15 साल बाद दोबारा खोदी गई भारत खोजने वाले की कब्र, इतिहास की पन्नों में छुपा रहस्य

Indian History Fact: भारत का इतिहास बेहद रोचक है. विश्वभर में भारत के इतिहास की घटनाओं की चर्चा होती है. इसी कड़ी में एक भारतीय इतिहास की एक अनोखी घटना के बारे में यहां जानेंगे. गत मध्यकालीन भारत के इतिहास में एक भाग की भारत की खोज पर है. पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा के जीवन और मृत्यु का एक हिस्सा कई नए पहलुओं को दर्शाता है.

Indian History Fact: भारत की खोज करने वाले वास्को डी गामा का जीवन काफी रोचक और उतार चढ़ाव भरा रहा है. उनके मृत्यु के बाद की एक घटना भारतीय इतिहास (Indian History) के छात्रों के लिए काफी महत्वपूर्ण है. वास्को डी गामा (Vasco Da Gama) तीन बार भारत आया. पहली बार 1498 में, दूसरी बार 1502 में और तीसरी और अंतिम बार 1524 में. उनकी तीसरी यात्रा आखिरी यात्रा थी.

वास्को डी गामा कौन थे?

वास्को डी गामा पुर्तगाल का रहने वाला एक प्रसिद्ध नाविक था. इतिहास में उन्हें भारत का समुद्री रास्ता खोजने वाला पहला यूरोपीय माना जाता है. उस समय भारत पहुंचना बहुत मुश्किल था क्योंकि लोग लंबा और खतरे भरा रास्ता तय करके ही भारत आते थे. वास्को डी गामा ने समुद्री रास्ता अपनाकर यह दूरी आसान बना दी.

Indian History: भारत की खोज का ऐतिहासिक दिन

वास्को डी गामा 20 मई 1498 को भारत के केरल राज्य के कोझीकोड जिले में कालीकट (काप्पड़ गांव) पहुंचा था. यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि यूरोप से भारत तक समुद्री मार्ग से पहुंचना पहली बार संभव हुआ था. इसके बाद पुर्तगाल और भारत के बीच व्यापार और संपर्क का नया दौर शुरू हुआ.

वास्को डी गामा की भारत यात्रा

वास्को डी गामा ने कुल तीन बार भारत की यात्रा की थी. पहली बार केरल में कालीकट पहुंचा, फिर वापस पुर्तगाल लौट गया. दूसरी बार भी भारत आया और व्यापार के कई समझौते किए. तीसरी बार 1524 में वह भारत फिर से आया था, लेकिन इस बार अलग मकसद से- पुर्तगाली साम्राज्य के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ने के लिए.

भारत में दफनाया जाना

तीसरी यात्रा के दौरान ही वास्को डी गामा की 24 मई 1524 को भारत के कोच्चि में मृत्यु हो गई थी. उनके सम्मान में उनकी बॉडी को कोच्चि में ही दफनाया गया था. यह एक खास बात थी क्योंकि विदेशी नाविक को भारत में दफनाने का मौका बहुत कम ही मिलता था.

15 साल बाद कब्र खोली गई

साल 1539 में वास्को डी गामा की कब्र दोबारा खोदी गई और उनके अवशेषों को बाहर निकाला गया. यह खास कदम इसलिए उठाया गया क्योंकि पुर्तगाल ने उनके अवशेषों को अपने देश वापस ले जाना चाहा. उनके अवशेष लिस्बन ले जाकर वहीं दफनाए गए जहां से उन्होंने भारत की यात्रा शुरू की थी.

पुर्तगाल सरकार ने वास्को डी गामा को मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान दिया. आज भी लिस्बन में उनके नाम पर एक स्मारक बना हुआ है, जो उनकी बहादुरी और ऐतिहासिक योगदान की याद दिलाता है. उनका नाम इतिहास में एक महत्वपूर्ण पहचान बन गया है.

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लेखक के बारे में

By Ravi Mallick

रवि मल्लिक पिछले 7 सालों से डिजिटल पत्रकारिता से जुड़े हैं. स्कूली शिक्षा से लेकर नौकरी तक की खबरों पर काम करना पसंद है. युवाओं को बेहतर करियर ऑप्शन, करंट अफेयर्स और नई वैकेंसी के बारे में बताना अच्छा लगता है. बोर्ड परीक्षा हो या UPSC, JEE और NEET एग्जाम टॉपर्स से बात करना और उनकी स्ट्रेटजी के बारे में जानना पसंद है. युवाओं को प्रेरित करने के लिए उनके बीच के मुद्दों को उठाना और सही व सटीक जानकारी देना ही उनकी प्राथमिकता है.

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