Germany India Job Market: जर्मनी इस समय एक बड़ी मुश्किल से जूझ रहा है. वहां की आबादी बूढ़ी हो रही है और काम करने वाले युवाओं की भारी कमी हो गई है. आलम यह है कि कसाई, बेकर, राजमिस्त्री और बढ़ई जैसे पारंपरिक कामों के लिए अब वहां लोग नहीं मिल रहे हैं. इस संकट को दूर करने के लिए जर्मनी अब भारत के युवाओं की ओर देख रहा है.
BBC की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले कुछ सालों में जर्मनी ने भारतीय कामगारों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए हैं. 2015 में जहां जर्मनी में सिर्फ 23,000 भारतीय कर्मचारी थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1,36,000 से ज्यादा हो गई है.
कसाई और बेकर की नौकरी के लिए भारतीय ही क्यों?
जर्मनी में मीट (Butchery) और बेकरी का काम काफी मेहनत वाला माना जाता है. वहां की नई पीढ़ी इन कामों से दूर भाग रही है, जिससे हजारों दुकानें बंद हो चुकी हैं. ‘मैजिक बिलियन’ और ‘इंडिया वर्क्स’ जैसी एजेंसियां अब भारत के छोटे शहरों से युवाओं को चुनकर जर्मनी भेज रही हैं. इन युवाओं को वहां ‘ऑसबिल्डिंग’ (Ausbildung) यानी ट्रेनिंग के साथ नौकरी दी जा रही है. जर्मनी के स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि अगर भारतीय युवा न आते, तो उनका बिजनेस पूरी तरह ठप हो गया होता.
भारत के युवाओं को वहां क्या मिल रहा है?
भारत के युवाओं के लिए जर्मनी जाना एक बड़ा मौका है. भारत में बढ़ती बेरोजगारी और कम सैलरी की तुलना में जर्मनी में उन्हें बेहतर लाइफस्टाइल, अच्छी सामाजिक सुरक्षा और ज्यादा पैसा मिल रहा है. दिल्ली के पास रहने वाले 20 साल के ईशु गरिया अब जर्मनी के ब्लैक फॉरेस्ट में बेकर की ट्रेनिंग ले रहे हैं. उनका कहना है कि यहां की सैलरी से वे अपने परिवार की आर्थिक मदद कर पा रहे हैं.
क्या सरकार ने नियमों में ढील दी है?
हां, दोनों देशों के बीच हुए समझौतों के बाद अब जर्मनी जाना आसान हो गया है. जर्मनी ने भारतीय नागरिकों के लिए ‘स्किल्ड वर्क वीजा’ का कोटा 20,000 से बढ़ाकर सालाना 90,000 कर दिया है. अब सिर्फ दुकानों में ही नहीं, बल्कि स्कूलों में टीचर के तौर पर भी भारतीयों की भर्ती की जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि 2040 तक जर्मनी को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए हर साल लगभग 2.8 लाख विदेशी कामगारों की जरूरत होगी.
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