Gold Jewellery Making Charges: शादी-ब्याह हो या त्योहार, सोना खरीदना हमेशा खास माना जाता है. लेकिन ज्यादातर लोग सिर्फ सोने का रेट देखकर खरीदारी कर लेते हैं, जबकि असली खेल मेकिंग चार्ज में होता है. यही वजह है कि कई बार अच्छी-खासी रकम खर्च करने के बाद भी बेचते समय नुकसान झेलना पड़ता है.
मेकिंग चार्ज आखिर होता क्या है?
जब कच्चे सोने को गहने की शक्ल दी जाती है, तो उस पर मेहनत, डिजाइनिंग और फिनिशिंग का खर्च लगता है. इसे ही मेकिंग चार्ज कहा जाता है. भारत में यह आमतौर पर सोने की कीमत का 3% से 30% तक हो सकता है. अगर डिजाइन ज्यादा भारी, बारीक या हाथ से बनी हुई है तो यह चार्ज और ज्यादा हो सकता है. ज्वेलर्स इसे दो तरह से जोड़ते हैं. पहला, प्रति ग्राम तय रकम के हिसाब से. दूसरा, सोने की कुल कीमत का एक प्रतिशत लेकर. खास और जटिल डिजाइन वाली ज्वेलरी में अक्सर प्रतिशत वाला तरीका अपनाया जाता है.
बिल में और कौन-कौन से खर्च जुड़ते हैं?
सिर्फ मेकिंग चार्ज ही नहीं, कुछ और लागत भी आपके बिल को बढ़ाती है. डिजाइन की बारीकी के कारण 10% से 25% तक अतिरिक्त लागत जुड़ सकती है. इसके अलावा मेकिंग चार्ज पर 5% GST लगता है. वहीं सोने की कुल कीमत पर अलग से 3% GST देना पड़ता है. कुछ मामलों में 5% से 10% तक वेस्टेज चार्ज भी लिया जाता है. यानी गहना बनाते समय जो सोना प्रोसेस में इस्तेमाल होता है, उसका खर्च भी ग्राहक से वसूला जाता है.
बेचते वक्त पैसा क्यों डूब जाता है?
यहीं सबसे बड़ा झटका लगता है. जब आप ज्वेलरी बेचने जाते हैं तो ज्यादातर ज्वेलर्स सिर्फ सोने के वजन और उस दिन के गोल्ड रेट के हिसाब से पैसा देते हैं. मतलब आपने अगर 1 लाख रुपये की ज्वेलरी खरीदी और उसमें 20 हजार रुपये मेकिंग चार्ज दिए, तो बेचते वक्त यह रकम वापस नहीं मिलती.
नुकसान से कैसे बचें?
अगर कम खर्च में सोना खरीदना है तो मशीन से बनी सिंपल डिजाइन चुनें. खरीदते समय हमेशा आइटमाइज्ड बिल मांगें ताकि हर चार्ज साफ दिखे. त्योहारी ऑफर्स, एक्सचेंज स्कीम और मेकिंग चार्ज छूट का फायदा लेना समझदारी है. अगर इनवेस्टमेंट के लिए खरीद रहे हैं तो गोल्ड बार और गोल्ड कॉइन बेहतर ऑप्शन हो सकते हैं, क्योंकि इनमें भारी मेकिंग चार्ज नहीं लगता और सिर्फ 3% GST देना होता है. साथ ही बजट कम हो तो 9KT, 14KT, 18KT या हल्की 22KT ज्वेलरी भी अच्छा ऑप्शन साबित हो सकती है.
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