Explainer: ग्रीनलैंड पर सुपर पावर देशों में क्यों मचा है घमासान, क्या रूस-चीन से घबराए हुए हैं ट्रंप?
Explainer: डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड को मुश्किल तरीके से लेने वाले बयान ने वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है. आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती रूस और चीन की गतिविधियों के बीच अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी सुरक्षा ढाल और रणनीतिक कुंजी मान रहा है. ग्रीनलैंड क्यों सुपरपावर देशों की नजर में है? वहां कौन-से संसाधन छिपे हैं, जिसे लेकर मारा-मारी की स्थिति बनी हुई है? रूस-चीन से अमेरिका क्यों डर रहा है? क्या उसे अपना प्रभुत्व खोने का डर सता रहा है? आर्कटिक क्षेत्र का यह बर्फीला द्वीप भविष्य की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक जंग का केंद्र कैसे बनता जा रहा है?
Explainer: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं. इस बार वजह कोई ट्रेड वॉर, टैरिफ या मिडिल ईस्ट का संकट नहीं है, बल्कि बर्फ से ढकी दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड है. ट्रंप ने खुले मंच से यह कहकर दुनिया को चौंका दिया कि अगर जरूरत पड़ी, तो अमेरिका ग्रीनलैंड को मुश्किल तरीके से भी हासिल कर सकता है. उनका तर्क साफ है कि अगर अमेरिका ने नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन यहां कब्जा कर लेंगे. ट्रंप का यह बयान केवल जुमला नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आर्कटिक क्षेत्र में उभरती नई भू-राजनीतिक जंग का संकेत माना जा रहा है, जहां आने वाले दशकों की वैश्विक ताकत का संतुलन तय हो सकता है.
ट्रंप के बयान से क्यों उठा तूफान
एनपीआर डॉट ओआरएजी की एक रिपोर्ट के अनुसार, व्हाइट हाउस में तेल कंपनियों के अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका ग्रीनलैंड के बारे में कुछ करने जा रहा है, चाहे वहां के लोगों को यह पसंद हो या नहीं. उन्होंने सीधे तौर पर कहा कि अगर अमेरिका ने कदम नहीं उठाया, तो रूस या चीन ग्रीनलैंड पर कब्जा कर लेंगे और वह रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनने देंगे. ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि वह पहले आसान तरीके से डील करना चाहते हैं, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो मुश्किल तरीका अपनाया जाएगा. इस एक वाक्य ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी, क्योंकि इसे सैन्य दबाव या बल प्रयोग की खुली चेतावनी माना जा रहा है. इसके बाद डेनमार्क, ग्रीनलैंड और अमेरिका के अधिकारियों के बीच आपात बैठकें हुईं. खबरें आईं कि व्हाइट हाउस सैन्य विकल्प समेत कई रास्तों पर विचार कर रहा है.
ग्रीनलैंड क्या है और किसके अधीन है
ब्रिटानिका डॉट कॉम की एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका महाद्वीप का हिस्सा है, लेकिन राजनीतिक रूप से यह डेनमार्क साम्राज्य के भीतर एक अर्ध-स्वायत्त क्षेत्र है. ग्रीनलैंड की अपनी सरकार है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति डेनमार्क के नियंत्रण में है. यहां की आबादी करीब 57 हजार है. इसकी अपनी कोई सेना नहीं है. इसकी सुरक्षा डेनमार्क करता है, जिसकी सैन्य ताकत अमेरिका के मुकाबले बेहद सीमित है. हालांकि, अमेरिका दशकों से ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी बनाए हुए है और वहां उसका अहम स्पेस और मिसाइल डिफेंस बेस मौजूद है.
ग्रीनलैंड पर क्यों टिकी है ट्रंप की नजर
ब्रिटानिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनलैंड सिर्फ एक बर्फीला द्वीप नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से एक बेहद अहम लोकेशन है. यह उत्तरी अमेरिका, यूरोप और रूस के बीच स्थित है. जो भी शक्ति ग्रीनलैंड को नियंत्रित करती है, वह आर्कटिक महासागर, उत्तरी अटलांटिक और संभावित नए समुद्री रास्तों पर सीधी नजर रख सकती है. इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण जैसे-जैसे बर्फ पिघल रही है, वैसे-वैसे आर्कटिक क्षेत्र में छिपे विशाल खनिज संसाधन सुलभ होते जा रहे हैं. ग्रीनलैंड में रेयर अर्थ मिनरल्स, यूरेनियम, तेल और गैस के बड़े भंडार माने जाते हैं, जो भविष्य की टेक्नोलॉजी और सैन्य उद्योग के लिए बेहद अहम हैं. ट्रंप की असली दिलचस्पी जमीन से ज्यादा इस बात में है कि आने वाले समय में आर्कटिक किसके नियंत्रण में रहेगा.
रूस और चीन से क्यों डर रहा है अमेरिका
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता रूस की बढ़ती सैन्य गतिविधियां हैं. रूस पिछले कुछ वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र में नए सैन्य अड्डे, एयरबेस, मिसाइल सिस्टम और न्यूक्लियर सबमरीन नेटवर्क तैयार कर चुका है. रूसी नौसेना की गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं, जिससे अमेरिका को उत्तरी दिशा से खतरे की आशंका है. चीन दूसरी रणनीति पर काम कर रहा है. वह खुद को नियर-आर्कटिक स्टेट बताता है और आर्थिक निवेश के जरिए इलाके में मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. चीन ग्रीनलैंड में एयरपोर्ट, बंदरगाह और खनन परियोजनाओं में निवेश करना चाहता था, लेकिन अमेरिकी दबाव के चलते कई प्रोजेक्ट रद्द कराए गए. वॉशिंगटन को डर है कि अगर उसने ढील दी, तो चीन आर्कटिक में स्थायी आर्थिक और रणनीतिक पकड़ बना सकता है.
अमेरिकी सुरक्षा के लिए ग्रीनलैंड क्यों है अहम
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए एक तरह से उत्तरी सुरक्षा ढाल है. यहीं से रूस की ओर से आने वाली किसी भी मिसाइल या हवाई गतिविधि की सबसे पहले पहचान की जा सकती है. अमेरिका का स्पेस अर्ली वॉर्निंग सिस्टम और मिसाइल डिफेंस नेटवर्क ग्रीनलैंड पर काफी हद तक निर्भर है. शीत युद्ध के दौरान भी ग्रीनलैंड सोवियत संघ पर नजर रखने का अहम केंद्र था. आज वही भूमिका और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि रूस और चीन दोनों ही हाइपरसोनिक मिसाइल और एडवांस्ड नेवल सिस्टम विकसित कर रहे हैं.
क्या पहले भी ग्रीनलैंड खरीदना चाहता था अमेरिका
रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीनलैंड को खरीदने का विचार नया नहीं है. 1946 में राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का औपचारिक प्रस्ताव दिया था. डेनमार्क ने इनकार कर दिया था, लेकिन अमेरिका को वहां सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की अनुमति मिल गई. 1950 के दशक में अमेरिका ने वहां बड़ा एयरबेस और रडार सिस्टम स्थापित किया, जो बाद में पिटुफिक स्पेस बेस बना. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल (2017-2021) में भी ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी, जिसे डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने साफ शब्दों में ठुकरा दिया था.
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का कड़ा विरोध
ट्रंप के ताजा बयान के बाद डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसेन ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका किसी दूसरे नाटो देश के खिलाफ सैन्य कदम उठाता है, तो यह नाटो के अंत का संकेत होगा. उधर, ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेन्स-फ्रेडरिक नीलसन ने भी कहा कि ग्रीनलैंड बिकने वाला नहीं है और अमेरिका की बयानबाजी अपमानजनक है. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ग्रीनलैंड नाटो का हिस्सा है और अपनी रणनीतिक स्थिति को भली-भांति समझता है. यूरोप के कई बड़े देशों ने भी संयुक्त बयान में ग्रीनलैंड की संप्रभुता के समर्थन में आवाज उठाई है.
ट्रंप प्रशासन का बदला हुआ रुख
2025 में सत्ता में लौटने के बाद ट्रंप ने विदेश नीति में पहले से ज्यादा आक्रामक रुख अपनाया है. उन्होंने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए विशेष दूत नियुक्त किया, जिनका खुला बयान था कि उनका लक्ष्य ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाना है. हालांकि ट्रंप के बयान के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्थिति संभालने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि ट्रंप प्रशासन अभी डेनमार्क से समझौते और खरीद जैसे विकल्पों पर विचार कर रहा है, न कि बल प्रयोग पर. फिर भी ट्रंप की भाषा यह संकेत देती है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य और राजनीतिक पकड़ हर हाल में मजबूत करेगा.
कितना बड़ा है ग्रीनलैंड
नक्शे में अक्सर ग्रीनलैंड लोगों को अफ्रीका जितना बड़ा दिखाई देता है, जबकि असल में अफ्रीका उससे करीब 14 गुना बड़ा है. इसकी वजह मर्केटर मैप प्रोजेक्शन है, जिसमें ध्रुवों के पास की जमीन बढ़ी-चढ़ी दिखाई देती है. हालांकि, आकार चाहे जो हो, लेकिन रणनीतिक महत्व के लिहाज से ग्रीनलैंड वास्तव में दुनिया जितना बड़ा है, क्योंकि यह आने वाले समय की सैन्य और संसाधन आधारित राजनीति का केंद्र बन चुका है.
क्या ग्रीनलैंड बन रहा है शीतयुद्ध का मैदान
रूस का सैन्य विस्तार, चीन की आर्थिक दखल और अमेरिका का खुला दबाव इस ओर इशारा करता है कि आर्कटिक क्षेत्र भविष्य का बड़ा शक्ति-संघर्ष का क्षेत्र बनने जा रहा है. यूक्रेन युद्ध के बाद नाटो की नजरें पहले से ज्यादा उत्तरी मोर्चे पर हैं. ग्रीनलैंड इस पूरे सुरक्षा ढांचे का सबसे अहम स्तंभ बनता जा रहा है.
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जमीन से ज्यादा प्रभुत्व की लड़ाई
ग्रीनलैंड पर ट्रंप का आक्रामक रुख सिर्फ एक द्वीप को लेकर नहीं है. यह आने वाले दशकों की वैश्विक रणनीति को लेकर है. यह लड़ाई मिसाइल चेतावनी सिस्टम, आर्कटिक समुद्री रास्तों, खनिज संसाधनों और उत्तरी सैन्य वर्चस्व की है. ट्रंप की भाषा बता रही है कि अमेरिका अब आर्कटिक को लेकर रक्षात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक नीति अपनाना चाहता है. ग्रीनलैंड आज भले शांत और बर्फीला दिखे, लेकिन हकीकत में यह भविष्य की सबसे गर्म भू-राजनीतिक जंग का केंद्र बन चुका है.
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