Iran-Israel War Oil Crisis: वेस्ट एशिया में छिड़ी जंग ने वैश्विक तेल बाजार की तस्वीर बदल दी है. अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से ईरान को दोहरा फायदा हो रहा है. जहां पहले ईरान का कच्चा तेल (मुख्यतः चीन को जाने वाला) भारी डिस्काउंट पर बिकता था, वहीं अब बाजार में तेल की किल्लत के कारण यह अंतर काफी कम हो गया है.
जंग से पहले ब्रेंट और ईरानी लाइट क्रूड के बीच 10 डॉलर से ज्यादा का अंतर था, जो अब घटकर मात्र 2.10 डॉलर रह गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल के साथ-साथ ईरान अब अपने तेल की हर बूंद पर पहले से कहीं ज्यादा मुनाफा कमा रहा है.
होर्मुज का ‘इकलौता सुल्तान’
एनडीटीवी के एक रिपोर्ट के अनुसार युद्ध के इस दौर में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की सुरक्षित निकासी सबसे बड़ी चुनौती बन गई है, लेकिन ईरान यहां ‘इकलौता खिलाड़ी’ बनकर उभरा है. खाड़ी के अन्य देशों जैसे इराक, कुवैत और यूएई के लिए अपने शिपमेंट निकालना बेहद मुश्किल और जोखिम भरा हो गया है, जबकि ईरान के टैंकर खार्ग आईलैंड टर्मिनल से लगातार लोड होकर सुरक्षित बाहर निकल रहे हैं.
आंकड़ों के मुताबिक, मार्च महीने में ईरान का तेल एक्सपोर्ट युद्ध से पहले के स्तर यानी 1.6 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर बना हुआ है. पिछले कुछ दिनों में सैटेलाइट तस्वीरों ने खार्ग आईलैंड पर टैंकरों की गतिविधि में और भी तेजी दर्ज की है, जो ईरान की मजबूत सप्लाई चेन को दर्शाता है.
अमेरिका की ‘मजबूरी’ का फायदा
ईरान पर इजरायल और अमेरिका के लगातार हवाई हमलों के बावजूद, वाशिंगटन ने एक हैरान करने वाला रणनीतिक कदम उठाया है. वैश्विक बाजार में तेल की कीमतों को बेलगाम होने से रोकने के लिए अमेरिका ने ईरान के उस तेल स्टॉक पर से प्रतिबंध (Sanctions) हटा लिए हैं, जो पहले से ही समुद्र में टैंकरों में मौजूद था.
इस ढील का नतीजा यह हुआ कि फरवरी में जो औसत कमाई 115 मिलियन डॉलर (₹950 करोड़) थी, वह मार्च में बढ़कर 139 मिलियन डॉलर (₹1200 करोड़ से ज्यादा) प्रतिदिन तक पहुंच गई है. ट्रंप प्रशासन के इस कदम को विशेषज्ञ एक ‘मजबूरी’ के रूप में देख रहे हैं, जिसने अनजाने में ईरान की तबाह हो चुकी अर्थव्यवस्था के लिए संजीवनी का काम किया है.
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