Bankruptcy Bill Passed: लोकसभा में 30 मार्च को पारित दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2026 कॉर्पोरेट सेक्टर और विशेषकर लेबर क्षेत्र के लिए एक बड़ा कदम है. इस नए कानून के तहत अब किसी भी कंपनी के दिवालिया होने पर उसकी संपत्ति की नीलामी से प्राप्त होने वाले प्रॉपर्टी पर सबसे पहला अधिकार वहां काम करने वाले मजदूरों और कर्मचारियों की रुकी हुई सैलरी का होगा.
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि यह नया सिस्टम पुराने ‘फास्ट-ट्रैक’ प्रोसेस की जगह लेगा, क्योंकि पुरानी व्यवस्था जटिलताओं के कारण प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रही थी. इसके अलावा, अब एक ही ग्रुप की कई सहायक कंपनियों और विदेशों में फंसी उनकी संपत्तियों से जुड़े कानूनी विवादों को सुलझाना भी पहले से कहीं अधिक सरल हो जाएगा.
मजदूरों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता
संसद के बजट सत्र के दौरान चर्चा का जवाब देते हुए वित्त मंत्री ने यह भरोसा दिलाया कि दिवालिया प्रक्रिया के दौरान मजदूरों के हितों को किसी भी कीमत पर नजरअंदाज नहीं किया जाएगा. उन्होंने रेखांकित किया कि कानून में अब ऐसे विशेष प्रावधान शामिल किए गए हैं, जिससे कामगारों के बकाए को भुगतान की प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा गया है. यह बदलाव उन लाखों श्रमिकों के लिए बड़ी राहत है जो कंपनी बंद होने की स्थिति में अपने वर्षों के वेतन और अन्य लाभों के लिए अक्सर कानूनी लड़ाइयों में फंस जाते थे. वित्त मंत्री ने कहा कि मजदूरों के हक से सरकार किसी भी स्तर पर कोई समझौता नहीं करेगी.
14 दिन की सख्त समय सीमा
इस संशोधन बिल का एक अन्य बड़ा लाभ यह है कि अब दिवालिया मामलों को जानबूझकर लंबे समय तक लटकाया नहीं जा सकेगा. नए नियमों के अनुसार, जैसे ही किसी कंपनी का डिफॉल्ट यानी कर्ज न चुका पाना साबित हो जाएगा, उसके खिलाफ इनसॉल्वेंसी की अर्जी को मात्र 14 दिन के भीतर स्वीकार करना अनिवार्य होगा. इससे पूरी कानूनी प्रक्रिया में अभूतपूर्व तेजी आएगी और कर्मचारियों को अपने हक के पैसों के लिए अब दशकों तक अदालतों के चक्कर काटने की आवश्यकता नहीं होगी. यह समयबद्ध प्रक्रिया न केवल श्रमिकों बल्कि लेनदारों के लिए भी लाभकारी सिद्ध होगी.
बैंकों ने अब तक 4.11 लाख करोड़ रुपए वसूले
वित्त मंत्री ने सदन को आंकड़ों के साथ जानकारी दी कि IBC कानून के लागू होने से भारतीय बैंकिंग सेक्टर की वित्तीय स्थिति में बड़ा सुधार आया है. दिसंबर 2025 तक के आंकड़ों के मुताबिक, इस कानून की मदद से कुल 1,376 कंपनियों के मामलों का सफलतापूर्वक निपटारा किया गया है. इसके जरिए बैंकों और अन्य लेनदारों ने अब तक लगभग 4.11 लाख करोड़ रुपए की भारी-भरकम रिकवरी की है. यह भी ध्यान देने योग्य है कि बैंकों के आधे से ज्यादा फंसे हुए कर्ज (NPAs) इसी पारदर्शी और सख्त प्रक्रिया के माध्यम से वापस सिस्टम में आए हैं.
गड़बड़ी करने वालों पर ₹5 करोड़ तक का जुर्माना
सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि दिवालिया कानून (IBC) अब केवल वसूली का साधन नहीं, बल्कि व्यापारिक समाधान का एक पारदर्शी जरिया है. यदि कोई भी व्यक्ति या कंपनी इस पूरी प्रक्रिया का गलत फायदा उठाने की कोशिश करती है या इसमें जानबूझकर अड़ंगा डालती है, तो उन पर भारी पेनाल्टी लगाई जाएगी.
गलत मंशा से प्रक्रिया रोकने पर कम से कम ₹1 लाख प्रति दिन का जुर्माना लग सकता है. वहीं, हेर-फेर करके गलत कमाई करने वालों से उस रकम का 3 गुना तक वसूला जा सकेगा. यदि नुकसान का सटीक हिसाब नहीं मिल पाता है, तो अदालत अधिकतम ₹5 करोड़ तक का भारी जुर्माना लगा सकती है.
छोटी कंपनियां कोर्ट के बाहर सेटलमेंट कर सकेंगी
पुराने सिस्टम की कमियों को दूर करने के लिए अब ‘क्रेडिटर-इन-कंट्रोल’ मॉडल पेश किया जा रहा है, जिसमें लेनदार खुद समाधान प्रक्रिया को गति दे सकेंगे. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सूक्ष्म और लघु उद्योगों (MSMEs) के लिए कोर्ट के बाहर सेटलमेंट जैसे आसान विकल्प दिए जाएंगे, ताकि वे लंबी और खर्चीली कानूनी लड़ाइयों से बच सकें. आपको बता दें कि 2016 में पहली बार लागू होने के बाद से इस कानून में अब तक कुल 7 बार संशोधन किए जा चुके हैं, जो इसे समय की जरूरतों के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाते हैं.
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