New Labour Code : हर कर्मचारी को सालभर अपने अप्रेजल (सैलरी हाइक) का इंतजार रहता है ताकि महीने के आखिर में बैंक अकाउंट में ज्यादा पैसे आएं. लेकिन क्या ऐसा हो सकता है कि आपकी सीटीसी (CTC) बढ़ जाए, फिर भी आपके हाथ में आने वाली सैलरी (Take-home Salary) कम हो जाए? जी
हां, नए लेबर कोड (New Labour Code) के प्रावधानों के लागू होने के बाद ऐसा मुमकिन है. जी बिजनेस (Zee Business) पर वित्तीय विशेषज्ञों ऑप्टिमा मनी के मैनेजिंग डायरेक्टर पंकज मठपाल और म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट विश्वजीत पराशर ने समझाया कि नया लेबर कोड आपकी इन-हैंड सैलरी को कैसे प्रभावित कर सकता है.
सबसे बड़ा खेल: बेसिक सैलरी का बढ़ना
पंकज मठपाल ने बताया कि आपकी इन-हैंड सैलरी इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनियां आपका नया सैलरी स्ट्रक्चर कैसे डिजाइन करती हैं. नए लेबर कोड के तहत कंपनियों को बेसिक सैलरी को कुल सीटीसी का कम से कम 50% रखना पड़ सकता है. प्रोविडेंट फंड (PF) और ग्रेच्युटी (Gratuity) की कटौती आपकी बेसिक सैलरी पर ही तय होती है.
अगर बेसिक सैलरी बढ़ेगी, तो आपके और आपकी कंपनी की तरफ से पीएफ (PF) में होने वाला योगदान भी बढ़ जाएगा. पीएफ में ज्यादा पैसा कटने का मतलब है कि आपके महीने की इन-हैंड सैलरी थोड़ी कम हो सकती है. हालांकि, राहत की बात यह है कि कुछ कंपनियां इस बदलाव का बोझ खुद उठा सकती हैं ताकि कर्मचारियों की टेक-होम सैलरी पर ज्यादा असर न पड़े.
उदाहरण के लिए अगर किसी की सैलरी ₹1 लाख है और पहले उसकी बेसिक सैलरी कम थी, तो अब नए स्ट्रक्चर में बेसिक सैलरी बढ़ने से पीएफ डिडक्शन (कटौती) बढ़ जाएगी. शुरुआती तौर पर यह जेब पर भारी लग सकता है, लेकिन लंबे समय के लिए यह आपके रिटायरमेंट फंड को बहुत मजबूत बना देगा.
पहले और अब के सैलरी स्ट्रक्चर में क्या अंतर है ?
म्यूचुअल फंड एक्सपर्ट विश्वजीत पराशर ने समझाया कि पारंपरिक रूप से कंपनियां क्या करती आई हैं.
| पुराना तरीका | नया तरीका (लेबर कोड के बाद) |
| कंपनियां बेसिक सैलरी को कम (कुल सैलरी का 20-30%) रखती थीं और बाकी हिस्से को एचआरए (HRA) और स्पेशल अलाउंस में बांट देती थीं. | कंपनियों को बेसिक सैलरी को कम से कम 50% रखना होगा. |
| इससे पीएफ (PF) कम कटता था और हाथ में ज्यादा सैलरी (In-hand) आती थी. | इससे पीएफ (PF) और ग्रेच्युटी में ज्यादा पैसा कटेगा, जिससे भविष्य सुरक्षित होगा. |
CTC और इन-हैंड सैलरी का अंतर समझना जरूरी
विशेषज्ञों ने साफ किया कि कर्मचारियों को सीटीसी (Cost to Company) और बैंक अकाउंट में आने वाले पैसे के बीच का फर्क समझना चाहिए. पंकज मठपाल के अनुसार, सीटीसी में कंपनी द्वारा आपके ऊपर किया जाने वाला कुल खर्च शामिल होता है. इसमें.
- कंपनी का पीएफ योगदान (Employer PF Contribution)
- हेल्थ इंश्योरेंस का प्रीमियम
- मील वाउचर (जैसे सोडेक्सो) और अन्य सुविधाएं शामिल होती हैं.
ये सभी चीजें आपकी सीटीसी को बड़ा दिखाती हैं, लेकिन ये नकदी (कैश) के रूप में आपके बैंक खाते में नहीं आतीं. इसके अलावा सालाना बोनस और इंसेंटिव भी सीटीसी का हिस्सा होते हैं, जो हर महीने नहीं मिलते.
टैक्स व्यवस्था (Tax Regime) का चुनाव भी डालेगा असर
नया सैलरी स्ट्रक्चर आपके टैक्स प्लानिंग को भी प्रभावित करेगा:
- ओल्ड टैक्स रिजीम (Old Tax Regime): अगर आप पुरानी टैक्स व्यवस्था चुनते हैं, तो एचआरए (HRA), एलटीए (LTA) और मेडिकल अलाउंस जैसे कंपोनेंट आपको टैक्स बचाने में मदद करेंगे. लेकिन यह छूट तभी मिलेगी जब ये आपकी सैलरी स्लिप का हिस्सा होंगे.
- न्यू टैक्स रिजीम (New Tax Regime): कम सैलरी वाले या युवा प्रोफेशनल्स, जिनके पास निवेश के ज्यादा विकल्प नहीं हैं, उनके लिए नई टैक्स व्यवस्था ज्यादा सरल और फायदेमंद हो सकती है.
अप्रेजल लेटर मिलने पर इन 7 चीजों को जरूर चेक करें
जब आपको इस साल का अप्रेजल लेटर मिले, तो केवल कुल सीटीसी न देखें, बल्कि इन चीजों पर गौर करें.
- बेसिक सैलरी (Basic Salary) कितनी है.
- आपका और कंपनी का पीएफ (PF) कॉन्ट्रिब्यूशन कितना कटा.
- एचआरए (HRA) और अन्य भत्ते (X) क्या हैं.
- ग्रेच्युटी (Gratuity) का कैलकुलेशन कैसे किया गया है.
- वेरिएबल पे (Variable Pay) और इंसेंटिव का हिस्सा कितना है.
- टैक्स के लिए कौन सा कंपोनेंट रखा गया है.
- और आखिर में हर महीने बैंक खाते में आने वाली असली रकम (In-hand Salary) कितनी है.
लंबे समय की वित्तीय सुरक्षा (Retirement Corpus) के लिहाज से यह बदलाव बेहतरीन है, भले ही इसके लिए आपको हर महीने हाथ में आने वाले कुछ पैसों का समझौता करना पड़े.
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