने भीतर की शक्ति, विश्वास और हौसले को बनाए रखना है. क्योंकि सच्ची जीत केवल अपनी जिंदगी बदलने में नहीं, बल्कि दूसरों के लिए रास्ते आसान बनाने में है. साई कहते है, हम दिव्यांग हैं, हमें गर्व हैं, हम हैं Limited Edition.
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