Wheelchair पर बीता बचपन फिर भी तय किया IIT का सफर, भावुक कर देगी रिद्धिमा की कहानी

Motivational Success Story: रिद्धिमा पॉल उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की रहने वाली हैं. वे जन्म से ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं. लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी. जी तोड़ मेहनत करके आईआईटी कानपुर में दाखिला लिया.

Motivational Success Story: सामान्य परिस्थितियों में जीने वाले छात्र भी बोर्ड या किसी बड़ी परीक्षा में सफलता हासिल करने से कई बार चूक जाते हैं. लेकिन आज हम एक ऐसी साहसी लड़की की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसने गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी बोर्ड परीक्षा से लेकर अन्य जगहों पर सफलता हासिल की. इस लड़की का नाम है रिद्धिमा पॉल. 

Motivational Success Story: बीमारी को मात देकर की पढ़ाई

रिद्धिमा पॉल उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की रहने वाली हैं. वे जन्म से ही स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हैं. लेकिन इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और पढ़ाई का सफर जारी रखा. उन्होंने इस बीमारी को मात देकर IIT Kanpur में BS in Mathematics and Scientific Computing कोर्स में PWD कोटा के तहत दाखिला हासिल किया है. 

Motivational Success Story: व्हीलचेयर में बीता बचपन 

रिद्धिमा बचपन से व्हीलचेयर पर निर्भर हैं और शुरुआत में उन्हें मुख्यधारा के स्कूलों में दाखिला तक नहीं मिला. लेकिन उन्होंने खूब मेहनत की और 10वीं में 94.8 प्रतिशत और 12वीं में 90.8 प्रतिशत अंक हासिल किया.

IIT Kanpur: आईआईटी कानपुर में लिया दाखिला 

रिद्धिमा पॉल JEE-PwD रैंक में वे सिर्फ एक अंक की कमी से सीधे IIT नहीं पहुंच पाईं. फिर भी उन्होंने IIT-Indore में एक वर्ष का तैयारी कोर्स करके IIT-Kanpur में प्रवेश हासिल किया. उन्होंने आईआईटी में दाखिला लेने के लिए खूब मेहनत की. आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर भी उनकी काफी तारीफ करते हैं. 

एक फिल्म ने बदली जिंदगी 

रिद्धिमा पॉल स्पाइनल मस्कुलर एट्रॉफी (SMA) बीमारी से प्रभावित हैं, जिसके कारण उनके हाथ-पांव और रीढ़ की हड्डी पर गंभीर असर पड़ा है. लेकिन उनकी सोचने-समझने की क्षमता असाधारण है. वो क्लास 8 में थी तब उन्होंने एक फिल्म देखी थी, जिसने उनकी दुनिया बदल दी. उन्होंने ऋतिक रोशन की फिल्म ‘सुपर-30’ देखी और आईआईटी में दाखिला लेने का फैसला लिया. 

सर्जरी के बाद मिली राहत 

रिद्धिमा जब तीन साल की थीं, तब उनके माता-पिता को उनकी बीमारी का पता चले. वर्ष 2022 में बेंगलुरु में डॉक्टरों की एक टीम ने उनकी 10 घंटे की सर्जरी की. इस सर्जरी ने उन्हें जीवनदान दिया. रिद्धिमा की शारीरिक क्षमता बढ़ी. रिद्धिमा को बचपन से ही गणित से खास लगाव था. 

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