अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव और बढ़ा दिया है, लेकिन इससे कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं हुई है. यही वजह है कि पिछले कारोबारी सेशन में 2% से ज्यादा गिरने के बाद मंगलवार को तेल की कीमतें करीब स्थिर रहीं. ब्रेंट क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल और वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट यानी WTI करीब 85 डॉलर पर कारोबार करता दिखा.
भारत जैसे देशों के लिए यह खबर अहम है, क्योंकि लंबे समय तक तेल महंगा रहने का असर पेट्रोल-डीजल से लेकर कारोबार की लागत तक पर पड़ सकता है.
अमेरिका ने ईरान पर क्या कदम उठाया?
अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने कहा है कि ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को अपने संबंध खत्म करने के लिए तय समय दिया जाएगा. ऐसा नहीं करने पर उन पर एकतरफा कार्रवाई की जा सकती है. उन्होंने इस अभियान को ‘इकोनॉमिक डी-डे’ बताया है. अमेरिका के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल ने करीब 60 ऐसी कंपनियों और संस्थाओं पर भी प्रतिबंध लगाए हैं, जिनका संबंध ईरान की तेल कमाई और उसके ‘शैडो फ्लीट’ से जुड़े जहाजों से बताया गया है. हालांकि, सबसे बड़ा सवाल अभी भी यही है कि इससे स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही कब सामान्य होगी या होगी भी या नहीं.
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तेल बाजार के लिए होर्मुज इतना अहम क्यों है?
होर्मुज दुनिया के अहम ऊर्जा रास्तों में से एक है. इस इलाके में तनाव बढ़ने से कच्चे तेल और रिफाइंड पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की आवाजाही प्रभावित हुई है. इस साल अब तक क्रूड की कीमतें 50% से ज्यादा चढ़ चुकी हैं. ऐसे में आगे सप्लाई में रुकावट बनी रहती है तो कारोबारियों के लिए फ्यूल और ट्रांसपोर्ट की लागत पर दबाव बढ़ सकता है. हालिया घटनाओं ने चिंता और बढ़ाई है. ब्रिटेन की नौसेना के मुताबिक ओमान के पास होर्मुज क्षेत्र में एक ऑयल टैंकर प्रोजेक्टाइल की चपेट में आकर बंद हो गया. वहीं, ईरान समर्थित हूती समूह ने लाल सागर में एक सऊदी सुपरटैंकर पर हमले का दावा किया है.
चीन का फैसला क्यों बदल सकता है तेल का खेल?
ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. ऐसे में अमेरिका के नए दबाव पर चीन की प्रतिक्रिया बाजार के लिए काफी अहम होगी. अगर चीन और ईरान के बीच तेल कारोबार को लेकर टकराव बढ़ता है, तो तनाव कम होने के बजाय और बढ़ सकता है. इसका सीधा असर तेल की सप्लाई और कीमतों पर पड़ने की आशंका रहेगी. उधर ईरान के अर्थव्यवस्था मंत्री सैयद अली मदानिजादेह ने सरकारी टीवी से कहा है कि देश अमेरिकी दबाव के लिए पूरी तरह तैयार है. हालांकि, ईरान में फ्यूल की कमी और पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारों की स्थिति भी बनी हुई है.
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